संस्करण: 25 अक्टूबर-2010

संक्रमण काल से गुज़रता संघ

 ? महेश बाग़ी

                       

      ल तक राम मंदिर को आस्था का सवाल बताने वाले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का सुर अब बदल गया है। इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले पर संघ प्रमुख मोहन भागवत संतुष्ट नज़र आए। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह संघ परिवार के रूख़ में परिवर्तन का संकेत नहीं है, अपितु मौजूदा हालात में ऐसा करना उसकी मजबूरी है। संघ परिवार खुद को सामाजिक और सांस्कृतिक संगठन बताता आया है। समय-समय पर संघ नेता खुद को राजनीति निरपेक्ष भी कहते रहे हैं, किंतु असल में क्या है, यह सब जानते हैं। संघ के कई अनुषांगिक संगठन हैं, मसलन-विश्व हिंदू परिषद, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, स्वदेशी जागरण मंच, दुर्गा वाहिनी, बजरंग दल, भारतीय मजदूर संघ, भारतीय किसान संघ, वनवासी कल्याण परिषद आदि। इनके अलावा उसकी राजनीतिक दुकाई है भारतीय जनता पार्टी, जो पहले जनसंघ के नाम से जानी जाती थी।

         1925 में केशव बलिराम हेड़गेवार ने संघ की स्थापना हिंदुत्व के उत्थान के उद्देश्य से की थी और देश विभाजन की जिम्मेदारी महात्मा गांधी पर थोपने और उनकी हत्या का षड़यंत्र रचने के आरोप में संघ प्रतिबंधा भी झेल चुका है। संघ परिवार को जब लगा कि सिर्फ़ इस संगठन के ज़रिये लक्ष्य प्राप्त नहीं किया जा सकता तो उसने जनसंघ का गठन किया, जिसे अपेक्षित सफलता नहीं मिल सकी। आपातकाल के बाद जनसंघ जनता पार्टी में मर्ज़ हो गया और दोहरी सदस्यता के मुद्दे पर जपा के विघटन का कारण भी बना। इसके बाद भारतीय जनता पार्टी अस्तित्व में आई, जो राम मंदिर आंदोलन के सहारे तीन बार केंद्र में सत्ता पाने में भी सफल रही, मगर गठबंधन सरकार के चलते न मंदिर बना, न धारा 370 खत्म हुई और न ही समान नागरिक संहित लागू हुई। नतीजतन उसे केन्द्र से बाहर होना पड़ा।

         यही मुद्दे अब संघ और भाजपा में टकराव के विषय बन रहे हैं। यद्यपि संघ प्रमुख मोहन भागवत अपनी उदार छवि के कारण कट्टरता के पक्षधार नहीं हैं, तथापि वे ये मुद्दे छोड़ने को भी तैयार नहीं हैं। उधार संघ की पसंद से भाजपा अध्यक्ष बनाए गए नितिन गडकरी कहते हैं कि हिंदुत्व भाजपा की आत्मा तो है, लेकिन यह न राजनीति का विषय है और न ही विवाद का। लोकसभा चुनाव में हार के बाद भाजपा में हिंदुत्व और संघ से रिश्तों को लेकर सवाल उठने लगे थे। लालकृष्ण आडवाणी के क़रीबी रहे सुधीन्द्र कुलकर्णी और स्वप्न दासगुप्ता ने तो लेख लिख कर भाजपा को संधा से किनारा करने की सलाह दे दी थी।

         संघ की विभिन्न इकाइयों से निकले लोगों ने समाज के लगभग हर क्षेत्र में एक ख़ास राजनीतिक धारा तैयार की है, जिसे उसकी ही भाषा में राष्ट्रवाद की राजनीति कहा जाता है। अपने प्रचारकों और दीक्षित स्वयंसेवकों के माध्यम से इन सबकी कमान संघ के हाथों में ही है। राष्ट्रवाद की यही राजनीति अब संघ परिवार के लिए संक्रमण काल की स्थिति निर्मित कर रही हैं। संघ परिवार से लेकर उसके अनुषांगिक संगठनों में राजनीतिक महत्वकांक्षाएं हावी होती जा रही हैं। अब नेताओं में हिंदुत्व की जगह अपने वैभव की भावनाएं हिलोरे मार रही हैं। संघ के लगभग हर संगठन के नेताओं को अब सत्ता-सुख लुभा रहा है। इससे संघ के निष्ठावान नेता बेहद चिंतित हैं।

         संघ के संस्थापन हेड़गेवार की धारणा थी कि व्यक्ति और समाज का वैचारिक प्रशिक्षण होने से राजनीति स्वत: ही बदल जाएगी, किंतु ऐसा नहीं हुआ। इसी कारण माधाव सदाशिव गोलवलकर ने साठ के दशक में संघ की राजनीतिक इकाई जनसंघ की स्थापना की। संघ परिवार जानता था कि सिर्फ हिंदुत्व के मुद्दे पर सत्ता पाना आसान नहीं है। इसलिए उसने कांग्रेस विरोधी दलों के साथ गठबंधन किया संविद सरकारों में शरीक होकर सत्ता का स्वाद चखा। बालासाहब देवरस ने थोड़ी और उदारवादिता का परिचय दिया और 1974 के जयप्रकाश आंदोलन में जनसंघ को भी शामिल कर दिया। अस्सी के दशक में जब इंदिरा गांधी की हत्या से कांग्रेस कुछ कमज़ोर होती दिखाई दी तो संघ ने सत्ता की ख़ातिर अपने धुर विरोधी कम्युनिष्टों से हाथ मिलाने से भी संकोच नहीं किया, हालांकि फिर भी सत्ता उससे दूर ही रही।

         भाजपा को केंद्र की सत्ता दिलाने में लालकृष्ण आडवाणी की रथयात्रा का विशेष योगदान रहा, जिसकी बदौलत वह 1989 में गठबंधन सरकार बनाने में कामयाब रही। तीन बार केंद्रीय सत्ता का सुख भाजपा  ने भोगा और संघ की दुविधा यह रही कि उसके पास अटल बिहारी वाजपेयी या लालकृष्ण आडवाणी से ऊंचे कद का कोई नेता नहीं रहा। एक समय था, जब भाजपा नेता हर छोटे-बड़े फैसले लेने से पहले संघ मुख्यालय पर दस्तक देते थे, किंतु  स्थिति बदली और संघ के नेता प्रधानमंत्री तथा केन्द्रीय मंत्रियों के बंगलों पर हाज़िरी देते नज़र आने लगे। सत्ता मिलते ही संघ नेता ठेका, कोटा परमिट, ट्रांसफर आदि में विशेष रूचि लेने लगे। संघ की ही ख़ातिर भाजपा नीति सरकार ने सरकारी प्रतिष्ठान उसके निष्ठावान लोगों को बेचे। आज हालात ये हैं कि भाजपा गुटबाज़ी, चापलूसी, स्वार्थ-परकता और भ्रष्टाचार जैसी उन बुराइयों में शरीक हो गई हैं, जिनसे लड़ने की वह दुहाई दिया करती थी। इन सबके आगे संघ परिवार बेबस नज़र आ रहा है। भाजपा शासित राज्यों में तो सत्ता की बुराइयां कितनी हावी है, यह कर्नाटक में हुए घटनाक्रम से समझा जा सकता है। ऐसे में अब यह देखना दिलचस्प होगा कि संघ प्रमुख मोहन भागवत अब क्या करते हैं ?

 

 ? महेश बाग़ी