संस्करण: 25 अक्टूबर-2010

हिन्दुधर्म और हिन्दुत्व के फरक को

आप कब समझेंगे भागवतजी ?

 

? सुभाष गाताड़े

                          

         संघ सुप्रीमो मोहन भागवत अयोध्या मामले में आए अदालती फैसले के बाद इन दिनों 'जीतम् मया' (मैं जीत गया) जैसी मुद्रा में दिखते हैं। न अदालत ने बाबरी मस्जिद के विध्वंस के मानवद्रोही अपराध पर कुछ कहा, न कानून के मुताबिक चलने की कोशिश की बल्कि बहुसंख्यकों की आस्था के नाम पर फैसला दिया, इससे अधिक उन्हें क्या चाहिए था ?

         लाजिम है कि उन्हें लग रहा है कि यही वह माकूल वक्त है कि अपने कई 'जीवनदानी' कार्यकर्ताओं की आतंकी कार्रवाइयों में संलिप्तता के चलते संघ को जो बगलें झांकने के लिए मजबूर होना पड़ा था, उस पैंतरे को अब छोड़ दिया जाए और विरोधियों के खिलाफ आक्रामक हुआ जाए। यह अकारण नहीं कि विजयादशमी के दिन अपनी तकरीर में उन्होंने यह ऐलान कर दिया कि हिन्दू और आतंकवाद दोनों लब्ज विरोधाभासी हैं। कहने का लुब्बेलुआब यही कि अगर कोई हिन्दू है तो वह आतंकवाद में शामिल नहीं हो सकता। उन्होंने आगे यह भी जोड़ा कि जो लोग हिन्दुओं के आतंकवाद में संलिप्तता की बात कर रहे हैं, वे हिन्दुओं को कमजोर कर रहे हैं। वैसे उन्होंने अयोध्या पर आए अदालती फैसले की भी तारीफ की, और यहभी बताया कि आनेवाले दिनों में कश्मीर को फोकस में रहेगा।

         इसके पहले कि जनाब मोहन भागवत के बयान पर गौर किया जाए, यह बताना समीचीन होगा कि उनका यह बयान विजयादशमी के दिन आया। मालूम हो कि विजयादशमी के दिन संघ के सुप्रीमो की तकरीर अहम समझी जाती है क्योंकि इक्कीसवीं सदी में भी एकचालकानुवर्तित्व के सिध्दान्त के तहत चल रहा यह संगठन - जो हर किस्म की जवाबदेही और पारदर्शिता से अपने आप को ऊपर पाता है -तथा देश की प्रमुख विपक्षी पार्टी का रिमोट कन्ट्रोल भी अपने पास रखे हुए है, उसके आने वाले साल भर के कामों का एक मोटा खाका इसमें पेश होता है। जानकार बता सकते हैं कि मोहन भागवत के पहले सुप्रीमो के पद पर रहे जनाब के सी सुदर्शन द्वारा ऐसे ही मौकों पर दिए कई वक्तव्य 'परिवारजनों' के भीतर ही जबरदस्त विवाद का विषय बने थे। आम लोगों के बीच भी यह बात चल पड़ी थी कि सुदर्शनजी बोलते पहले हैं, और सोचते बाद में हैं। शायद ऐसे ही प्रलाप करने की आदत के चलते उनके कुनबे के लोगों ने उन्हें ससम्मान बिदा करना ही मुनासिब समझा।

         वैसे हिन्दू और आतंकवाद को विरोधाभासी बतानेवाले भागवतजी से यह पूछने का अवश्य मन करता है कि आजाद हिन्दोस्तां के पहले आतंकवादी कहे गए नथुराम गोडसे और उसके करीबी मदनलाल पाहवा, करकरे, परचुरे आदि के हिन्दू होने पर उन्हें क्या कोई शक है, जिस गिरोह ने बीसवीं सदी के सबसे बड़े हिन्दू कहे जा सकनेवाले -महात्मा गांधी की - सुनियोजित हत्या की थी। और जिस समाचार को सुन कर देश के कई भागों में अपने आप को हिन्दुओं के सबसे बड़े हितैषी कहलानेवाली संघी जमातों ने मिठाइयां बाटी थीं। पता नहीं कि भागवतजी कितना इस बात को जानते हैं कि गांधी हत्या को लेकर बाद के दिनों में संसद के निर्देश पर कपूर आयोग बना था, जिसने इस हत्या की छूटे हुए कई कोणों से जांच की थी, जिसके सामने कई अहम गवाह भी आए थे। कपूर आयोग का निष्कर्ष साफ था, 1948 में गांधी हत्या की साजिश से बरी हुए सावरकर, इस हत्या के प्रमुख साजिशकर्ताओं में थे। अर्थात वह नाथुराम गोडसे के आतंकी गिरोह के सरगना थे। यह जुदा बात है कि तब तक सावरकर की मौत हो चुकी थी, लिहाजा इस मसले पर आगे कुछ कदम नहीं बढ़ाए जा सके थे।

         कहने का तात्पर्य यह कि आतंकवाद को न किसी खास धर्म से जोड़ा जा सकता है और न किसी खास समुदाय से। एक सहजबोधा के तौर पर देखे तो बात आसान लगती है, मगर 9/11 के बाद अमेरिका ने अपनी वैश्विक महत्वाकांक्षाओं को नए पंख देने के लिए जिस तरह आतंकवाद के खिलाफ युध्द का ऐलान किया और जिस तरह इसका फोकस इस्लाम धर्म और उसके माननेवाले बने, उसके बाद इस आसानसी बात को समझाने में लोगों को काफी मशक्कत करनी पड़ी। 

         यह अलग बात है कि मालेगांव के बम धामाके (सितम्बर 2008) की जिस पेशेवर ढंग से जांच हुई और जिस तरह अभिनव भारत के आतंकियों का -फिर चाहे 'साधवी' प्रज्ञा हों, लेठनन्ट कर्नल पुरोहित हो, फर्जी शंकराचार्य दयानन्द पाण्डे हो, रिटायर्ड फौजी रमेश उपाध्याय हो, भोसला मिलिटरी स्कूल के संचालक रायकर  जैसे लोग हों या हिमानी सावरकर, दिल्ली के बड़े डॉक्टर आर पी सिंह या पूर्व सांसद बी एल शर्मा का नाम सामने आया, तभी यह बात नए सिरे से विधिवत् रेखांकित हुई कि आतंकी हर धर्म में पैदा हो सकते हैं। साधारण लोगों के लिए भी यह बात शीशे की तरह साफ हुई कि 9/11 के बाद आतंकवाद को इस्लाम या उसके माननेवालों के साथ ही जोड़ने का अमेरिकी रवैया और उसके मुताबिक सभी लोगों का चलना कितना गलत है और तथ्यों से परे हैं।

         वैसे यहां मूल बात यह नहीं है कि कौन आतंकी हो सकता है या नहीं। यहां मूल बात है कि शब्दों का हेरफेर करके संघ सुप्रीमो इस विराट हकीकत पर भी पर्दा डालना चाह रहे हैं। वह कहते हैं कि हिन्दुओं को अर्थात समूचे समुदाय को आतंकी कहा जा रहा है। किसी नासमझ ने हिन्दू आतंकवाद की बात कही हो, और नासमझी में कहे जा रहा हो, मगर शब्दों पर ठीक से ध्यान दिया जाए तो अधिकतर लोग हिन्दुत्व आतंकवाद की बात करते हैं।

         चन्द लोग तुरन्त यह कहते मिलेंगे फिर इसमें क्या फर्क ?

         अगर फरक को ठीक से समझना हो तो हिन्दुत्व फलसफे के शुरूआती महारथी कहे जा सकनेवाले सावरकर की ओर लौट सकते हैं, जिनकी किताब 'हिन्दुत्व' आज भी तमाम हिन्दुत्ववादी जमातों में बाइबिल समझी जाती है। संघ के संस्थापक हेडगेवार या मुंजे हो, बाद के सुप्रीमो गोलवलकर हो या बाद की पीढ़ी नेता हों , सभी के लिए यही किताब एक मार्गदर्शक ग्रंथ है।

         सावरकर 'हिन्दुत्व' शीर्षक इस किताब में हिन्दु धर्म और हिन्दुत्व में साफ फरक करते हैं। वह कहते हैं

         दरअसल हिन्दुइजम (अर्थात हिन्दु धर्म) हिन्दुत्व की व्युत्पत्ति, अंश या हिस्सा है। जब तक इस बात को स्पष्ट नहीं किया जाता कि हिन्दुत्व के क्या मायने हैं, हिन्दुइजम अनाकलनीय और अस्पष्ट रहता है। इन दो शब्दों के फरक को स्पष्ट न कर पाने के चलते हिन्दू सभ्यता की साझी विरासत  का वाहक विभिन्न समुदायों में जबरदस्त गलतफहमी और परस्पर सन्देह पैदा हुए हैं।...यहां इस बात को रेखांकित करना काफी है कि हिन्दुत्व को हिन्दुइजम के समकक्ष नहीं समझा जा सकता।

         मेरे खयाल से इसके पहले कि भागवतजी के कथन से लोग दिग्भ्रमित हों, उन्हें चाहिए कि सावरकर की इस चर्चित किताब 'हिन्दुत्व' को ठीक से पढ़ें, तभी वह जान सकते हैं कि निशाने पर हिन्दु धर्म या उसे माननेवाले नहीं हैं। जिस तरह इस्लाम और पोलिटिकल इस्लाम को एक ही पलड़े पर नहीं रखा जा सकता, उसी तरह हिन्दुइजम और हिन्दुत्व को एक ही तराजू पर नहीं रखा जा सकता।

         वैसे आतंकी घटनाओं में संघी प्रचारकों की संलिप्तता कोई नयी परिघटना नहीं है। मुल्क के बंटवारे के पहले या उसके बाद भी संघ के कार्यकर्ता ऐसी घटनाओं में पकड़े गए हैं या बम बनाते मारे भी गए हैं। दिलचस्प है कि आजादी के वास्तविक दीवानें इन्कलाबियों की तरह उनकी कार्रवाइयां अंग्रेजों या उनके गूर्गों के खिलाफ नहीं बल्कि मुसलमानों के खिलाफ या उनके हिसाब से अन्य दुश्मन समुदायों के खिलाफ नज़र आती हैं। कराची का शिकारपुर बम काण्ड बहुत मशहूर है, जब एक मकान में हुए बम विस्फोट में संघ के दो कार्यकर्ता मारे गए थे और एक जन को पकड़ लिया गया था, यह गिरफ्तारी पाकिस्तानी पुलिस ने की थी। (देखें, इकोनोमिक एण्ड पोलिटिकल वीकली, आर एस एस इन सिन्धा, 8 जुलाई 2006) संघ के इक्कीस कार्यकर्ताओं के समूह ने कराची में जगह जगह विस्फोट कराने के लिए एक मकान में बम इकट्ठा किए थे। किन्हीं रायबहादुर तोलाराम का मकान लिया गया था, जिसमें कहानी यह बनायी गयी थी कि बच्चों को टयूशन पढ़ाने हैं। वास्तविक तैयारी दूसरी चल रही थी। अचानक हुए बम विस्फोट में जहां समूचा मकान ढह गया वहां वासुदेव और प्रभु बदलानी नामक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के 'जीवनदानी' कार्यकर्ताओं की ठौर मौत हुई थी। 'ब्रदरहुड इन सेफ्रन' शीर्षक किताब में एण्डरसन एवम दामले भी इस घटना की विधिवत चर्चा करते हैं। जानकारों के मुताबिक उन दिनों कराची में संघ के कामों की देखरेख का जिम्मा लालकृष्ण आडवाणी के हाथों में था। यह एक अलग पड़ताल का विषय है कि संघ के स्वयंसेवकों द्वारा रची गयी इस आतंकी साजिश से जनाब आडवाणी को दूर रखा गया था या उन्हें भी इस बात की जानकारी थी।

? सुभाष गाताड़े