संस्करण: 25  जून-2012

गुजरात में सरकारी पत्रिका में अश्लील सामग्री

चिंतनीय है भाजपा की यह गिरावट!  

? सुनील अमर

                  हाल के दिनों में भाजपा से कोई भी खबर ठीक नहीं आ रही है। पार्टी के संगठन से लेकर उसके तमाम बड़े नेताओं व नीति-नियंताओं के बयानों व कृत्यों से देश की यह दूसरी सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी एक ऐसे झंझावात में फॅंसी दिख रही है जिसमें से इसका बिना टूटे हुए निकल आना मुश्किल लग रहा है। कर्नाटक में फजीहतों का सिलसिला अभी थमा भी नहीं था कि बीते पखवारे मुम्बई में हुई राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में मोदी बनाम जोशी प्रकरण ने इसकी सांगठनिक नंगई को उजागर कर दिया। पार्टी में वयोवृध्दों की लज्जाजनक उपेक्षा का जो दौर एक लम्बे समय से चल रहा है वह शेखावत,डॉ.जोशी,जसवंत-यशवंत आदि अनेक से होते हुए अब लालकृष्ण आडवाणी तक आ पहुॅचा है। राष्ट्रपति चुनाव में प्रत्याशी चयन को लेकर जारी उहापोह के बीच इसके तथाकथित उम्मीदवार डॉ.कलाम ने स्वयं ही प्रत्याशी बनने से इनकार कर भाजपा को हतप्रभ कर दिया है। दूसरी तरफ, चरित्रहीनता की जो चर्चा जोशी सीडी प्रकरण से शुरु हुई थी, वह कर्नाटक विधानसभा में भाजपाई मंत्रियों द्वारा मोबाइल फोन पर सामूहिक बलात्कार की फिल्म देखने से होते हुए मध्य प्रदेश विधानसभा में भी ऐसी ही करतूत से दो-चार होकर  अब गुजरात में सरकारी स्कूल की पत्रिकाओं में अश्लील सामग्री परोसे जाने तक आ पहुॅची है! खबर है कि गुजरात में सर्वशिक्षा अभियान के तहत बच्चों में सामान्य ज्ञान का स्तर बढ़ाने के लिए बॉटी जा रही एक पत्रिका में अश्लील व द्विअर्थी सामाग्री भरी हुई है। मीडिया व विपक्ष द्वारा हल्ला मचाने पर सरकार ने इस पत्रिका की सारी प्रतियॉ वापस लेने का आदेश तो दिया है लेकिन क्या यह संभव हो सकता है? यह वही भाजपा है जो अभी चंद दिनों पहले 60 साल पुराने एक शालीन कार्र्टून पर संसद में हल्ला मचाकर नैतिकता का अलम्बरदार बनने की फर्जी कोशिश कर रही थी।

               ताजा मामला भाजपा के 'नये लौहपुरुष ' नरेन्द्र मोदी शासित गुजरात का है। वहॉ सर्व शिक्षा अभियान के तहत बच्चों का सामान्य ज्ञान बढ़ाने तथा पढ़ाई के प्रति उनमें लालसा पैदा करने के लिए कुछ पत्रिकाऐं छपवाकर नि:शुल्क वितरित की जा रही हैं जिनमें हास्य व कहानियाँ आदि हैं। ऐसी ही एक पत्रिका के मई 2012 अंक में द्विअर्थी चुटकुले व अश्लील संवाद छपे हुए हैं। यह समझ से बाहर की बात है कि सर्वशिक्षा अभियान के तहत आने वाले अल्पवय बच्चों को ऐसी वयस्क (और आपत्तिजनक) सामाग्री पढ़ाने का निर्णय कैसे लिया गया! पत्रिका के प्रकाशक का कहना है कि 'पजल मैजिक' नामक यह पत्रिका तो बच्चों में सामान्य ज्ञान बढ़ाने के लिए ही प्रकाशित की जा रही है लेकिन इस अंक में इस तरह की सामाग्री आ जाना बहुत चिंता की बात है और वे इसकी सारी प्रतियाँ वापस ले चुके हैं।

               सर्व शिक्षा अभियान केन्द्र सरकार की आर्थिक सहायता से चलता है। इसमें स्कूल जाने के लिए राज्य व स्थानीय स्तर पर बच्चों को प्रोत्साहित करने की तमाम योजनाऐं चलायी जाती हैं। चर्चित पत्रिका का प्रकाशन एक निजी प्रकाशक सरकारी ठेके के तहत इसी उद्देश्य की पूर्ति हेतु कर रहा था। असल में इस सारे प्रकरण में गुजरात के प्रमुख विपक्षी दल काँग्रेस के इस आरोप में दम है कि प्रकाशकों व उनके प्रायोजकों का सारा ध्यान सिर्फ मुख्यमंत्री का बढ़िया फोटो छापने में लगा रहता है। किताब में सामाग्री क्या है, इससे किसी को मतलब ही नहीं रहता। मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी का अपना फोटो छपवाने का प्रेम जग जाहिर है ही। हद तो यह है कि इसी सर्व शिक्षा अभियान के तहत कन्या शिक्षा योजना में बॉटे जा रहे स्कूली बैग पर भी मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी का फोटो छपा हुआ है! हैरत होती है कि 5-7 साल के बच्चों के साथ राजनीति! वो अभी मतदाता भी तो नहीं हैं और जब तक होंगें, पता नहीं मोदी उसका लाभ ले भी पाएंगें या नहीं। अभी कुछ माह पहले ही भाजपा शासित एक और राज्य मध्य प्रदेश में भी पाठयक्रम और स्कूल प्रार्थना के समय सूर्य नमस्कार अनिवार्य किये जाने को लेकर काफी हो हल्ला हो चुका है। संघ के तमाम आनुषांगिक संगठन हैं। उन्हीं में से एक विद्या भारती है जो सरस्वती शिशु मंदिर नामक प्राथमिक शिक्षा से लेकर उच्च कक्षाओं तक की शिक्षा अपनी विचारधारा विशेष के तहत देती है। इसी पध्दति को भाजपा शासित राज्य सरकारी स्कूलों में भी लागू करना चाहते हैं। यह प्रकरण ऐसे समय में आया है जब पिछले कुछ दिनों से एन.सी.ई.आर.टी. द्वारा प्रकाशित पाठ्य पुस्तकों की सामाग्री को लेकर भाजपा सड़क से संसद तक हल्ला मचाये हुए है। वैसे इन दिनों सभी राजनीतिक दल अपना ध्यान राष्ट्रपति के चुनाव में लगाये हुए हैं इसलिए मोदी और भाजपा दोनों जरा राहत की सांस ले सकते हैं। फिर भी निश्चित तौर पर यह भाजपा के लिए कई कोण से आत्म-समीक्षा करने का वक्त है। देश में भाजपा अपने ढॅग़ की अकेली पार्टी है। अन्य राजनीतिक पार्टियों की तरह इसमें भी तमाम बड़े और अनुभवी नेता हैं। दिक्कत सिर्फ यह है कि अन्य राजनीतिक दल प्राय: एक व्यक्ति केन्द्रित हैं और दल में उसी के अनुशासन का कोड़ा चलता है जबकि भाजपा में ऐसा करने की जिम्मेदारी इधर कुछ समय से पूरी तरह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने उठा रखी है। यह एक तरह से मैदान से बाहर रहकर मैदान को नियंत्रित करने जैसा है। इसके कई दुष्परिणाम भी सामने आ रहे हैं। पार्टी के कनिष्ठ और छुटभैये नेता भी संघ की गणेश परिक्रमा के बूते वरिष्ठों की उपेक्षा करने लगे हैं। इसकी ताजा मिसाल गत दिनों सम्पन्न मुम्बई की कार्यकारिणी की बैठक है जहॉ लालकृष्ण आडवाणी और सुषमा स्वराज जैसी वरिष्ठ नेता को बैठक छोड़ देने की नौबत आ गयी।

                आज अगर एक निगाह भाजपा की हालिया उपलब्धियों पर डालें तो संभवत: वहाँ सिर उठाने लायक कुछ भी नहीं है। आर्थिक भ्रष्टाचार के भयकारी आख्यान तथा चारित्रिक गिरावट के सनसनीखेज दास्तान वहॉ कदम-कदम पर फैले हुए हैं। यह कहा जा सकता है कि केन्द्र में सत्तारुढ़ काँग्रेस या अन्य क्षेत्रीय स्तर की पार्टियाँ ही इस मामले में कहॉ कम हैं लेकिन जो मिसाल भाजपाई नेता पेश कर रहे हैं वह आश्चर्यजनक है। छोटे से प्रांत उत्तराखंड में भाजपा के विधायक सत्तारुढ़ दल के हाथों बिकने को आतुर हैं तो कर्नाटक में आपराधिक चरित्र वाले येदुरप्पा गैरकानूनी ढँग़ से कमाई अकूत दौलत के बल पर जबरन मुख्यमंत्री बनने को क्या कुछ नहीं कर रहे हैं। यही हाल गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी का है। वो सिर्फ गुजरात के अल्पसंख्यकों के लिए ही नहीं बल्कि अब तो अपने संगी-साथियों और अपनी पार्टी के पितृ संगठन तक के लिए भी भयकारी हो गये हैं। मुम्बई अधिवेशन में तो येदुरप्पा और मोदी ने वो युगलबंदी की कि ये सब पर हावी हो गये! भारत जैसे विविधा संस्कृति वाले देश के लिए उसकी प्रमुख विपक्षी पार्टी का यह आचरण उचित नहीं। भाजपा अपने इस चेहरे और उपलब्धि को लेकर केन्द्रीय सत्ता की दावेदार नहीं बन सकती। इसका सबसे सटीक उदाहरण उत्तर प्रदेश है जहॉ अपने इसी चरित्र के कारण यह पार्टी बीते दो दशक से हर चुनाव में पतन की तरफ खिसक रही है। सूचना-विस्फोट के जिस दौर में हम जी रहे हैं, वहॉ अब पहले जैसे खॅूटे से बॅधो रहने मतदाता भी नहीं रह गये हैं। भाजपा का यह मुगालता दूर हो जाना चाहिए।

? सुनील अमर