संस्करण: 25  जून-2012

अवसर लागत या सिर्फ एक अन्य अवसर?

?  मोहन गुरूस्वामी

                 वसर लागत किसी भी कार्य की वह लागत है जिसे लगाया तो अधिक लाभ की आशा में जाता है किन्तु उस अवसर का अपेक्षित उपयोग नही कर उसे खो दिया जाता है।  नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक श्री विनोद राय ने 2-जी स्पेक्ट्रम मामले में 1,76,000करोड़ के नुकसान का आकलन करने में इस अवधारणा का उपयोग किया है। इस संदिग्ध भारी-भरकम ऑंकड़े पर पंहुचने के लिये श्री राय ने कार्य की कीमत का विश्लेषण करने के लिये बैंजामिन फ्रैंकलिन के सारगर्भित तर्क का उपयोग किया है --''जो व्यक्ति अंडे देने वाली मुर्गी को मार देता है वह उसकी हजार भावी पीढ़ियों को मार देता है।'' किन्तु इस तर्क को राज्य पर लागू करने में समस्या यह है कि राज्य कोई व्यवसाय नही है। एक व्यवसाय को सार्वजनिक हितों का खयाल रखने का दावा करने की जरूरत नही होती है। व्यवसाय तो सिर्फ लाभ कमाने और उसकी समस्त गतिविधियों को लाभकारी बनाने के लिये किया जाता है। ऐसा प्रतीत होता है कि विनोद राय भारत सरकार को एक व्यवसाय मानते है और जहाँ तक उनकी चिन्ता है, कि ए.राजा ने उस मुर्गी को मार दिया है जो 1,76,000 करोड़ रूपयो के अण्डे देती। राजा अपनी पार्टी तथा सरकार के कुछ अन्य साथियों की भॉति माल नही कमा सके, किन्तु यहाँ मुख्य मुद्दा यह नही है।

                 विनोद राय का यह तर्क शायद दोषपूर्ण है कि कि राजा ने 2 जी स्पेक्ट्रम में हुये नुकसान की राशि का लाभ मोबाइल फोन ऑपरेटरों को पंहुचाया। वे मोबाइल फोन उपभोक्ताओं को भूल जाते है जिनके कारण यह उद्योग अस्तित्व में है। अब कुछ समय पीछे चलते है जब हाल ही में न्यायालय द्वारा पूर्व संचार मंत्री सुखराम को दोषी ठहराया था। दोषी ठहराये गये पंडित सुखराम जब संचार मंत्री थे तब मोबाइल फोन सर्कल की भारी कीमतों पर पहली बार नीलामी हुई थी। देख भर के नौ प्रमुख सर्कलों के लिये सबसे ज्यादा बोली लगाने वाली एक छोटी सी अनजान कंपनी थी जिसका नाम ''हिमाचल यूचरिस्टिक कम्युनिकेशन लिमिटेड (एच.एफ.सी.एल.) था जिसने 85000 करोड़ की बोली लगाई थी। किन्तु जब इस राशि के प्रारंभिक भुगतान की बात आई तो एच.एफ.सी.एल.अपनी बोली से मुकर गई और सुखराम ने उसकी बैंक ग्यारंटी जब्त किये बगैर ही उसे भाग जाने की अनुमति दे दी। कुछ महीनों के बाद सुखराम के घर जब सी.बी.आई. का छापा पड़ा तो उसने सुखराम को करोड़ों रूपयों से भरे बिस्तर पर सोते पाया। इस घटना के बाद सबसे ऊॅंची बोली लगाने वालों ने अपनी क्षमता से बाहर जाकर बोली नही लगाई किन्तु सरकार उससे ज्यादा धन एकत्रित नही कर सकी। परिणामस्वरूप मोबाइल की काल दरें दिन के समय 32 रूपये प्रति मिनिट और रात्रि में 16 रूपये प्रति मिनिट थी। यह 1990 के दशक की बात है जब रूपये की कीमत आज की तुलना में अच्छी थी। इन ऊॅंची काल दरों के कारण मोबाइल उपभोक्ताओं की संख्या भी बहुत कम थी।

                तब सरकार ने इस नीति को बदला और कंपनियों से एकमुश्त प्रवेश लागत (एन्ट्री कास्ट) प्राप्त करने तथा इसके पश्चात प्राप्त होने वाले राजस्व को आपस में बाँटने की नीति अपनाई। परिणामस्वरूप काल दरें गिरकर 1 रूपया प्रति मिनिट हो गई और मोबाइल फोन उपभोक्ताओं में तेजी से वृध्दि हुई। तब के कुछ लाख उपभोक्ताओं से लेकर आज देश में 80करोड़ मोबाइल फोन उपभोक्ता है। मोबाइल उपभोक्ताओं की संख्या में अप्रत्याशित वृध्दि होने के बावजूद मुख्य तौर पर दूरसंचार कंपनियाँ फायदे में नही है। प्रतियोगिता के कारण इनमें से अनेक कंपनियाँ स्थायी रूप से घाटे में चल रही है। किन्तु उनमें से अभी भी कुछ कंपनियों के शेयर स्टॉक मार्केट में ऊॅचे स्तरों पर बने हुये है। इसके लिये हमें अनिल अंबानी, सुनील मित्तल और राजीव चंद्रशेखर से पूछना चाहिये जिनकी कंपनियों के शेयरों में गैर कानूनी तरीकों को अपनाने के कारण उछाल आ रहा है।

                आज प्रति मोबाइल फोन उपभोक्ता से 110 रूपये प्रतिमाह राजस्व प्राप्त हो रहा है या प्रतिवर्ष 1320 रूपये। अर्थात एक महीने में मात्र 110 मिनिट बात करने पर। इस प्रकार इन कंपनियों का वार्षिक टर्नओवर 105 हजार करोड़ रूपये का होता है। जैसा कि श्री विनोद राय कहते हैं, अब यदि तर्क के लिये यह मान लें कि ऊॅंची प्रवेश दर प्राप्त करने के लिये काल दरों को दुगना कर 2 रूपये प्रतिमिनिट कर दिया जाता तथा बात करने का समय (टाकटाइम) जो कि पहले से ही कम था, उसे यथावत रखा जाता तो संचार उद्योग का व्यवसाय 210,000 करोड़ का हो गया होता। सीधे-सीधे यह कहा जा सकता है कि 80करोड़ भारतीय मोबाइल फोन उपभोक्ता मोबाइल ऑपरेटरों को प्रतिवर्ष 105,000 करोड़ रूपये अतिरिक्त देते। क्या भारत सरकार (चाहे वह एन.डी.ए. की हो या यू.पी.ए. की) इस लाभ को जनता तक पंहुचाती?यह अधिक राजस्व प्राप्त करने के अवसर को खोना नही है बल्कि एक ऐसा फायदा है जो देश को नागरिकों को दिया गया है। श्री विनोद राय इस बात को पूरी तरह से भूल जाते है और असंगत तथा अनर्गल तरीके से 1,76,000 करोड़ रूपये की अवसर लागत की बात कर रहे है।

                   कोयला खदानों की लीज के मामले में नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक के पास अधिक मजबूत आधार हो सकते है। कोल इंडिया लिमिटेड और अन्य कंपनियों द्वारा देश में खनन किये गये कोयले का व्यावसायिक मूल्य लगभग 80,000करोड़ रूपये है जिस पर राज्य सरकारों कों 6980करोड़ रूपये की रॉयल्टी प्राप्त होती है। कोल इंडिया लिमिटेड जो भारत में उत्खनन किये जाने वाले कुल कोयले का 85प्रतिशत स्वयं उत्खनन करती है वह लगभग 18 प्रतिशत लाभ अपने विक्रय पर प्राप्त करती है या कह सकते है कि 10,877करोड़ रूपये प्रतिवर्ष। यह स्पष्ट है कि कोयले के खनन पर बहुत ज्यादा रायल्टीहै और सचमुच ऐसा ही यह अन्य सभी खनिजों पर भी है। अतएव उक्त राष्ट्रीय संपदा को रायल्टी के लिये इन कंपनियों को मुत में देने का दोषी सरकार को ठहराया जा सकता है। किन्तु यहाँ भी श्री राय की नाराजी निजी कंपनियों को कोयला खदानों के पट्टे देने पर है वह भी तब जब सरकारी कंपनियाँ ही ज्यादा शोषण कर रही है।

                   सी.ए.जी. चूॅकि इस मामले को स्वयं देख रहे है इसलिये यदि लौह अयस्क और बाक्साइट जैसे खनिजों पर लगाई गई रॉयल्टी का वे अध्ययन करते तो ज्यादा अच्छा होता। लौह अयस्क के मामले में यह मात्र 27रूपये प्रति टन है। लौह अयस्क का खनन करने और उसे संग्रहित करने की अनुमानित लागत 650 रूपये प्रतिटन अतिरिक्त है। लौह अयस्क के निर्यात की कीमत बहुत अच्छी है जो 5000 रूपये प्रतिटन से भी ऊपर है। यह स्पष्ट किया जाना चाहिये कि सरकारी क्षेत्र की कंपनी नेशनल मिनरल डेवलपमेंट कार्पोरेशन जो बैल्लारी के जी.जनार्दन रेड्डी जैसे संदिग्ध व्यक्ति को धन पंहुचाती है, नवरत्न क्यों हैं? कर्नाटक और छत्तीसगढ़ की भाजपा सरकारें इसी तरह खनिज संपदा का शोषण कर खूब धन कमा रही है। सुषमा स्वराज और अरूण जेटली उस भारी अन्यायपूर्ण व्यवस्था के बारे में संसद में कभी नही बोले जिसने आदिवासियों की जन्मभूमि को युध्द क्षेत्र बना दिया। खैर वे न सही, किन्तु सी.ए.जी. इस पर क्यों चुप है?

? मोहन गुरूस्वामी