संस्करण: 25  जून-2012

गुमता बचपन

? एल.एस.हरदेनिया

               भी कुछ दिन पहले खबरें आई थीं कि मध्यप्रदेश से भारी संख्या में महिलाओं और बच्चियों का अपहरण किया जाता है और उन्हें बेचा जाता है। अब यह तथ्य उभर कर आया है कि मध्यप्रदेश से छोटे बच्चों का अपहरण कर उन्हें भी बेचा जाता है। इस तरह यह प्रदेश महिलओं और बच्चों के लिए काफी असुरक्षित है। इस संबंध में अनेक सर्वेक्षण किये गये हैं जिनके आधार पर यह कहा जा सकता है कि छोटे बच्चे और बच्चियां बड़े पैमाने पर असामाजिक तत्वों की साजिश के शिकार हो रहे हैं।  

               मधयप्रदेश में यह पूरा व्यापार गुमशुदगी की आड़ में चल रहा है। गुमशुदगी के आंकड़ों को देखें तो मधयप्रदेश में रोज 24 बच्चे खो रहे हैं और उनमें से भी 3 बालक-बालिकाओं का कभी पता नहीं चल पाता है। यदि लंबी अवधि के आंकड़ों पर नजर डालें तो हम पाते हैं कि मध्यप्रदेश में ही पिछले 10वर्षों में 75521बच्चे गुमशुदा के रूप में दर्ज हुये। जिनमें से 62585 बच्चे तो बरामद हो गये लेकिन अभी भी 12936 बच्चों का कोई अता-पता नहीं। बेटी बचाओं का नारा बुलंद करने वाले इस राज्य में इन गुमशुदा बच्चों में 8180 बालिकायें हैं जबकि 4528 बालक हैं। यह संख्या तो दर्ज प्रकरणों की संख्या है।

              आदिवासी क्षेत्रों से विगत 9 वर्षों में गायब होने वाली कुल बालक-बालिकाओं में से 44 प्रतिशत बालिकाओं का कहीं पता नहीं है। इसे इस तरह भी देखना होगा कि ज्यादतर वे आदिवासी इलाके जहां पर कि लिंगानुपात बेहतर है, यानी 1000से ऊपर है,वहां से आदिवासी लड़कियों के गायब होने का प्रतिशत ज्यादा है। प्रदेश से अब दलित बालिकाओं के गायब होने का सिलसिला भी चल पड़ा है। खंडवा, खरगौन और रायसेन जिलों से बालिकाओं के जाने के नये मामले सामने आने लगे हैं। यह बालिकायें अब शुध्दिकरण के बाद उन समुदायों में बेची जा रही हैं जो कि कथित रूप से सवर्ण जाति के हैं। मध्यप्रदेश में लगातार बच्चों के गुमशुदा होने की खबरें आ रही हैं। इस मसले पर पड़ताल करने पर पाया गया कि अब सवाल केवल गुमशुदा होने का नहीं रह गया है बल्कि इससे भी आगे बहुतेरे प्रकरणों में बच्चों के बेचे जाने के मामले सामने आने लगे हैं। प्रदेश से बच्चे जा ही नहीं रहे हैं बल्कि यहां पर खरीदकर लाये भी जा रहे हैं। प्रदेश, अब बाल तस्करी का नया गढ़ बनता जा रहा है।

                 विकास संवाद ने इस मुद्दे पर बड़े पैमाने पर जानकारी मंडला, डिण्डौरी, सिवनी, बालाघाट, कटनी, भोपाल आदि जिलो से विस्तृत जानकारी एकत्रित की। जानकारी एकत्रित करने के लिये विकास संवाद की टीम उन परिवारों से भी मिलने गई जिनके बच्चे गुम हो गये हैं और कई साल बीत जाने के बाद भी जिन्हें ढँढा नहीं जा सका है। सर्वेक्षण में विकास संवाद ने यह पाया कि बाल व्यापार के मामले में मध्यप्रदेश लगभग चिंता जनक स्थिति में पहुँच गया है। इस संबंध में एक महत्वपूर्ण बात यह सामने आयी। बच्चों की गुमशुदगी की घटनायें आदिवासी इलाकों में ज्यादा हो रही है। शायद इसका कारण आदिवासी क्षेत्रों में व्याप्त गरीबी है। शायद निहित स्वार्थ आदिवासियों की गरीबी का लाभ उठाते है। यह बात भी सामने आई कि आदिवासी क्षेत्रों में बालक-बालिकाओं के खो जाने का सिलसिला ज्यादा बड़े पैमाने पर है। आदिवासी क्षेत्रों से विगत 8 वर्षों में गायब होने वाले बालक-बालिकाओं में 49 प्रतिशत बालिकाओं का पता नहीं चल सका है। इससे स्वभावत: यह नतीजा निकाला जा सकता है कि इन आदिवासी बालिकाओं का उपभोग यौन व्यापार के लिए किया जा रहा है या तो उन्हें उन क्षेत्रों में बेच दिया गया है जहां बालिकाओं का लिंगानुपात कम है या उन्हें वैश्यवृत्ति में ढकेल दिया गया है। इस संबंध में अन्य सूत्रों से यह भी पता लगा है कि कुछ मामलों में इन बालिकाओं को परिवार की सहमति से बेचा जाता है। इस तरह की बात हमें कुछ दिन पहले बैतूल के कलेक्टर ने बतायी, जब हम लोग एक लोमहर्षक घटना की जांच करने गये थे जिसमें एक आदिवासी महिला की इसलिये हत्या कर दी गई थी क्योंकि उसके द्वारा पुलिस में दर्ज उस रिपोर्ट को वापिस ले लेने से इंकार कर दिया गया था जिसमें उसने अपनी बेटी के साथ हुए सामूहिक बलात्कार की शिकायत की थी। जब बैतूल जिले से बड़ी संख्या में महिलाओं के गायब होने के मुद्दे पर बात हुई तो उन्होंने जहां एक ओर पुलिस की कमजोरी को स्वीकार किया वहीं उन्होंने इस बात की भी संभावना प्रगट की कि गरीबी के कारण परिवार भी अपनी बच्चियों और महिलाओं को दलालों को सौंप देते हैं। स्पष्ट है कि इसके लिये व्याप्त गरीबी काफी हद तक जिम्मेदार है।

                  इसके अलावा ज्ञात हो कि प्रदेश के पड़ोसी राज्यों महाराष्ट्र, राजस्थान, उत्तरप्रदेश में लिंगानुपात बहुत कम है। जबकि प्रदेश के आदिवासी जिलों बालाघाट, मंड़ला व डिण्डौरी में वर्ष 2001 की जनगणना के अनुसार लिंगानुपात 1000 के आसपास रहा हे। ऐसी स्थिति में प्रदेश के पड़ोसी राज्यों में लड़कियों की भारी मांग है। बस यही मांग इन बच्चों को हमारे बीच में से ले जा रही है। हाल ही में खंडवा जिले में, डिण्डौरी के बैगाचक क्षेत्र से बेचे गये 7 आदिवासी बच्चों को  सीआईडी भोपाल व खंडवा पुलिस के संयुक्त अभियान में बरामद किया गया। ये सभी बच्चे टयूबवेल खोदने वाली मशीन पर काम करते थे। मंदसौर व नीमच पुलिस ने संयुक्त कार्यवाही करते हुये 57बालिकाओं को अवैधा खरीद-फरोख्त के चलते बरामद किया। छुड़ाई गई 57 बालिकाओं में से 25 को उनके परिवार से वापिस मिला दिया है। इन प्रकरणों में यह बात तो सामने आती ही है कि प्रदेश से अब बच्चे केवल जा ही नहीं रहें हैं बल्कि यहां पर बड़ी तादाद में आ भी रहे हैं। धीरे-धीरे प्रदेश तस्करी का गढ़ बनता ही जा रहा हैं। आखिर बड़े पैमाने पर होने वाली गुमशुदगी को रोकने के लिए सरकार क्या कर सकती है?वैसे यह समस्या अकेले मध्यप्रदेश की नहीं है। यह एक राष्ट्रव्यापी समस्या है। परंतु मध्यप्रदेश में यह समस्या कुछ ज्यादा ही गंभीर हो गई है।

               मधयप्रदेश में बाल सुरक्षा पर बजट केवल 0.13 प्रतिशत ही है जो अन्य राज्यों जैसे आंध्रप्रदेश (0.99), हिमाचल प्रदेश (0.44) और उड़ीसा (0.40) की अपेक्षा कम है। मधयप्रदेश में प्रति बच्चा सुरक्षा पर होने वाला खर्च मात्र 1.94 रूपये प्रति वर्ष है जो कि अन्य राज्यों जैसे आंध्रप्रदेश (27.54), हिमाचल प्रदेश (22.21) और उड़ीसा (7.01) की अपेक्षा बहुत कम है। राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग के अनुसार लगभग 45000 बच्चे प्रति वर्ष केवल भारत में गायब होते हैं और इनमें से भी 11000 बच्चों को कोई सुराग नहीं मिल पाता है। राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग के अनुसार ही 80 प्रतिशत पुलिसवाले गायब होने वाले बच्चों की तलाश में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाते हैं। भारत में तत्कालीन 593 जिलों में से 378 जिले मानव व्यापार के मामले में संवेदनशील माने गये थे। आज यह संख्या बढ़कर 400 से ऊपर हो गई है। मधयप्रदेश में मानव व्यापार की अत्यधिक गंभीर स्थिति को देखते हुये यहां पर 24 मानव व्यापार विरोधी ईकाईयों की स्थापना की गई है। क्या आप जानते है कि पूरे देश में स्थापित एंटी ह्यूमन टे्रफिकिंग यूनिटों में से मधयप्रदेश में 24 एंटी ह्यूमन टे्रफिकिंग यूनिटों की स्थापना हुई और जिनमें से प्रत्येक को 7 लाख 58 हजार रूपयों के मान से वर्ष 2010-11 में 60,64,000 रूपये की राशि मुहैया कराई गई है।  उच्चतम न्यायालय ने वर्ष 2002 में ही गुमशुदा बच्चों को लेकर हर राज्य की पुलिस को दिशानिर्देश दिये थे लेकिन राज्यों ने उन पर कोई खास अमल नहीं किया। भारत सरकार के गृह मंत्रालय, नई दिल्ली द्वारा 31 जनवरी 2012 को एक एडवाईजरी बनाने संबंध पत्र लिखा था जो कि सघन रूप से गुमशुदा की तलाश करे और बाल व्यापार को रोके। इस पत्र में यह भी उल्लेख किया गया है कि 09 सितंबर, 2009 को, 14 जुलाई, 2010 को 02 दिसंबर 2011 को तथा 4 जनवरी, 2012 को भी मंत्रालय द्वारा पत्र लिखे गये हैं।


? एल.एस.हरदेनिया