संस्करण: 26 अप्रेल-2010

गडकरी की किरकरी
 

वीरेंद्र जैन

मने सफेद बालों को सम्मान देने की कुछ ऐसी परम्परा विकसित की है कि ऊर्जावान और नवोन्मेषी युवाओं को भी वह सम्मान नहीं मिल पाता जिसके वे अधिकारी हैं, और अपेक्षाकृत उम्रदराज किंतु कम योग्य व्यक्ति भी आदर पा लेता है। इसके विपरीत यूरोप में जहाँ साधारण परिवार से आये हुये ओबामा जैसे लोग राष्ट्रपति के पद तक पहुँच जाते हैं वहीं हमारे यहाँ ऐसे युवा किसी बड़े खानदान, पूर्व राज परिवार, या औद्योगिक घराने के नाम पर ही किसी ऊंची पदवी को पा पाता है।

भाजपा के नये अध्यक्ष नितिन गडकरी के साथ भी कुछ कुछ ऐसा ही होता नजर आ रहा है। वे संघ के निर्देश पर भाजपा के अध्यक्ष तो चुन लिये गये हैं किंतु वरिष्ठ भाजपा नेताओं के मन में उनके प्रति सम्मान का भाव नहीं दिखाई देता। जो किसी पद पर भी नहीं है, वे भी अपने को भाजपा भाग्य विधाता मान कर चल रहे हैं।

ताजा घटना कभी भाजपा के थिंकटैंक के रूप में चर्चित रहे गोविन्दाचार्य की है जिन्होंने भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष को अपनी जुबान पर लगाम लगाने की सलाह देते हुये कहा है कि उनकी अभी की हरकतों से उनकी छवि अनर्गल बोलने वाले सतही और अक्षम नेता की बनती जा रही है और ऐसी छवि बनने से रोकने के लिए वाणी पर संयम की जरूरत है। उन्होंने कहा कि मैं न तो पार्टी से निष्काषित किया गया और न ही पार्टी से त्यागपत्र दिया। नौ सितम्बर 2000 को मैं अध्ययन अवकाश पर गया और 2003 के बाद मैंने भाजपा की प्राथमिक सदस्यता का पुन: नवीनीकरण नहीं कराया और स्वयं को पार्टी से मुक्त कर लिया।

श्री गडकरी को जानकारी विहीन निरूपित करते हुये गोबिन्दाचार्य ने कहा कि आप और आपके पार्टी पदाधिकारियों को बयान या साक्षात्कार देने से पूर्व मेरी विशिष्ट स्थिति का ज्ञान होना चाहिए, और वाणी में संयम का पालन करना चाहिए। आपकी पार्टी की आंतरिक गुटबाजी और गड़बड़ियों का शिकार मुझे बनाने से मेरी छवि पर आघात होता है।

स्मरणीय है कि श्री गडकरी ने एक साक्षात्कार में कहा था कि अगर पार्टी छोड़ कर गये नेता प्रायश्चित कर रहे हैं तो हम उचित फोरम पर विचार करेंगे। स्मरणीय यह भी है कि श्री गोविन्दाचार्य सुश्री उमा भारती के गुरु के रूप में विख्यात हैं और वाणी में सयंम की यह सीख उन्होंने कभी अपनी शिष्या को देने की जरूरत नहीं समझी।

भाजपा के किताबी राष्ट्रीय अध्यक्ष के सामने संभवत: संकट यह है कि पार्टी संविधान में थिंक टैंक का कोई पद नहीं है इसलिए यह नहीं पता चल सकता कि यह पद पार्टी अध्यक्ष से ऊंचा होता है या नीचा होता है, ना ही पार्टी संविधान में इस स्थिति के बारे में कुछ लिखा है कि कोई व्यक्ति अध्ययन अवकाश का बहाना बना कर पार्टी के काम से मुक्ति ले ले और उचित समय पर अपनी सदस्यता का नवीनीकरण भी नहीं कराये तो उसे पार्टी के भीतर माना जा सकता है या बाहर माना जा सकता है। यह कुछ कुछ वैसा ही है कि कोई सरकारी कर्मचारी ट्रांसफर से बचने के लिए बीमारी का बहाना बना कर रिलीव न हो और फिर ज्वाइन ही न करे। भाजपा के मामले में तो इस प्रकरण को आर एस एस की बड़ी अदालत ही फैसला देगी कि वे पार्टी के अन्दर हैं या बाहर हैं।

फैसला कुछ भी हो किंतु अपनी छवि को बचाने के लिए गोविन्दाचार्य ने पार्टी अध्यक्ष की छवि को कठपुतली की छवि दे डाली है जो कुछ भी तय नहीं कर सकता।

कहा जाता है कि इससे पूर्व भी संघ के निर्देश पर सुश्री उमा भारती को भाजपा में सम्मिलित किया जाना था जिन्होंने अपनी ही बनायी पार्टी से त्याग पत्र दे दिया था और प्रवेश के लिए लगातार नागपुर और दिल्ली के चक्कर लगा रहीं थीं। किंतु भाजपा के पूर्व अध्यक्ष वैंकय्या नायडू, सुषमा स्वराज, अरुण जैटली, शिवराज सिंह चौहान, नरेन्द्र तोमर आदि ने एक स्वर से विरोध व्यक्त करके गडकरी की भूमिका को असमंजस में डाल दिया था।कहा जाता है कि उनको प्रवेश देने की स्थिति में शिवराज सिंह ने मुख्यमंत्री पद से त्यागपत्र देने की धमकी तक दे दी थी। दूसरी ओर अयोध्या की बाबरी मस्जिद टूटने के मामले में उनकी गवाही महत्वपूर्ण हो सकती है इसलिए भाजपा उन्हें अनुशासन में बाँध कर रखना चाहती है।

स्मरणीय है कि लिब्राहन आयोग के सामने सुश्री उमा भारती जो साध्वियों जैसे कपड़े पहनती हैं, ने यह कहा था कि 6 दिसम्बर 92 को अयोध्या में क्या हुआ था उन्हें कुछ भी याद नहीं है। श्री गडकरी की चिंताएं लगभग वैसी ही आदर्शमुखी हैं, जैसी कि प्रधानमंत्री बनने के बाद बम्बई अधिवेशन में राजीव गांधी की थीं। वे पार्टी में प्रशिक्षण प्रारम्भ करना चाहते हैं, चापलूसी, और पैर छूने की परम्परा को समाप्त करना चाहते हैं तथा अगले आम चुनाव तक दस प्रतिशत वोट बढ़ाना चाहते हैं। किंतु हुआ यह है कि उनके आने के बाद कर्नाटक के मुख्यमंत्री को पूरी शासन व्यवस्था बेल्लारी के व्यापारी बन्धुओं के चरणों में डाल देनी पड़ी और ईमानदार और समर्पित कार्यकर्ता शोभा को मंत्रिमण्डल से हटाने को विवश होना पड़ा।

झारखण्ड में शिबू सोरेन के आगे नाक रगड़ना पड़ी और जिन्हें दागी कह कह कर उन्होंने संसद नहीं चलने दी थी उन्ही के नेतृत्व को स्वीकार करना पड़ा। मध्य प्रदेश में सारे दागी मंत्रियों को वापिस मंत्रिमण्डल में शामिल करना पड़ा।

गडकरी ने अपने विश्वस्त लोगों का जो गुट तैयार किया है उसमें महाराष्ट्र का ही वर्चस्व है जिससे अनेक दूसरे लोग असंतुष्ट हैं। भाजपा के स्टार शत्रुघ्न सिन्हा ने तो सार्वजनिक रूप से भी निन्दा की है, और गडकरी को चुप्पी लगा कर बैठना पड़ा। अब यदि ऐसी घटनाएं लगातार बढती रहीं तो उनकी साख का और ह्रास होगा, इसलिए अनुशासन बनाये बिना वे अध्यक्ष पद की जिम्मेवारी नहीं निभा सकेंगे।

 

वीरेंद्र जैन