संस्करण: 26 अप्रेल-2010   

थरूर प्रकरण से सीख ले भाजपा

महेश बाग़ी

          ईपीएल विवाद के कारण शशि थरूर को केंद्रीय विदेश राज्यमंत्री पद से हाथ धोना पड़ रहा है। अपनी महिला मित्र सुनंदा पुष्कर की आईपीएल में भागीदारी के कारण उन्हें भारी शर्मिंदगी भी झेलना पड़ी। ख़ास बात यह है कि कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और राहुल गांधी से निकटता के बावजूद थरूर को मंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा। हालांकि थरूर पर लगे आरोप अभी प्रमाणित नहीं हुए हैं, किंतु फिर भी उन्हें मंत्रिमंडल से बाहर होना पड़ा। भाजपा ने इस मसले पर खूब हल्ला मचाया था। अंत में इस्तीफे की ख़बर ने उसे राहत दी। इस प्रकरण से भाजपा खासकर मध्यप्रदेश की शिवराज सरकार को सबक लेने की ज़रूरत है, जहां 12 मंत्री और पूर्व मंत्री लोकायुक्त जांच के घेरे में हैं, खुद मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के खिलाफ भी डंपर कांड की जांच चल रही है।

      डंपर कांड का उल्लेखनीय पहलू यह है कि कोर्ट ने एक माह में जांच प्रतिवेदन प्रस्तुत करने के निर्देश दिए थे, किंतु दो साल बाद भी स्थिति यथावत है। इससे इस व्यक्ति को बल मिलता है कि न्याय में देरी भ्रष्टाचरण की सूचक है।

       फिलहाल शिवराज मंत्रिमंडल के सदस्य कैलाश विजयवर्गीय और उनके विधायक मित्र रमेश मेंदोला मीडिया की सुर्खियों में हैं। इन पर आरोप है कि महापौर पद पर रहते समय विजयवर्गीय ने इंदौर नगर निगम की सौ करोड़ रुपए मूल्य की कीमती जमीन मात्र एक करोड़ रुपए में तत्कालीन एमआईसी सदस्य रमेश मेंदोला की नंदा नगर गृहनिर्माण समिति को निगम परिषद की स्वीकृति के बगैर दे दी। इस मामले में भी लोकायुक्त द्वारा जांच की जा रही है। इसी बीच कैलाश विजयवर्गीय द्वारा इंदौर महापौर कार्यकाल में किए गए अन्य घोटाले भी प्रकाश में आए हैं, जिन्हें लेकर आरोप-प्रत्यारोप के दौर जारी हैं।

      कांग्रेस ने तो मय सबूत यह भी कह दिया है कि लोकायुक्त और विजयवर्गीय के पारिवारिक रिश्ते हैं, जिससे निष्पक्ष न्याय की उम्मीद पर प्रश्नचिन्ह लग गया है। इतना सब होने के बावजूद मुख्यमंत्री ने विजयवर्गीय से इस्तीफा लेने का साहस नहीं दिखाया। शायद उन्हें यह भय सता रहा है कि यदि ऐसा किया तो भ्रष्टाचार के आरोपों की पुष्टि हो जाएगी, जिससे शिवसेना को नुकसान होगा।

     शिवराज मंत्रिमंडल में कैलाश विजयवर्गीय के अलावा और भी कई दागी हैं। दिलचस्प तथ्य यह है कि पिछले मंत्रिमंडल में जिन्हें भ्रष्टाचार के आरोपों के कारण मंत्रिमंडल से बाहर किया था, वे फिर से मंत्री पद पाने में सफल रहे हैं। इनमें विजय शाह और नरोत्तम मिश्रा के नाम प्रमुख हैं। शिवराज मंत्रिमंडल के ही एक अन्य सदस्य गौरीशंकर बिसेन अपनी कार्यप्रणाली को लेकर कई बार विवादों से घिर चुके हैं। फिलहाल वे अपने भांजे मुकेश ठाकुर के कारण चर्चा में हैं। मुकेश ठाकुर, बालाघाट जिला पंचायत में उपाध्यक्ष हैं, जिनके घर से अवैध मैगनीज का ज़खीरा बरामद किया गया था। इसके तत्काल बाद यह कार्रवाई करने वाले दो अफसरों के तबादले कर दिए गए। इससे शिवराज सरकार एक बार फिर कटघरे में दिखाई दी।

      ग़ौरतलब है कि पुलिस महानिरीक्षकों की बैठक में मुख्यमंत्री ने भू,खनिज और वन माफिया के खिलाफ सख्ती से अभियान चलाने के निर्देश दिए थे। इस निर्देश पर अमल करने वाले अधिकारियों के तुरत-फुरत तबादलों से स्पष्ट है कि सरकार की कथनी और करनी में अंतर है।

      यह पहला अवसर नहीं है, जब शिवराज सरकार की कार्यशैली सवालों के घेरे में आई। इसके पूर्व भी इस तरह के कई उदाहरण सामने आ चुके हैं, जब सरकार अपने निर्देशों से पीछे हट गई। खनिज माफिया का उक्त मामला अलग है। मुरैना में तो स्थिति इतनी गंभीर है कि खनन माफिया ने कलेक्टर और पुलिस अधीक्षक तक पर गोलियां बरसाईं। इसके बाद भी उक्त माफिया का बाल बांका नहीं हुआ तो इसकी वजह यह है कि वह भाजपा सरकार का पूर्व मंत्री है, जो आज भी रकम ठोक कर अवैध उत्खनन में जुटा है। राजधानी से सटे होशंगाबाद जिले में नर्मदा नदी से रोज़ाना सैकड़ों ट्रक रेत निकाली जा रही है, जिसकी कोई रॉयल्टी नहीं चुकाई जा रही है। आरोप लगे हैं कि यह अवैध उत्खनन मुख्यमंत्री के रिश्तेदार कर रहे हैं, जिनके आगे प्रशासन नतमस्तक है।

      प्रदेश के वन विभाग में तो हालत इतनी खराब है कि रोज़ाना सैकड़ों वृक्ष काटे जाने की शिकायतों के बाद भी विभाग द्वारा कोई कदम नहीं उठाया जा रहा है। हाल ही में ओरछा अभयारण्य से आया लकड़ी का जखीरा रायसेन स्थित गढ़ी बैरियर पर पकड़ा गया है, किंतु दोषी अधिकारी पर कोई कार्रवाई नहीं की गई। इसके विपरीत वरिष्ठ अधिकारी मामले की लीपापोती में जुट गए। इसी विभाग के एक अफसर ने केंद्र सरकार को 35 लाख का चूना लगाया, जो प्रमाणित होने के बाद भी कोई कदम उठाना तो दूर, उस अफसर को पदोन्नत कर दिया गया। वन विभाग के संबंध में एक दिलचस्प तथ्य यह है कि वन संरक्षण की राशि हर साल बढ़ने के बाद भी वन भूमि का रकबा घटता जा रहा है, जो इस बात का प्रमाण है कि वन विभाग के अधिकारी केंद्रीय मदद हड़प कर वनों का सफाया करने में जुटे हैं। इस विभाग में कामचोरी का यह आलम है कि वरिष्ठ अधिकारी मौका मुआयना करने की बजाय एयर कंडीशनर केबिनों में बैठे रहते हैं। इसी कारण मध्यप्रदेश से 'टायगर स्टेट' का ख़िताब छिनने की नौबत आ गई है।

      इन स्थितियों में भी सरकार की नींद नहीं खुली है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान किसी मदारी की तरह 'अपना मध्यप्रदेश बनाओ यात्रा' के नाम पर डमरू बजाते हुए घूम रहे हैं और मंत्रालय, खासकर मुख्यमंत्री सचिवालय में बैठे आला अफसरान अपनी मनमर्जी से प्रदेश का दोहन करने में लगे हैं। प्रशासनिक कार्यशैली की बदतरी का अंदाज़ इसी से लगाया जा सकता है कि रीवा के हनुमना भूमि घोटाले के आरोपी अफसर के खिलाफ सरकार चालान पेश करने की अनुमति नहीं दे रही है और वह मुख्यमंत्री सचिवालय में बैठ कर खनिज माफियाओं को संरक्षण दे रहा है। यह सब देख कर क्या यह नहीं लगता कि शिवराज सिंह चौहान नीरों के वंशज साबित हो रहे हैं ?

महेश बाग़ी