संस्करण: 25  जून-2012

भ्रूण हत्या, आधुनिक होते समाज में

बर्बरता की निशानी

? जाहिद खान

               भ्रूण हत्या, आधुनिक होते समाज में बर्बरता की निशानी है। इसे बर्बरता के दर्जे में इसलिए रखा जाना चाहिए कि एक जिंदगी जो इस दुनिया में अभी आ भी नहीं पाई, उसे निर्ममता से कत्ल कर दिया गया। उसे दुनिया में आने से रोका गया। आने वाली जिंदगी और औरत के ऊपर ये जुल्म वो लोग करते हैं, जो धर्म और अहिंसा की बात करते हैं। गोया कि उन्हें इस बात का जरा सा भी मलाल नहीं होता कि उन्होंने जो कुछ किया, वो गलत है। महज एक बेटे की चाहत में हमारे मुल्क में हर साल लाखों बेटियां गर्भ में ही मार दी जाती हैं। ये बर्बरता उस दौर में जारी है, जब हमारी हुकूमतें भ्रूण हत्या के खिलाफ सख्त कानून बना चुकी हैं। कानून में भ्रूण हत्या करने और करवाने वाले दोनों के लिए सजा मुकर्रर है। बावजूद इसके हमारे समाज में ये बर्बरता का सिलसिला रूका नहीं, बल्कि और भी बढ़ा है। आंकड़े खुद, चुगली करते हैं।

                 वर्ल्ड इकॉनामिक फोरम की जेंडर गेप इंडेक्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया के 128 मुल्कों में हिंदोस्तान का क्रम, लिंग अनुपात के मामले में 122वां है। यानी, काफी खराब ! दूसरी तरफ स्वीडन, नार्वे, फिनलैंड, आइसलैंड और न्यूजीलैंड जैसे यूरोपीय मुल्क हैं, जहां पर लैंगिक समानता 80 फीसदी से अधिक है। वहीं इसके बरक्स हिंदोस्तां में समानता का स्तर महज 39.8 फीसदी ही है। साल 2001 जनगणना के आंकड़े कहते हैं कि हमारे मुल्क में हर हजार मर्द पर सिर्फ 933 औरते हैं। सवाल यह पूछा जा सकता है कि ये 67 औरतें आखिर कहां गईं ? इसका जबाव खौफनाक है। ये औरत या लड़कियां या तो गर्भ में ही मार दी गईं या फिर जन्म लेने के कुछ ही दिन बाद इनकी मौत हो गई। यानी, पहले तो कोशिश की जाती है कि लड़की पैदा ही न हो। और यदि वह पैदा हो भी गई, तो उसे मार दिया जाता है। यह बिला वजह नहीं है कि नवजात शिशु मृत्यु दर और शिशु मृत्यु दर यानी 5 साल से कम उम्र के बच्चों की मृत्यु दर में एक बड़ी तादाद लड़कियों की होती है।

               जहां तक मुसलिम समाज में भ्रूण हत्या का सवाल है, दीगर समाजों की बनिस्बत यहां भ्रूण हत्या न के बराबर है। यही नहीं, शिशु मृत्यु दर और स्त्री-पुरूष अनुपात के मामले में भी मुसलमानों की स्थिति दीगर समुदायों से कहीं बेहतर है। मुसलमानों की सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक स्तर का मुकम्मल जायजा लेने वाली सच्चर रिपोर्ट कहती है कि मुल्क में जहां हर हजार मर्द पर 933 औरतें हैं, वहीं समुदाय स्तर पर देखें तो मुसलिम समुदाय में 936 औरतें हैं। यही नहीं 0 से 6 वर्ष तक की उम्र में ये आंकड़ा 927 के बरक्स 950 है। शिशु मृत्यु दर की यदि बात करें तो राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ सर्वेक्षण-2 जो कि साल 1998-99 में हुआ, वह कहता है कि हिंदोस्तां में जहां कुल मिलाकर नवजात शिशु मृत्यु दर 73 है, वहीं समुदाय के स्तर पर मुसलमानों में यह केवल 59 है। शिशु ुमृत्यु दर के मामले में भी मुसलिम समुदाय दीगर समुदायों के बनिस्बत बेहतर हालात में है। यानी, मुल्क में कुल जमा 101 मृत्यु दर के बरक्स यहां 83 है। यानी, दकियानूस, मजहबी और ज्यादा कट्टर समझे जाने वाला मुसलिम समुदाय स्त्री-पुरूष अनुपात और शिशु मृत्यु दर के मामले में दीगर समुदायों के बनिस्बत ज्यादा बेहतर हालत में है।

               बहरहाल, भ्रूण हत्या की यदि वजह जानें तो इसके पीछे सामाजिक, आर्थिक कारण हैं। हिंदोस्तानी समाज की पितृसत्तात्मक सोच, भ्रूण हत्या के लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदार है। वह पितृसत्तात्मक सोच ही है, जो मर्द को औरत से बेहतर समझती है। बेटे को अपना वंश चलाने वाला मानती है। ये सोचे बिना,कि बिना औरत के ये वंश बढ़ना नामुमकिन है। पितृसत्तात्मक सोच के अलावा लड़कियों की शादी का बढ़ता खर्च और दहेज भी भ्रूण हत्या की एक वजह है। समाज में घर कर गई दहेज जैसी सामाजिक कुरीति ने लड़कियों को गर्भ में मरवाया है। दहेज का दानव न जाने कितनी लड़कियों को जन्म लेने से पहले ही निगल चुका है। हद तो तब हो जाती है जब भ्रूण हत्या के इस गैर इंसानी फैसले में पिता के साथ-साथ मां भी शामिल होती है। यदि मां चाहे तो ये भ्रूण हत्या हर्गिज-हर्गिज न हो। लेकिन औरत का कमजोर पड़ना, दबावों में टूट जाना, मर्द को उकसाता है कि वह इस घिनौने अपराध को अंजाम दे। औरत यदि ठान ले तो मर्द की इस तानााही,हिंसा और बर्बरता पर लगाम मुमकिन है। अच्छी बात यह है कि हिंदोस्तानी समाज में औरत अब अपने अधिकारों के जानिब आहिस्ता-आहिस्ता ही सही जागरूक हो रही है। इल्म की रोशनी में उसने अपने अधिकारों को पहचाना है। वह दिन दूर नहीं, जब भ्रूण हत्या के खिलाफ औरत ही सबसे कारगर हथियार साबित होगी।  

? जाहिद खान