संस्करण: 25  जून-2012

भारतीय जेल में अल्पसंख्यक

? सुभाष गाताड़े

                 स्कूल एवं नौकरियों में आबादी में अपने अनुपात से बहुत कम प्रतिनिधित्व रखनेवाले अल्पसंख्यकों की तादाद क्या भारत के जेलों में आबादी में उनके अनुपात से काफी ज्यादा है ?भारत में मुसलमानों के सामाजिक-आर्थिक पिछड़ेपन की पड़ताल करने के लिए गठित सच्चर आयोग ने पहली दफा इस असुविधाजनक लगनेवाले सवाल को उठाया था जिसमें यह बताया गया था कि जहां तक जेलों की आबादी का सवाल है, वहां पर उनकी संख्या आबादी में उनके अनुपात से कहीं दुगुनी या कहीं तिगुनी भी है। इतनी बड़ी तादाद में समुदाय विशेष के जेल की सलाखों के पीछे होने के गहरे सामाजिक और राजनीतिक निहितार्थ थे, जिसमें समुदाय का अधिक हाशियाकरण, गहराते पूर्वाग्रह और उसके बारे में घिसीपीटी बातों को मिलती नयी मजबूती जैसे मसले शामिल थे। मसविदा रिपोर्ट के जो अंश कुछ राष्ट्रीय अख़बारों में प्रकाशित हुए थे,उसमें इससे सम्बधित आंकड़े भी प्रकाशित हुए थे,मगर कहां क्या हुआ कि अन्तिम रिपोर्ट में यह मसला अनुल्लेखित रह गया।

               पिछले दिनों यह मसला नए सिरेसे सूर्खियों में आया जब महाराष्ट्र के अल्पसंख्यक आयोग के तत्वावधान में 'टाटा इन्स्टिटयूट आफ सोशल साइंसेज' के सेन्टर फार क्रिमिनोलोजी एण्ड जस्टिस विभाग के दो विद्वानों डा विजय राघवन और रौशनी नायर द्वारा किए गए अध्ययन के निष्कर्ष मीडिया के एक हिस्से में प्रकाशित हुए। (टाईम्स आफ इण्डिया, 3 जून 2012) स्पष्ट है कि इस अध्ययन की नींव एक तरह से सच्चर आयोग की मसविदा रिपोर्ट के फालोअप के तौर पर पड़ी थी। मसविदा रिपोर्ट में इस बात का स्पष्ट उल्लेख था कि ''महाराष्ट्र में जहां वर्ष 2001की जनगणना के मुताबिक मुसलमानों की आबादी 10.6फीसदी है वहीं जेल की आबादी में उनका अनुपात 32.4प्रतिशत है।''ताजा अध्ययन के मुताबिक यह आंकड़ा अब 32.4 फीसदी तक पहुंचा है।

                गौरतलब है कि यूं तो महाराष्ट्र के 15 अलग अलग कारागारों में बन्द 339 मुस्लिमों के साक्षात्कार पर यह रिपोर्ट आधारित है, मगर यह इस मसले पर अपनी राय नहीं देती कि अल्पसंख्यकों के खिलाफ मामला दर्ज करते वक्त क्या वाकई उनके साथ भेदभाव होता है। अध्ययनकर्ताओं के मुताबिक पहले तो मंत्रालय के अधिकारी ऐसे किसी अध्ययन के लिए तैयार नहीं थे,मगर जब अल्पसंख्यक आयोग ने मामले पर दबाव बनाया तो वह इसके लिए तैयार हुए अलबत्ता उन्होंने कैदियों को पूछे जानेवाले सवालों को पहले तय किया,जिसमें लाजिमी तौर पर पुलिस के हाथों भेदभाव एवं यातना से जुड़े सवाल हटा दिए गए थे।

                 इन सब बन्दिशों के बावजूद अध्ययन इसी बात को सामने लाता है कि चेतन-अचेतन तौर पर समुदायविशेष संस्थागत भेदभाव का शिकार अवश्य हो रहा है। उदाहरण के लिए अधययनकर्ताओं को साक्षात्कार दिए तीस फीसदी बन्दियों ने बताया कि गिरतारी के वक्त उन्हें अपने रिश्तेदारों से बात भी नहीं करने दिया गया,जो निश्चित तौर पर अभियुक्तों के जनतांत्रिक अधिकारों का सरासर उल्लंघन था। यह तथ्य कि अध्ययन में सहभागी 75.5 फीसदी लोग पहली दफा जेल में पहुंचे थे,इस मिथक को भी खण्डित करता है कि समुदायविशेष में अपराध को कैरियल बनानेवालों की तादाद औसत से अधिक है।

               अगर हम विगत कुछ सालों में अख़बारों में प्रकाशित चन्द रिपोर्टों को पलटें तो यह बात अधिक पुष्ट हो सकती है कि जेल में बन्द अल्पसंख्यक वाकई कई स्तरों पर प्रताडित होते हैं। उदाहरण के लिए तीन साल पहले गुजरात के साबरमती जेल से 250 से अधिक कैदियों द्वारा की गयी भूख हड़ताल की ख़बर सूर्खियां बनी थीं। (इण्डियन एक्सप्रेस, 28 मार्च 2009) बताया जाता है कि जेल के अधीक्षक द्वारा कथित तौर पर बन्दियों के अधिकारों की मनमाने ढंग से कटौती करवाने के खिलाफ जिस दिन गुजरात हाईकोर्ट में एक जनहितयाचिका दायर कर दी गयी थी, जिसमें जेल अधीक्षक वी चंद्रशेखर के तबादले और उसके द्वारा की गयी ज्यादतियों की जांच के लिए कोर्ट कमीशन बिठाने की मांग की गयी थी, उसी दिन शाम को बन्दियों पर हमला हुआ था। (26 मार्च 2009) 28 की शाम जब कैदी असर की नमाज़ के वक्त झुके थे, उस वक्त चुन चुन कर लोगों को पीटा गया था।

                 वे सभी जो गुजरात में जेल के अन्दर मानवाधिकार की स्थितियों पर निगाह रखे हुए हैं आप को बता सकते हैं कि उपरोक्त जेल के हिसाब से ऐसी घटनाओं में अनहोनी जैसी कोई बात नहीं थी। आज से आठ साल पहले भी वडोदरा जेल में अल्पसंख्यक समुदाय के कैदियों पर नमाज़ पढ़ते वक्त हुए लाठीचार्ज की घटना ( राष्ट्रीय सहारा, 26 जनवरी 2004)राष्ट्रीय फलक पर सूर्खियां बनी थीं। और उसके कुछ रोज पहले आठ जनवरी को साबरमती जेल में 'असर' की नमाज़ पढ़ रहे कैदियों पर पुलिस ने बर्बरता से लाठीचार्ज किया था जिसमें छह कैदियों को चोटें आयीं। उल्लेखनीय है कि इन कैदियों पर हरेन पंडया की हत्या और गोधरा कांड के मामले दर्ज थे। आज से कुछ वर्ष पूर्व भारत के मशहूर मानवाधिकार कार्यकर्ताओं,बुध्दिजीवियों की ओर से ''तिहाड़ जेल के अधिकारियों की साम्प्रदायिक नीतियों की जांच करने की'' दरखास्त ( The Kashmir Times, 11 January, 2004] 'Victims may forget torture but not verbal abuse'.) ने भारतीय जेलों में प्रशासन के एकांगी रूख के चलते साम्प्रदायिक सद्भाव की बिगड़ती स्थिति तथा कैदियों के अपने मानवाधिकार के प्रश्न को लेकर नयी बहस को जनम दिया था। उपरोक्त शिकायत में प्रख्यात समाजवादी नेता सुरेन्द्र मोहन ने ''जेल अधिकारियों द्वारा पूर्वाग्रहों से लैस होकर अपनायी जा रही कथित साम्प्रदायिक नीतियों का उल्लेख करते हुए तिहाड़ जेल की नारकीय परिस्थितियों के बारेमें जांच शुरू करने का आग्रह किया था।'' ज्ञापन के मुताबिक '' आम तौर पर मुस्लिम बन्दियों तथा विशेषकर कश्मीरी बन्दियों के साथ हो रहा भेदभाव अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार कानून के बुनियादी उसूलों के खिलाफ जाता है।'' इसी बुनियाद पर उसने आयोग से यह मांग की थी  कि वह जेल में मानवाधिकारों की जांच के लिये कमेटी बना दे और 'अतिसुरक्षित सेल'के बन्दियों की समस्याओं के बारे में रपट तैयार करे।''

                कानून की साधारण किताब भी बता सकती है कि जेलों का निर्माण राज्य की निगाह में अपराधी साबित किये गये व्यक्तियों के सुधार के लिए हुआ है। यह उम्मीद की जाती है कि वे लोग जो किन्हीं कारणों से जेलों में अपने किये की सज़ा भुगत रहे हैं वे जेल से जब बाहर आएंगे तो एक बेहतर इन्सान के तौर पर समाज का हिस्सा बनेंगे। लेकिन दूसरी तरफ हकीकत यह बता रही है कि अपराधी,पुलिस या सियासतदानों की आपसी सांठगांठ का मामला एक खुला रहस्य है तथा साधारण कैदियों पर रोज ब रोज ढाया जानेवाला कहर भी किसी से छिपा नहीं है। 'टाटा इन्स्टिटयूट आफ सोशल साइंसेज' द्वारा किए अध्ययन में साजिद (बदला हुआ नाम) का भी जिक्र है। उसने अध्ययनकर्ताओं को बताया कि ''मैं एक नयी शुरूआत करना चाहता हूं। हर बार जब मैं कोई काम करने लगता हूं तो पुलिस मुझे किसी न किसी मामले में फंसा कर अन्दर कर देती है। वे मुझसे पैसा भी मांगते हैं। जो पैसा देने की स्थिति में होते हैं, उन्हें छोड़ दिया जाता है। पुलिस बहुत ताकतवर है और वह कुछ भी कर सकती है।'' सवाल उठता है कि धर्मनिरपेक्षता के रास्ते पर चलने के लिए संकल्पबध्द इस मुल्क में साजिद के लिए 'नयी शुरूआत'को करना आखिर कब मुमकिन हो सकेगा ?

   ? सुभाष गाताड़े