संस्करण: 25  जून-2012

मोदी की नयी साम्प्रदायिक रणनीति

? शाहनवाज आलम

                हिंदुत्व के सबसे उन्नत प्रयोगशाला गुजरात में जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आ रहे हैं वैसे-वैसे साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण की कोशिशें तेज होती जा रही हैं। ताजा मामला पलिताना शहर का है जहां भाजपा के नियंत्रण वाले नगर पालिका परिषद ने अंडा समेत मांसाहार के बिकने पर प्रतिबंध लगा दिया है।

               गौरतलब है कि एक कथित जैन संत मैत्रीप्रभा सागर द्वारा पलीताना में मांसाहार के बिकने पर प्रतिबंध की मांग को लेकर आमरण अनशन और आत्मदाह की धमकी क बाद मोदी सरकार ने इस कथित संत के दबाव में यह फैसला लिया है। लेकिन सवाल उठता है कि क्या मोदी सरकार ने ऐसा सिर्फ इस कथित संत के दबाव में किया है या दिसंबर तक होने वाले विधान सभा चुनावों के लिये यह उसे एक कारगर हथियार लग रहा है ? इस सवाल का एक दूसरा तथ्यातमक पहलू यह भी है कि इस मसले पर 'जनभावना' का तर्क भी सरकार के पक्ष में नहीं जाता। क्योंकि पूरे गुजरात में जैन धर्म को मानने वालों की कुल आबादी 2011 के जनगणना के मुताबिक महज एक प्रतिशत है।

                बावजूद इसके अगर मोदी सरकार हिंदुओं के एक बहुत बडे हिस्से को जो अंडा खाता है जैसा कि सोशल नेटवर्किंग साईट्स पर इस मसले पर चलने वाले बहसों से समझा जा सकता है, की भावनाओं को भी नजरअंदाज कर, ऐसा क्यों कर रही है ?

                दरअसल, संघ परिवार की एक अहम रणनीति समय-समय पर पुराने और अतार्किक धारणाओं के पुर्ननवीकरण की होती है। जिसके पीछे जरूरी नहीं कि पूरा हिंदु समाज वैचारिक और धारणागत स्तर पर खडा हो। लेकिन अगर वह एक छोटे से हिस्से को भी अपने साथ खडा कर लेती है तो बाकी का हिंदु समाज खुद उसके पीछे गोलबंद हो जाता है। बेशक उन धारणाओं के खिलाफ खडे होते हुये भी।  जैसा कि 1992 के बाबरी मस्जिद विध्वंस आंदोलन या 2002 के गुजरात दंगों के दौरान दिखा था। जहां मस्दिज तोडने वालों और नरसंहार करने वाले अराजक तत्व थे। निश्चित तौर पर जिनका हिंदुत्व के वृहद एजेंडे से कोई सम्बंध नहीं था। बावजूद इसके वे संघी गेमप्लैन का हिस्सा बन गये।

                इस लिहाज से देखा जाये तो कुल आबादी के एक प्रतिशत जैन समाज के मांसाहार विरोधी भावना के पीछे मोदी द्वारा नवासी प्रतिशत हिंदुओं को गोलबंद करने की कोशिश को समझा जा सकता है।

              बहरहाल, इस मांसाहार विरोधी हिंदुत्ववादी परियोजना का एक दूसरा पहलू भी है। जो एक तरफ तो उसके दलित विरोधी ब्राह्मणवादी प्रवृत्ति को दर्शाता है। तो वहीं इस प्रक्रिया से उत्पन्न होने वाले आक्रामक और हिंसक स्थिति की सम्भावनाओं के खतरे को भी सामने लाता है। जिसकी सचेत कोशिश संघ परिवार करता दिख रहा है। यह पहलू है गुजरात में भाजपा के मजबूत कोली जनाधार का। जो इस फैसले से नाराज है क्योंकि वह मांसाहार करता है।  लेकिन जिस तरह पिछले कुछ समय से हिंदुत्ववादी राजनीति के प्रति दलितों का आकर्षण बढ़ा है, उससे इस तबके में भी अपने गैर ब्राह्मवादी प्रवृत्ति (यहां मांसाहार)को बरकरार रखते हुये भी वृहत हिंदुत्ववादी रणनीति में अपने लिये स्थान आरक्षित करने की प्रवृत्ति भी तेजी से बढी है। जिसका इस्तेमाल हिंदुत्ववादी षक्तियां अपने मुस्लिमत विरोधी अभियानों में करती हैं। जैसा कि गुजरात 2002 के राज्य प्रायोजित मुसलमानों के जनंहार के दौरान हुआ था, जब आदिवासियों और दलितों के एक बडे हिस्से को मुसलमानों के खिलाफ हिंसा में इस्तेमाल किया गया। जब कि सामाजिक-सांस्कृतिक तौर पर यह तबका संघ के ब्राह्मणवादी अवधारणाओं में फिट नहीं बैठता है। मसलन,यदि मांसाहार के पैमाने पर ही बात करें तो दलित और आदिवासी दोनों ही गाय और भैंस जैसे बडे पशुओं का मांसाहार करते हैं, और इस तरह भोजन की प्रवित्ति के आधाार पर मुसलमानों के ज्यादा निकट हैं।

                  दरअसल, जब भी किसी कमजोर सामाजिक इकाई में कोई सांस्कृतिक या सभ्यतागत आंतरिक बहस होती है उसकी निणर्यात्मक दिशा समाज के बडे और वर्चस्वादी धडे के तर्कों के पक्ष में ही होती है। मसलन अगर यूपी और बिहार में यूं तो दलित जातिगत आधार पर बसपा के साथ खडे दिखते हैं। लेकिन साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण के दौरान वे बजरंग दल, शिवसेना और विश्व हिंदु परिषद के दस्ते के सिपाही बन जाते हैं। क्योंकि सामाजिक और सांस्कृतिक तौर पर हिंदुत्ववादी विचारधारा ही यहां पर भी मुख्यधारा है।

               इस लिहाज से साल के अंत में होने वाले चुनावों के लिये मोदी द्वारा एक हिंसक हिंदुत्ववादी व्यूह रचना की कोशिश देखी जा सकती है। दरअसल, मोदी ब्रांड हिंदुत्व की राजनीति की सीमा यही है कि वह सिर्फ सामान्य अहिंसक साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण के माहौल में चुनावी सफलता हासिल नहीं कर सकता। उसे निरंतर अपने 'शत्रु'(यहां मुसलमान)के खिलाफ वास्तविक हिंसक मुद्रा में रहना ही पडेगा। इसमें अगर वह विफल हो जाता है तो उसका 'तिलिस्म' भर भरा कर गिर जायेगा और वह आडवाणी, सुषमा स्वराज जैसों की श्रेणी में आ जाएगा। जिसे मोदी की चेतना पर खडा आम गुजराती हिंदुत्ववादी नर्म और चूका हुआ मानता है। इस लेहाज से देखा जाए तो मांसाहार पर प्रतिबंध के आड में मोदी खुद अपना अस्त्वि बचाते दिख रहे हैं। जिसका हिंसक खामियाजा एक बार फिर पूरे राज्य को उठाना पड सकता है।

? शाहनवाज आलम