संस्करण: 25  जून-2012

कई दरवाजों के पीछे की

कैद से झांकती औरतें

? राहुल शर्मा

                ड़े और भीड़-भाड़ वाले शहरों में मनुष्य की चेतना का स्तर किस कदर लगवाग्रस्त हो चला हैं इसके उदाहरण आये दिन मीडिया की सुर्खियाँ बनते हैं। दिल्ली के रोहिणी इलाके मैं दिल दहला देने वाला मंजर सामजिक  असंवेदनशीलता का हालिया उदाहरण है। पिछले साल भी दिल्ली से लगे नोएडा मैं दो बहने जो कई सालों से अपने घर मैं कैद होकर मरणासन्न हालत मैं पहुँच गयी थी और अस्पताल मैं जेरे-खुराक उनमें से एक काल-कवलित भी हो गयी थी को शायद लोग भूले भी ना हों कि फिर वही वाकया उसी खौफनाक मंजर के साथ  सामने आ गया. किसी को भी नहीं पता था कि ममता (40) और उसकी छोटी बहन नीरजा (28) जो पिछले लगभग 6 -7  माह से घर से बाहर अगर नहीं देखी गयीं तो वे कहाँ व किस हालत मैं हैं। दोनों बहनों को आज उनके चचेरे भाई के खबर करने पर उनके अपने  घर से लगभग मरणासन्न हालत मैं दिल्ली के आंबेडकर अस्पताल मैं  अतिगंभीर कुपोषण, शरीर मैं पानी की अत्यधिक कमी और कुल 15 किलो वजन के साथ भर्ती कराया गया।

                 मजबूरी, गरीबी  अथवा अमानवीयता की यह पराकाष्ठा  ही कही जाएगी कि घर मैं दोनों बहनों की माँ और बड़ी बहन ममता का किशोरवय का बेटा भी थे।  ना जाने किस मजबूरी या कमजोरी के चलते उन्होंने इन दोनों बहनों को तिल-तिल कर मरता देखते जाना स्वीकार किया।   ताज्जुब की बात है कि पड़ोसियों व रिश्तेदारों ने भी 6 माह से अधिक गुजरने पर इन बहनों के बाहर न निकलने पर उनकी माँ और बड़ी बहन के बेटे से दरियाफ्त नहीं किया। लगभग मृतावस्था मैं इन दोनों बहनों को उनके अपने घर से अस्पतालले जाते वक्त यह खबर भी निकल कर आई कि बड़ी बहन का लगभग 16  साल पूर्व तलाक हो गया था जिसके चलते वो अवसादग्रस्त हो गयी और करीब 10 साल पहले इनके पिता के गुजर जाने के कारण इस परिवार पर गहरा आर्थिक संकट भी आ पड़ा. बड़ी बहन के डिप्रेशन को छोटी बहन बहन ने भी शेयर कर लिया और दोनों ने गहरी एकांतिकता,उदासी और निराशा की चादर ओढ़ ली।   हालांकि डाक्टरों ने अभी इन दोनों बहनों की मानसिक अवस्था को नहींजांचा है,हो सकता है इनको कोई गंभीर मानसिक बीमारी जैसे सीजोफ्रेनिया हो,जिसका शायद उपचार भी प्रारंभ हो जायेगा लेकिन उस बीमारी का क्या जो समाज मैं सामूहिक अवचेतन को तीव्रतम रूप से लग चुकी है और जिसके चलते हमारे समाज मैं आये दिन ऐसे व इससे भी गंभीर मामले सामने आते हैं।

                कई साल पहले अमेरिका के ही एक जाने माने समाजशास्त्री डी.रीस्मन ने इस बात पर खासी चिंता जताई थी कि हमारे विकास के प्रचलित माडल इतने अधिक त्रुटिपूर्ण हैं कि वे मनुष्य के सर्वांगीण विकास को छोड़ उसके रोबोट होते जाने की त्रासदी को लगातार बढ़ा रहे हैं। आये दिन प्रगति और आधुनिकता का ढोल पीटने वाले जो इस पूंजीवादी व्यवस्था के दलाल हैं उनसे कोई पूछे कि यदि इतनी ही खूबियाँ हैं इस व्यवस्था मैं तो लगातार मनुष्यता शर्मशार क्यों है? समाज मैं मानसिक समस्याएं, बीमारियाँ, असमानताएं, आत्महत्याएं, अपराध और आक्रामकता सुरसा के मुंह की तरह क्यों बढ़ रही हैं ? पिछले ही वर्ष विश्व स्वास्थ्य संगठन ने अपनी एक रिपोर्ट मैं चौंका देने वाला खुलासा किया था कि भारत मैं डिप्रेसन के रोगियों की तादाद दुनिया मैं सर्वाधिक है। इस रिपोर्ट मैं यह उभर कर आया था कि भारतियों के जीवन मैं होने वाले अवसाद के मामलों (मेजर डेप्रेसिव एपिसोड) की दर दुनिया मैं सर्वाधिक यानि 35 . 9  प्रतिशत है जो चीन मैं सबसे कम यानी सिर्फ 12  प्रतिशत है। अत्यधिक आर्थिक व सामाजिक विषमतायें हमें कहीं-कहीं गावों की अपेक्षा शहरों मैं ज्यादा दिखाई देती हैं खासकर दिल्ली जैसे बड़े शहरों मैं। शहरों मैं कई अलग किस्म के तनाव होते हैं और यहाँ ग्रामीण व कस्बाई समाज की तुलना मैं सहयोगतंत्र लगभग नगण्य होता है। जैसे हम बस मैं लिखा देखते हैं कि सवारी अपने सामान की स्वयं रक्षा करेष् कमोवेश यही स्थिति मेट्रो व अन्य बड़े शहरों के बाशिंदों की होती है। वहां जरुरत पड़ने पर किसको पुकारा जाये ये बड़ी समस्या होती है क्योंकि पुकारने पर कोए आएगा ही ये बिलकुल भी निश्चित नहीं होता। अत: आम इंसान को छोटे दिल के बड़े शहरों मैं रोजाना की जद्दोजहद मैं पूरी तरह निकल चुके दम के बल पर ही रहना होता है।

                  दिल्ली मैं इस तरहा दुनिया से घबरा कर तन्हाई मैं खुद को कैद कर लेने का यह तीसरा बड़ा मामला है जो जाहिर हुआ है। 2011  से पहले 2007  मैं भी 3 बहनों ने यहीं खुद को इसी तरह कैद कर लिया था। इन तीनों मामलो मैं मैं यह भी देखने की बात है कि औरतों या लड़कियों ने ही इस प्रकार की धीमी मौत को गले लगाने के प्रयास किये हैं जो यह जाहिर करता है कि बड़े शहरों मैं आम औरत कितनी घुटन, भय, अंतर्द्वंदों, असुरक्षाओं व अवसाद मैं जीने के लिया मजबूर हैं। उनके लिए यहाँ हर तरफ,सहयोगी वातावरण का अकाल है, उनको सुनने वालों की कमी है, पुरुषवादी व्यवस्थाओं से उपजते जाते तनावों का सामना करने की रणनीतियां उनके पास पर्याप्त रूप से नहीं हैं। अंत मैं हार कर वे अपने आपको कई दरवाजों के पीछे बंद कर पुरुषवादी दुनिया से ओझल होकर मौत की तरफ खुद को धकेलने लगती हैं।

                 एक तरफ तमाम बाजारवादी तमाशे, मूर्छित करने वाली चमक-दमक और पूँजी की खुल्लम-खुल्ला अश्लीलताएं और बाकी तीनों तरफ धकियाये जाते गरीब, कई दरवाजों के पीछे खुद से कैद औरते और बूढ़े से दिखने वाले बच्चे. मुझे तो इसमें बड़ी गहरी साजिश नजर आती है क्या आपको भी...? अगर हाँ  तो मंटो की तरहा तख्ता-ए-सियाह पर इसे सफेद चाक से क्यों न लिखा जाये...?

? राहुल शर्मा