संस्करण: 25  जून-2012

सरकारी बनाम निजी स्कूल:

कौन अच्छा?

? डॉ. सुनील शर्मा

              रामगोपाल जी हमारे कस्बे के सरकारी स्कूल में अध्यापक हैं। लेकिन इस सत्र में वो पास के शहर में जाकर रहेगें क्योंकि उनके बच्चे पढ़ने वाले हो गए हैं जिनकों उन्हें किसी अच्छे प्राइवेट स्कूल में डालना है। यहॉ की नौकरी तो अपडाउन से चल जाएगी?बच्चों को निजी स्कूल में पढ़ाने की खातिर रामगोपाल जी स्वयं शिक्षक होते हुए भी शहर में बसने तैयार हैं। अकेले रामगोपाल ही क्यों गॉव और कस्बे का हर सुविधा संपन्न आदमी अपने बच्चों को लेकर शहर जाने तैयार है क्योंकि वहॉ के किसी निजी विद्यालय में अपने बच्चों का एडमीशन करवा कर उनके अच्छे भविष्य के प्रति आश्वस्त होना चाहता है?वास्तव में आज हरेक पालक इसी असमंजस में है कि उसके बच्चे के लिए कौन स्कूल अच्छा है? निजी स्कूल या सरकारी स्कूल? निश्चित रूप से लगभग हरेक पालक की चाह होती है कि उसका बच्चा निजी स्कूल में पढ़ने जाए। वो इसके लिए ढेर सारी फीस देने तैयार हैं।वो इसके लिए शहर जाने तैयार है। सरकारी स्कूल का मध्यान्ह भोजन,मुफत की किताब और छात्रवृत्ति का लोभ छोड़ने तैयार हैं। वास्तव में सरकारी स्कूलों के तमाम आकर्षण और आर्थिक फायदा पर भारी है प्राइवेट स्कूल का बस्ता?

                 शिक्षण सत्र की शुरूआत के साथ ही पालक असमंजस में है और वो अपने बच्चे की अच्छी शिक्षा के लिए अच्छा से अच्छा शिक्षण संस्थान चुनना चाहतें है।और इसके लिए उनके कदम सीधे निजी स्कूल की चौखट पर रूकते हैं।लेकिन चिंतन का विषय है कि आखिर तमाम खर्च और अच्छाईयों के बाबजूद सरकारी विद्यालयों से पालकों का मोहभंग क्यों? और निजी स्कूल पालकों की मंशा के अनुरूप बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने में कहॉ तक सफल है?तो जहॉ पालकों की पहली नजर में ही सरकारी विद्यालय यानि सुविधाविहीन संथान बन चुके है।जिनके शिक्षक ही नहीं है?अगर कहीं शिक्षक हैं। तो वो स्कूल आते नहीं हैं। अगर कभी स्कूल आते हैं तो सरकारी डाक लेकर शिक्षाअधिकारी के दफ्तर में चले जाते हैं या फिर किसी सर्वे में लग जाते हैं।अब बच्चों को पढ़ाएगा कौन?स्कूलों में न तो पेयजल की व्यवस्था है और न शौचालय?बिजली और पखें तो दूर की बात है। मध्यान्ह भोजन का मतलब गुणवत्ताहीन और गंदगी से भरे किचिन में तैयार आहार जिसमें अक्सर कीड़े और छिपकलियॉ मिलती रहती हैं और किताबें तो बक्से में बंद ही दीमक की भेंट  चढ़ जाती है।सरकारी स्कूलों में न तो झूले है और न फिसलपट्टी के पास न शिक्षकों के पास पढ़ाने के रोचक तरीके?तो फिर पालकों को कैसे आकर्षित करेंगें ये स्कूल?

                 वहीं निजी स्कूल में शिक्षक तो पूरे समय मिलते हैं भले ही वो शिक्षण के लिए बिल्कुल भी प्रशिक्षित नहीं हैं?निजी स्कूल के शिक्षक पढाने के लिए रोचक तरीके अपनाते है भले ही वो अपनी पढ़ाई में फिसड्डी रहें हो?निजी स्कलों में बच्चों को झूले फिसल पट्टी जरूर  मिलते हैं भले खेल का मैदान न हो? निजी स्कूलों में बच्चों के लिए पेयजल और शौचालय की व्यवस्था रहती है भले ही पालक को इसके बदले भारी भरकम फीस देना पड़े?पंखे और कम्प्यूटर भी रहते हैं भले ही प्रदर्शन तक ही सीमित हों?और निजी स्कूल में बच्चों को परीक्षा में नब्बे फीसदी नम्बर मिलते हैं भले ही वो परीक्षा में कुछ संतोषजनक करके न आए? निजी स्कूल मे बच्चे के बस्ते में रंगीन चित्रों युक्त मंहगी मंहगी किताबें भरी रहती हैं जो कि स्कूल प्रबंधन द्वारा तयशुदा दुकान पर ही मिलती है। निजी स्कूल के बच्चे आकर्षक और मॅहगी ड्रेस में भी तैयार रहते हैं जो कि सरकारी की अनाकर्षक ड्रेस से बेहतर लगती है। कुल मिलाकर निजी स्कूल दिखावा में  सरकारी स्कूल के मुकाबले काफी आगें है लेकिन  शैक्षिणिक गुणवत्ता के मामले में अधिकांश फिसड्डी ही साबित हो रहे हैं साथ ही पालकों की जेब काटने वाले ही है। जहॉ सरकारी स्कूलों मे पाठयक्रम और किताबों में एकरूपता रहती है वहीं निजी स्कूल किताबें और पाठ्यवस्तु अपने हिसाब से बदलते रहते है। कम से कम प्राथमिक और नर्सरी कक्षाओं में तो सौ फीसदी होता है। इनमें वही किताबें सिलेक्ट की जाती है जिनमें प्रकाशक से ज्यादा रियायत मिले। उनके प्रकाशक हर साल बदलते है जिनसे छात्रों को फायदा नहीं होता वरन पाठ्यवस्तु की एकरूपता समाप्त होती है और बच्चे को अगली कक्षा में जरूर विषय कठिन महसूस होता है।सरकारी स्कूलों की उत्तम विषयवस्तु युक्त सस्ती किताबों की तुलना में काफी मॅहगी किताबें पालकों के जब पर डाका जरूर डालती है।

               कुल मिलाकर सरकारी और निजी स्कूलों में कौन अच्छा है? पालको प्रथमदृष्टि में निजी स्कूल ही अच्छे लगते हैं मगर इनकी गुणवत्ता पर भी प्रश्नचिन्ह है। क्योंकि अधिकांश स्कूल शैक्षिणिक गुणवत्ता से कोसों दूर है और सिर्फ दिखावा के जरिए कमाई करने के साधान बन चुके है।ऐसे में अगर सरकार सबको गुणवत्तायुक्त  शिक्षा के दावे को पूरा करना चाहती है तो सरकारी स्कूलों को साधन सम्पन्न बनाए। शिक्षकों से सिर्फ पढ़ाई करवाए।निजी स्कूल भी की गुणवत्ता पुर्ण शिक्षा प्रदान करे जिसकी वो भारी फीस वसूलते है।इसकी निगरानी भी सरकार करे तथा प्राथमिक स्तर पर सरकारी और निजी विद्यालयो में पढ़ाई जाने वाली किताबों में एकरूपता जरूरी है।कुल मिलाकर शिक्षा के नाम पर सरकारी बनाम निजी में पालकों से लूट रूकना चाहिए। पालक भी अपने विवेक का इस्तेमाल कर देखे कि कौन स्कूल शैक्षणिक गुणवत्ता की दृष्टि उत्कृष्ट है।

? डॉ. सुनील शर्मा