संस्करण: 26जनवरी-2009

गणतंत्र दिवस पर विशेष

विधानसभा चुनाव 2008 के बहाने


 

वीरेंद्र जैन

णतंत्र में हम प्रति दिन प्रत्येक घटना पर जनमत नहीं करा सकते इसलिए समय समय पर कराये गये चुनावों के परिणामों को ही जनादेश की दिशा मान कर अपने निष्कर्ष निकालते रहते हैं। इसके लिए राजनीतिक दल अपने घोषणापत्र और कार्यक्रम घोषित करते हैं जिसके आधार पर हम अपने निष्कर्ष निकालते हैं और अपनी पार्टी व अपने प्रतिनिधि को मत देकर अपने विचार बताते हैं। इससे अधिक हम गणतंत्र को और आगे ले नहीं जा सकते इसलिए इसी को आदर्श मान कर चलते हैं।

सन 2008 के अंतिम महीनों में छह राज्यों में विधानसभा चुनाव हुये और उसके चुनाव परिणामों में तीन राज्यों में स्वतंत्र रूप से तथा एक राज्य में संयुक्त रूप से कांग्रेस सत्ता में जुड़ गयी। दो राज्यों में भाजपा की सत्ता बनी रही भले ही पहले के मुकाबले कुछ कम समर्थन के साथ बनी हो। पर ये सत्ता के लिए हुये चुनाव के परिणाम थे जो नियम अनुसार चुनाव लड़ रहे दलों व उम्मीदवारों में से अधिकतम वोट पाने वाले को विजयी घोषित कर सत्ताधीश चुनने का पात्र बना देती है। यहाँ ये बात गौण है कि उस दल या उम्मीदवार ने किन साधनों का प्रयोग करते हुये यह समर्थन जुटाया है और वह नैतिक है या नहीं।

सत्ता पा लेने की बात अगर छोड़ दें तो ये चुनाव परिणाम कुछ अलग ही संकेत देते हैं। पहला तो यह कि भाजपा केवल जम्मू में जीती है और शेष जगह काँग्रेस जीती है। इसे थोड़ा समझने के लिए पिछले वर्षों की ओर देखना होगा। 1983 में खालिस्तानी आतंकवादियों से त्रसित देश के दौर में पंजाब में आपरेशन ब्लू स्टार हुआ था जिसके बाद खालिस्तानियों द्वारा पैदा किया गया हिन्दू सिख का भेद और चौड़ा हो गया था जिसका सबसे बुरा प्रदर्शन श्रीमती इंदिरा गांधी की हत्या के बाद हुयी निरपराध सिखों की नृशंस हत्याओं में हुआ था। संघ परिवार इस घटनाक्रम के दौर में मन से खालिस्तानियों के विरूध्द था क्योंकि उनकी गिनती में सिख हिंदुओं में आते हैं और वे नहीं चाहते रहे कि उनके राजनीतिक आधार में बंटवारा हो। आपरेशन ब्लू स्टार के बाद श्रीमती गांधी साम्प्रदायिक विचारधारा से ग्रस्त हिंदुओं के वर्ग में बेहद लोकप्रिय हो गयी थीं, जो इससे पहले इमरजैंसी के दौर में संघियों को जेल भेजने के कारण हिन्दू विरोधी की तरह बदनाम कर दी गयी थीं। आपरेशन ब्लू स्टार के ठीक बाद जम्मूकश्मीर में चुनाव हुये थे जिसमें काँग्रेस ने जम्मू की लगभग सारी सीटें हथिया ली थीं और भाजपा की लगभग सब सीटों पर जमानत जब्त हो गयी थी, जबकि यह भाजपा का गढ माना जाता था व वहाँ से भाजपा ही जीतती रही थी। माहौल देख कर अटलजी किसी विवाह का बहाना करके अमेरिका खिसक गये थे। जब भाजपा के नेता मलकानी जी से चुनाव परिणामों पर प्रतिक्रिया मांगी गयी तो उनका कहना था कि क्या हुआ जो हमारी सीटें नहीं आयीं पर विचारधारा तो हमारी ही जीती है।

स्व. मलकानी जी के मापदंड के हिसाब से देखें तो इस बार जम्मू में भाजपा जीत गयी है क्यों कि जो साम्प्रदायिक विभाजन उनकी विचारधारा का हथियार है उसके प्रयोग में वे वहाँ पर सफल रहे हैं और उन लोगों के कारण ही जम्मू कश्मीर का वह विभाजन हो गया जिसे इतने दिनों से टाला जा रहा था। जम्मू में भाजपा की जीत का विकास के वादे आदि से कोई सम्बंध नहीं है अपितु बर्फानी बाबा के नाम पर किये गये आन्दोलन के कारण पैदा हुआ ध्रुवीकरण ही उनकी विजय का आधार बना और उसी के दूसरे ध्रुव के रूप में उभरने से पीडीपी को कश्मीर में सफलता मिली है। दूसरी बात यह है कि इसी मापदण्ड के हिसाब से मध्यप्रदेश छत्तीसगढ राजस्थान और दिल्ली में 'भाजपा' हार गयी है क्योंकि इस बार उन्होंने उन मुद्दों पर चुनाव लड़ा जो उस पहचान से अलग था जिसके लिए भाजपा जानी जाती है।इस बार उनके सारे के सारे रंग ढंग, तौर तरीके, घोषणाएँ वादे, और चुनाव प्रबंधन काँग्रेस वाला था। ना इन चुनावों में अयोधया का राम मंदिर था और ना ही रामसेतु था,ना तोगड़िया त्रिशूल दीक्षा देने आये थे और ना ही भोजशाला में अनुपस्थित सरस्वती की मूर्तिस्थल पर हनुमान चालीसा का पाठ समस्या बनाया गया, न गंजबासोदा में किसी कसाई को गौकशी का जिम्मेवार बना कर मुसलमानों की साठ सत्तर दुकानें जलायी गयीं, ना किसी गेरूआ वस्त्र धारण करने वाली को नेता की तरह पेश किया गया। साम्प्रदायिकता विहीन होने पर काँग्रेस और भाजपा में इतनी समानता हो जाती है कि कभी भी कोई भाजपा से काँग्रेस में और काँग्रेस से भाजपा में आता जाता रहता है और दोनों ओर ही ना तो आने वालों को और ना ही जाने वालों को कोई परेशानी होती है, ना वहाँ घुटन होती है। मलकानी मापदण्ड के अनुसार इसे काँग्रेस की जीत कहा जाना चाहिये। दूसरी ओर मध्यप्रदेश में भाजपा के चुनावी मुद्दों की थोड़ी बहुत वास्तिविक झलक भाजपा से निष्काषित उमा भारती में दिखायी दी जो भाजपा को काँग्रेस की बी टीम बतला रही थीं और कमोवेश गलत नहीं थीं, पर वे बुरी तरह चुनाव हार गयीं जबकि मध्यप्रदेश में पिछला चुनाव उन्हीं के नेतृत्व में लड़ा गया था। उमा की हार को दूसरे अर्थों में भाजपावाद की हार ही माना जा सकता है।

इन चुनावों की एक और भी विशेषता है कि कुल मतदान का प्रतिशत सभी जगह पर बढा है जिसमें अठारह से पैंतीस साल वाले नये वोटर ने भागीदारी की है। कुल मतदान में से भाजपा और काँग्रेस के कुल मतदाता का प्रतिशत सत्तर प्रतिशत से नीचे ही रहा है अर्थात तीसरी ताकतों के हाथ में भी लगभग तीस प्रतिशत का मतदान हुआ है तथा प्रत्येक राज्य में जीत कर सत्ता पा लेने वालों के पास चालीस प्रतिशत से अघिक का समर्थन नहीं है अर्थात कुल पड़े वोटों में से भी साठ प्रतिशत वोट सरकारों के खिलाफ हैं। यदि वोट डालने नहीं आये लोगों को भी विरोधपक्ष माना जाये तो यह प्रतिशत और भी बढ जाता है।

इन चुनावों में पैसे के बूते, पूरे दम खम से पूरी सीटों पर उम्मीदवार खड़े करने वाली मायावती का जादू भी नहीं चला जो प्रधानमंत्री बनने के झांसे में चल रही थीं। उनका दलित और बहुजन जातिवाद का जादू तो पहले ही उतर चुका है जब से उन्होंने सवर्ण समाज की पार्टी होने का उद्धोष कर पैसे वालों के साथ टिकिट और दलितों के वोटों का सौदा करना प्रारंभ किया है। ऐसा करके उन्होंने उसी डाल को काट दिया है जिस पर वे बैठी थीं। अब वे भी 'काँग्रेस' हो जाना चाहती हैं , पर काँग्रेस पहले से ही उपलब्ध है इसलिए उन्हें उत्तरप्रदेश में काँग्रेस से बेहतर प्रशासन का प्रदर्शन करना जरूरी था जो वे नहीं कर सकी हैं। अब उनका अस्तित्व केवल उत्तर प्रदेश के नकारात्मक वोटों और गिरोहबंदी पर निर्भर है। एक आंदोलन के रूप में बसपा समाप्त हो गयी है।

साम्प्रदायिकता फैलाने के लिए मुंबई में किये गये आतंकी हमले को भुनाने वाले लोगों को भी जनता ने पसंद नहीं किया है। जम्मू कश्मीर में अधिक संख्या में वोटिंग करके वहाँ के उग्रवादियों व अलगाववादियों को जनता ने चुनौती दी है तथा नैशनल कांफ्रेंस व काँग्रेस को वोट करके एक अलग ही संदेश दिया गया है कि उनकी समस्याओं का हल लोकतांत्रिक ढंग से ही निकलेगा।

इन चुनावों में धान को पानी की तरह बहाया गया है जो राजनीति में काले व अवैधा धान की भरमार का सूचक है। सभी प्रमुख दलों में टिकिट बेचे जाने के आरोप लगे और जाहिर है कि टिकिट वही खरीदेगा जिसके पास पैसा होगा। भ्रष्टाचार को अब जनता इस तरह से सहन करने लगी है कि उसके लिए भ्रष्टाचार चुनाव का कोई मुद्दा ही नहीं है। ऐसा लगता है कि इसे सभी पार्टियों में हिडन ऐजेन्डे की तरह स्वीकार कर लिया गया है। चुनाव में 78 प्रतिशत उम्मीदवार करोड़पति थे और जीतने वालों में भी कमोवेश यही अनुपात रहा। एकाध अपवाद को छोड़ कर सामान्य सीट से आरक्षित वर्ग के प्रतिनिधि नहीं जीत सके और ना ही किसी गैर अल्पसंख्यक बहुल क्षेत्र से कोई मुस्लिम ही चुनाव जीत सका।

इस गणतंत्र दिवस पर हमें सोचना है कि हमारा गणतंत्र कहॉ जा रहा है और इसे कहाँ जाना चाहिये। इस बहस को कम से कम विचार के सतर पर तो जिन्दा रखा ही जाना चाहिये क्योंकि विचार ही अनुकूल स्थितियाँ आने पर कार्य में बदलता है।

वीरेंद्र जैन