संस्करण: 25  जून-2012

एन.डी.ए. में मची गहमागहमी

पी.एम.पद के लिए नितीश भी दावेदार

? राजेन्द्र जोशी

                 राष्ट्रपति पद की उम्मीदवारी को लेकर विभिन्न राजनैतिक दलों में चल रही खींचतान के बीच आगामी लोकसभा निर्वाचन के बाद प्रधानमंत्री पद पर काबिज होने की राजनैतिक लालसाऐं उभरकर सामने आने लगी है। आम चुनाव के बाद देश की संसद में राजनैतिक दलों की क्या स्थितियां बनेगी, यह एक अलग बात है किंतु अगला प्रधानमंत्री कौन बने इस मुद्दे को लेकर एन.डी.ए. के दलों के बड़े नेताओं में अभी से गुदगुदी पैदा होने लगी है। कई दलों को मिलकर एन.डी.ए. का गठन हुआ है। प्राय: प्रत्येक दल अभी से दिवास्वप्न देखने लग गये हैं कि अगला प्रधानमंत्री एन.डी.ए. से ही होगा।

                  दरअसल कतिपय राजनैतिक दलों ने मिलकर एन.डी.ए. का गठन इसलिए किया था कि देश में गैरकांग्रेसी दल का नेता ही प्रधानमंत्री बन सके। ऐसा हुआ भी। भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता श्री अटल बिहारी वाजपेयी को यह अवसर मिला भी था। एन.डी.ए. के घटक दलों में सर्वाधिक संख्या वाले दल भाजपा को इसका लाभ मिला। अटल के बाद यदि किसी दूसरे नेता को प्रधानमंत्री पद पर काबिज होने का स्वप्न आया तो वे हैं श्री लालकृष्ण आडवाणी। आडवाणी जी ने भी अपने आपको प्रधानमंत्री पद का दावेदार घोषित करने के मामले में कोई कसर बाकी नहीं छोड़ रखी थी। इस पद की प्राप्ति का सपना पूरा करने के असफल प्रयासों के दौरान उन्होंने अपनी साम्प्रदायिक छवि को भी बदलने से गुरेज नहीं किया। जिन्ना पर टिप्पणी करते हुए वे अपने आपको मुस्लिम विरोधी होने के आरोप से भी मुक्त होना चाहते थे। देशभर में यात्राओं के माध्यम से अपने आपको एक राष्ट्रभक्त और जनसेवक के रूप में प्रतिष्ठापित करने की नौटंकियां भी वे करते रहे। पिछले दो आम चुनावों के दौरान भी उन्होंने प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवारी की आस नहीं छोड़ी थी। अब फिर आगामी निर्वाचन के बाद अपनी दावेदारी की बेचैनी की उनमें साफ झलक देखी जा सकती है।

               आज की तारीख में ऐसा कोई भी राजनैतिक दल नहीं है जिसके नेताओं में प्रधानमंत्री पद पर आसीन होने की ललक न हो। एन.डी.ए. के घटक दलों में जितने भी बड़े दल शामिल हैं उनके नेता भी ताल ठोककर मैदान में उतरने की कवायद में देखे जा सकते हैं। अकेले भारतीय जनता पार्टी में ही इस सर्वोच्च पद पर काबिज होने वाले लीडरों की एक बड़ी जमात नजर आ रही है। पिछले एक दशक से ही श्री आडवाणी की दावेदारी का हल्ला मचा हुआ था, किंतु इस दल में गुजरात के मुख्यमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी की काबिलयत का भाजपा के कतिपय नेताओं द्वारा ढिंढोरा पीटे जाने से श्री आडवाणी के नाम का शोरगुल मोदी के ढोल के आगे फीका पड़ता जा रहा है। किंतु जैसे ही नरेंद्र मोदी की तूती का स्वर गूंजने लगा उन्हीं के दल से उनकी तूती बंद करने की तैयारी भी अब जोरदार ढंग से शुरू हो चुकी है। प्रधानमंत्री की कुर्सी की तरफ जैसे ही मोदी के पांव बढ़ने की चर्चाएं गरम होने लगी, उन्हीं के दल के दिग्गजों ने अपनी टंगड़ी अड़ाना शुरू कर दिया। आम जनता में भी यह संदेश जोर पकड़ता जा रहा है कि भारत के जिस नेता को साम्प्रदायिकता भड़काने के नाम पर अमेरिका वीजा नहीं दे रहा है और इंग्लैंड भी अपने देश में उनकी चरणरज नहीं चाहता तो ऐसी शख्सियत का व्यक्ति देश के सर्वोच्च पद के प्रति किस तरह से न्याय कर पायेगा। कतिपय माइनस पाइंट के बावजूद भी नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री का पद पाने का सपना देखना बंद नहीं कर पा रहे हैं।

                यह भी हकीकत है कि भाजपा का कोई भी नेता बिना एन.डी.ए. के घटक दलों की सहमति के अपने गठबंधन का नेता बन ही नहीं सकता। आज एन.डी.ए. के घटक दलों की राहें भी पथरीली होती जा रही हैं। ऐसे में इस गठबंधन के दल-प्रमुखों के मन भी गुदगुदाने लगे हैं। भारतीय जनता पार्टी अपने आपको एन.डी.ए. का बड़ा दल मानती है। इस दृष्टि से भाजपा नेताओं का एन.डी.ए. प्रमुख बनने का सपना जायज लगता है किंतु अन्य दलों के नेताओं की दावेदारी भी जोरशोर से उभरकर सामने आ रही है।

                  अभी न तो लोकसभा के चुनाव का कोई समय है और न ही कोई ऐसी ऐतिहासिक घटना घटित होने वाली है कि एन.डी.ए. के हाथ देश की सत्ता आ जाय। यह भी जरूरी नहीं है कि आगामी चुनाव में एन.डी.ए. बहुमत हासिल कर ले। किंतु मुगालते की शिकार एन.डी.ए. के नेतागण प्रधानमंत्री पद की दावेदारी के लिए खींचतान में जुट गये हैं। बिहार के मुख्यमंत्री श्री नितीश कुमार ने हाल ही में एक समाचार पत्र को दिए इंटरव्यू में प्रधानमंत्री पद पर अपनी दावेदारी के संकेत दिए हैं। श्री नितीश कुमार ने प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवारी को लेकर अपनी कुछ शर्तें रखकर एक नयी चर्चा छेड़ दी है। उन्होंने इशारों ही इशारों में यह साफ कर दिया है कि नरेंद्र मोदी को पी.एम. पद के उम्मीदवार के रूप में स्वीकार नहीं किया जाय। नितीश कुमार की शर्त के मुताबिक पी.एम. पद के उम्मीदवार की छवि सेकुलर होना चाहिए। उस व्यक्ति की लोकतांत्रिक मूल्यों में पूरी आस्था हो। उसपर किसी तरह का दाग न हो। नितीश ने शर्त रखी है कि प्रधाानमंत्री पद के उम्मीदवार को विकसित राज्य का नहीं बल्कि बिहार जैसे कम विकसित राज्यों का होना चाहिए तथा इस पर एन.डी.ए. में शामिल सभी घटक दलों की सहमति होना चाहिए नितीश कुमार चाहते हैं कि एन.डी.ए. की परंपरा के अनुसार पी.एम. पद के उम्मीदवार के नाम का ऐलान लोकसभा चुनाव के पहले हो जाना चाहिए।

                  नितीश कुमार की इन शर्तों से यह स्पष्ट संकेत निकलकर आ रहे हैं कि वे खुद प्रधानमंत्री पद के लिए अपनी दावेदारी को मजबूत बना रहे हैं। एन.डी.ए. की बदौलत प्रधानमंत्री का पद हासिल करने की इच्छा रखने वाले श्री नरेंद्र मोदी के आगे श्री नितीश कुमार आड़े आ रहे हैं।    

? राजेन्द्र जोशी