संस्करण: 26जनवरी-2009

ओजस्वी राष्ट्रकवि और मूर्धन्य पत्रकार दादा माखनलाल चतुर्वेदी
30 जनवरी को पुण्यतिथि पर विशेष

बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे दादा माखनलाल

 

राम सुरेश सिंह

मुझे तोड़ लेना वनमाली, उस पथ पर देना तुम फेंक।
                     मातृभूमि पर शीश चढाने, जिस पथ जाएं वीर अनेक॥

पुष्प की अभिलाषा शीर्षक कविता से ली गई यह पंक्ति दादा माखनलाल चतुर्वेदी के राष्टप्रेम और त्याग को दर्शाता है। यह सिर्फ पुष्प की अभिलाषा ही नहीं उनके जीवन की भी अभिलाषा थी।

'एक भारतीय आत्मा' की रचना संसार अपने समकालीन कवियों से कई दृष्टियों में अलग है। परतंत्रता का अभिशाप झेलते हुए कवि की आत्मा आंदोलित है। एक ओर कवि ने विद्रोह और बेचैनी से पूर्ण कविता की रचना कर ब्रिटिश सरकार के प्रति रोष व्यक्त किया, वहीं दूसरी ओर दमन चक्र से उत्पन्न यातनाओं को बडे धौर्य और संयम के साथ अहिंसा भावना से स्वीकार किया। राष्ट्रीय कविताओं में ओज और प्रेम सौंदर्य कविताओं में माधुर्य उनके सहज गुण हैं। उनकी रचना पढ़कर एक नया जोश आ जाता है।

'एक भारतीय आत्मा' उस व्यक्ति का नाम है जिसने भारत और भारतीयता की अस्मिता को पूरी तरह आत्मसात कर उसकी रक्षा में अपनी रचनाधार्मिता को समर्पित करनें में विश्वास किया। 'एक भारतीय आत्मा' ऐसा नाम है, जिसने भारत की परतंत्रता को स्वीकार करने के बजाय उसकी स्वतंत्रता के लिए कारावास का कष्ट झेलने में भी सुख का अनुभव किया। भारतीय आत्मा शब्द का संकेत है कि भारत मेरा देश है और मैं इसकी आत्मा हूं। यह एक ऐसा उपनाम है जो कवि के मानस में व्याप्त भारत देश पर अपने नैसर्गिक अधिकार को दर्शाता है। दादा माखनलाल द्वारा एक भारतीय आत्मा उपनाम चुना जाना उनके स्वदेश प्रेम को दर्शाता है।

जीवन परिचय: माखनलाल चतुर्वेदी का जन्म चार अप्रैल 1889 को होशंगाबाद जिले के बाबई गांव में हुआ था। उनके पिता नंदलाल चतुर्वेदी गांव की पाठशाला में शिक्षक थे। बाल्यकाल में ही उनका झुकाव कविता पाठ की ओर हो गया था। छोटी उम्र में उनका विवाह ग्यारसीबाई के साथ कर दी गई। दादा माखनलाल की शिक्षा किसी विश्वविद्यालय या अंग्रेजी माधयम के बडे स्क़ूल में नहीं हुई। संस्कृत की शिक्षा उन्हें अपने बडे चाचा बंशीधर चतुर्वेदी से मिली। उन्होंने वर्ष 1906 में हरदा जिले के मसनगांव में अधयापकी की शुरुआत की।

पत्रकारिता के क्षेत्र में रखा कदम: वर्ष 1908 में हिन्दी समाचार पत्र केसरी द्वारा 'राष्ट्रीय आंदोलन और बहिष्कार' विषय पर कराए गए निबंधा प्रतियोगिता में दादा माखनलाल ने प्रथम पुरस्कार प्राप्त किया। सन् 1912 में शक्ति पूजा लेख लिखने पर उन पर राजद्रोह का आरोप लगा। वर्ष 1913 के अक्टूबर में कानपुर से गणेश शंकर विद्यार्थी ने प्रताप निकाला, जिसमें चेतावनी नामक कविता दादा माखनलाल ने लिखी। इससे प्रभावित होकर विद्यार्थी जी ने दादा को कानपुर बुलाया। उन्हें प्रभा नामक पत्रिका में सह-संपादक बनाया गया। सात अप्रैल 1913 को पत्रिका का पहला अंक निकला। प्रभा के सफलतापूर्वक छह अंक निकलने के बाद उन्होंने 26 दिसंबर 1913 को अधयापकी से त्याग-पत्र दे दिया। इसके बाद वे पूरी तरह पत्रकार बन गए और जीवनपर्यन्त पत्रकार रहे। स्न 1920 में कर्मवीर पत्र का प्रकाशन हुआ, जिसका संपादन माखनलाल चतुर्वेदी ने किया। सन् 1925 में खंडवा से जब कर्मवीर का प्रकाशन शुरू हुआ तो वे खंडवा चले गए। वे अखिल भारतीय पत्रकार परिषद् के अधयक्ष भी रहे।

 

स्वतंत्रता की लड़ाई भी लड़ी

 

देश की स्वतंत्रता के लिए कृतसंकल्प लोकमान्य बालगंगाधार तिलक से दादा माखनलाल प्रभावित थे। राष्ट्रपिता महात्मा गांधाी के संपर्क में आने के बाद वे स्वतंत्रता आंदोलन में कूद पड़े। वे कई बार जेल गए। बिलासपुर में सन् 1922 में भड़काऊ भाषण देने के लिए उन्हें जेल जाना पड़ा। इसी दौरान उन्होंने बिलासपुर जेल में 'पुष्प की अभिलाषा' कविता की रचना की। उन्होंने अपनी रचना से जनमानस को स्वतंत्रता की लड़ाई के लिए उत्प्रेरित किया। कर्मवीर में उनके द्वारा लिखे गए लेखों ने अंग्रेज सरकार की नींद उड़ा दी थी।

 

मूल्यों से समझौता नहीं

 

दादा माखनलाल ने अपने जीवन में कई दायित्वों का पालन किया, लेकिन कभी भी मूल्यों से समझौता नहीं किया। उन्होंने बहुत ही स्पष्ट रूप से अपने को धानी वर्ग से अलग रखा। गरीब किसानों और पीड़ित मजदूरों के प्रति उनकी सहानुभूति अटूट बनी रही। दादा माखनलाल ने कुल 19 पुस्तकें लिखीं। इसमें 10 कविता संग्रह, 2 गद्य काव्य, एक कहानी संग्रह, एक नाटक, 3 निबंधा संग्रह, एक संस्मरण और एक भाषण संग्रह है। 'हिम किरीटनी' के लिए देव पुरस्कार और 'हिमतरंगिनी' के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार से उन्हें सम्मानित किया गया। वे कवि, योध्दा व पत्रकार होने के साथ राष्ट्रीय जागरण के अग्रदूत थे। 30 जनवरी सन् 1968 को साहित्य जगत का यह सितारा संसार से सदा के लिए ओझल हो गया। अब तो उनकी स्मृति ही शेष है। दादा माखनलाल जीवनभर पतझड़ झेलते रहे, पर दूसरों के लिए हमेशा बसंत की कामना की। वे एक ऐसे क्रांतिदृष्टा थे, जिन्होंने जीवन के हर क्षेत्र में संघर्ष किया। ऐसे 'भारतीय आत्मा' को शत् शत् नमन।


राम सुरेश सिंह