संस्करण: 26जनवरी-2009

खोता जा रहा चांद का मुखड़ा

 

 

 

डॉ. देवप्रकाश खन्ना

''चौदहवीं का चांद हो, आफताब हो
जो भी हो तुम खुदा की कसम लाजवाब हो।....''
''चांद सा मुखड़ा, क्यों शरमाया....''
''खोया खोया चांद, खुला आसमान.... आंखों में सारी रात जायेगी....।''

 

आदि अनेक लोकप्रिय भारतीय फिल्मी गानों ने हमारे चन्दामामा के प्रति अटूट प्रेम के रिश्ते को मज़बूती से संजो कर रखा था। ''चंदा की चादनी में ''झूमे झूमे'' वाला मेरा दिल सदियों तक अठखेलियां करता रहा है। पर क्या बताये, आज से लगभग 40 साल पहले जिस दिन अमरीका की नासा के चंद्रमा अभियान के परिणाम स्वरूप नील आर्म स्ट्रांग ने अपना पहला कदम चंद्रमा की धरती पर रखा था तभी से मुझे अपने प्यारे 'चन्दा मामा दूर के' को खो जाने का डर लगना शुरू हो गया था। हां, तब यानी अपने प्यारे चांद को खोने के नुकसान का ज्यादा एहसास नहीं कर पाया। पर उस दिन प्राप्त हुई विज्ञान की अभूतपूर्व सफलता ने धीरे-धीरे गंभीर स्वरूप धारण करते-करते कोमलता व सौंदर्य के प्रतिमान चंद्रमा को झक लोहे का सा कठोर, निर्जीव पत्थर सिध्द करने की पूरी तैयारी कर डाली है।

विज्ञान ने अपने पंख फैलाते फैलाते हमारे प्यारे चंद्रमा को अब अपनी पक्की गिरफ्त में जकड़ लिया लगता हैं। भारत के इसरो संगठन के वैज्ञानिकों के नेतृत्व व मार्गदर्शन में 22 अक्टूबर 2008 की प्रात: लगभग साढ़े छ: बजे प्रथम मानवरहित चंद्रयान प्रथम ने अपनी उड़ान भरी और अब करीब डेढ़ माह की लंबी व दृढ़ यात्रा के फलस्वरूप अपनी कामयाबी के परचम गाड़ते हुए चंद्रमा को साहित्यकारों से हमेशा के लिए छीन लेने में सफलता ही प्राप्त कर ली लगती है। विज्ञान के विकास पर आधारित नये ज्ञान के प्रसार.... से फैलती जा रही ज्ञान की धुंध में हमारा चांद, चंदामामा सदा के लिए खोता सा जाने लगा है। नये ज्ञान के प्रकाश में हम कैसे अपने पुराने चहेते गानों का भी आनंद ले पायेंगै। हां शायद बचेंगी उनकी सुमधुर धुनें जो हमें संगीत के कारण सदा गुदगुदाती रहेंगी।

अभी तो तुर्रा यह है कि हमारे वैज्ञानिक स्वयं चांद पर नहीं पहुंच पाये हैं, तब भी हालात गंभीर दिखने लगे हैं। हमारा चांद अभी से ''खोया खोया चांद'' सा लगने लगा है। जिस दिन हमारे वैज्ञानिक अपनी तैयारी के साथ वहां जा उतरेंगे उस समय के परिणामों और हालातों की कल्पना करना मुश्किल है। अभी तो केवल इतना ही हुआ है कि भारतीय वैज्ञानिकों के नेतृत्व में भारत की धारती से, अमरीका आदि पांच देशों के वैज्ञानिकों व उनके द्वारा तैयार किये उपकरणों के सहयोग से एक मानवरहित चंद्रयान प्रथम पृथ्वी से उड़ान भर के चंद्रमा की सतह के 100 कि.मी. की दूरी पर जा पहुंचा है व इसी दूरी पर अपनी कक्षा में स्थापित होकर एक निश्चित मार्ग पर चंद्रमा के चारों और मंडराता जा रहा है। चंद्रयान के नियंत्रकों का कहना है कि यह मानवरहित चंद्रयान इसी प्रकार ''भौंरे सा'' दो वर्ष तक इसी कक्षा में मंडराता रहेगा। इस चंद्रयान में 10 वैज्ञानिक उपकरण लगाये गये है, इनमें 6 भारत द्वारा निर्मित है, तथा ये सभी उपकरण इतनी दूरी से चंद्रमा की सतह व उसके नीचे की जानकारी व फोटो हमारे पृथ्वी पर स्थापित नियंत्रण केंद्रों को भेज रहे हैं। सौ.कि.मी. दूरी पर से भेजी जानकारी से जब यह हाल है तो वैज्ञानिक यदि स्वयं वहां जा धमके तो न जाने बात कहां तक जा पहुंचेगी। तब तक तो हमारा चांद 'शरमा' कर बिखर जायेगा।चंद्रयान में लगे यंत्रों में से एक यंत्र है एम 3 यानी मून मिनरोलोजी मैपर, एम.एल.ए.। इस मैपर यंत्र ने जो फोटो व जानकारी अभी तक भेजी है उससे वैज्ञानिकों का कहना है कि चांद की सतह पर प्रचुर-मात्रा में लौह अयस्क विद्यमान है। यानी हमारा प्यारा कोमल सजीव चन्दा अब कोमल न होकर लोहे का पिण्ड है यह सिध्द करने की पूरी तैयारी है। आखिर हमारे चंदा ने इन वैज्ञानिकों का क्या बिगाड़ा है ? क्या वैज्ञानिकों ने कभी प्यार नहीं किया ? क्या वे प्यार को ही नकार देंगे ? क्या वे अपनी हनी के साथ मून पर नहीं गये ?

एम.3 यंत्र के मुख्य वैज्ञानिक नियंता अमरीका की ब्राउन यूनीवर्सिटी के वैज्ञानिक फ्रेके. कार्ल पीटर्स है। उनका कहना है कि एम.3 द्वारा भेजी जानकारी के अध्ययन से पता चलता है कि चंद्रमा पर लौह अयस्क की मौजूदगी वाले पूर्वी बेसिन के पश्चिमी क्षेत्र में पाइरौक्सिन की प्रचुरता है। इस जानकारी के आने के बाद कार्ल पीटर्स व उनके सहयोगी वैज्ञानिक अब चांद की सतह के नीचे पाये जाने वाले खनिजों व धातुओं का पता लगा कर चांद की सतह का एक खनिज नक्शा बनाने में जुटे हुए हैं। भगवान करें कि वैज्ञानिक अपने अपने उद्देश्यों में भले ही सफल होते खुशियां मनाते रहें। पर हमें, साहित्यकारों को, सामने दिख रहा है अपने प्यारे से धुंध होता चांद का सुंदर शांत शीतल सा मुखड़ा।


डॉ. देवप्रकाश खन्ना