संस्करण: 25  जून-2012

विरोध के लिए विरोध और

विघ्न संतोषी

?     विवेकानंद

                  राष्ट्रपति जैसे गरिमामय पद के लिए जब देश के तमाम बुध्दिजीवी दलगत राजनीति से ऊपर उठने की अपील कर रहे हैं,वहीं बड़े ताजुब की बात है कि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ जैसा संगठन जो स्वयं राष्ट्रभक्त,अनुशासन प्रिय और सिध्दांतवादी होने का दावा करता है,उसके मुखिया अपनी ही पार्टी को नसीहत देते हैं कि अगले चुनावों में यदि सफलता की आकांक्षा है तो सरकार से लड़ते दिखो, भले ही पराजित हो जाओ। यह भी कम हैरानी वाली बात नहीं है कि आंतरिक लोकतंत्र होने का दावा करने वाली पार्टी भाजपा के भीतर ही नेता नहीं चाहते कि वे प्रणब मुखर्जी जैसे सर्वमान्य नेता के खिलाफ अनावश्यक संघर्ष में उतरें लेकिन उन पर दबाव बनाया जा रहा है कि वे लड़ें। क्या यही है राष्ट्रभक्ति और आंतरिक लोकतांत्रिक मूल्य को अक्षुण्य रखने का दावा करने वाली पार्टी और संगठन का चाल,चरित्र और चेहरा?

               बहरहाल भाजपा में राष्ट्रपति पद को जिस तरह का घमासान मचा हुआ है उससे इतना तो सामने आ गया कि पार्टी के पास कोई विजन नहीं है और न ही कोई वजन है। पिछले दिनों राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में संजय जोशी-नरेंद्र मोदी विवाद में पार्टी इतनी बुरी तरह उलझी कि उसे राष्ट्रपति चुनावों में हिस्सा लेने का होश ही नहीं रहा। अब जबकि यूपीए की ओर से केंद्रीय वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी का नाम घोषित कर दिया तब उसे होश आया कि कुछ यहां भी करना है, ताकि लगे कि हम विरोध कर रहे हैं। पर यह विरोध क्यों हो रहा है, इसका किसी भी विरोध करने वाले के पास न तो कोई तार्किक उत्तर है और न ही कोई वजह। बेवजह विरोध का भूत सवार है इसलिए दो ऐसे व्यक्तियों की तुलनात्मक विवेचना की जा रही है,जिनका आपस में कोई लेना-देना नहीं है। पूर्व राष्ट्रपति डॉ.ऐपीजे अब्दुल कलाम भारतीय विज्ञान जगत के सूर्य हैं तो प्रणब मुखर्जी राजनीतिक का ऐसा हस्ताक्षर जो जहां से हट जाएंगे वहां शून्य पैदा हो जाएगा। राष्ट्रभक्तऔर दूरदर्शिता के मामले में दोनों का ही कोई सानी नहीं हैं। एक ने देश को परमाणु शक्ति संपन्न बनाया तो दूसरे ने उस परमाणु शक्ति के अवाध प्रवाह की अंतराष्ट्रीय जगत से रक्षा की है। अमेरिका के साथ परमाणु करार के वक्त प्रणब दा की जो भूमिका रही उसकी जितनी सराहना की जाए कम है। मनमोहन सिंह ने बेशक अपनी सरकार दांव पर लगाकर अमेरिका के साथ परमाणु करार किया था,लेकिन देश की परमाणु शक्ति की रक्षा करने में पर्दे के पीछे प्रणब दा ने जो भूमिका अदा की उसका अमेरिका के पास आज भी कोई तोड़ नहीं है। अमेरिका इस जिद पर अड़ा था कि पहले करार हो जाएग उसके बाद वह अपने यहां इस प्रस्ताव को पास करेगा। इसके पीछे मकसद यह था कि करार हो जाने के बाद वह अपने यहां मनचाहा प्रस्ताव पास करा लेगा और इस प्रस्ताव में संदेह था कि अमेरिका भारत पर परमाणु परीक्षण के लिए प्रतिबंध लगा सकता है। लेकिन प्रणब दा इस चाल को भांप गए और उन्होंने अमेरिकी विदेश मंत्री कोंडलीजा राइस को खाली हाथा भारत से लौटा दिया। दादा ने साफ कर दिया कि पहले करार का प्रस्ताव अमेरिकी कांग्रेस और सीनेट से पास कराएं इसके बाद करार होगा। दादा ने यह सब इसलिए किया ताकि फिर कोई अमेरिकी राष्ट्रपति आकर करार के नियमों का उल्लंघन करके भारत की परमाणु शक्ति को बंधक न बना सके। क्या ऐसे व्यक्ति की राष्ट्रभक्ति पर उंगली उठाई जा सकती है? या किसी आरोपों के चलते ऐसे व्यक्ति की योग्यता को बंधक बनाया जा सकता है? शायद भाजपा इसी असमंजस के कारण प्रणब दा को लेकर किसी निणर्य पर नहीं पहुंच पा रही है। लेकिन दलगत राजनीति के दलदल में सत्ता के लिए छटपटा रही महत्वाकांक्षा उसे विवश कर रही है कि वह विरोध करे और यही स्थिति संघ की भी है।

                 दूसरी ओर हैं ममता बनर्जी, तृणमूल की इस नेत्री ने आजीवन संघर्ष किया और वामपंथी किले को ध्वस्त किया। कभी कभी सनक में बड़े काम हो जाते हैं,इससे सनक को सफलता का सर्टिफिकेट नहीं दिया जा सकता। ममता ने बेशक जिद की और सत्ता की जंग जीती, लेकिन उससे वे खुद को राजनीति का सिकंदर समझने लगेंगीं तो नुकसान उनका ही होगा। और ममता दीदी आज यही कर रही हैं। प्रणब मुखर्जी को लेकर उनकी जो भी अदावत है वह अपनी जगह है, लेकिन राष्ट्रपति जैसे सर्वोच्च पद बैठने जा रहे व्यक्ति का सिर्फ उस अदावत पर विरोध किया जाए या फिर किसी से बदला लेने के लिए किसी और को निशाना बनाया जाए यह न तो उचित है न ही ममता जैसी संघर्षशील नेत्री को शोभा देता है। प्रणब दा की न तो कोई ईमानदारी पर उंगली उठा सकत है और न ही यह कह सकता है उनका दुनिया में सम्मान नहीं है। लेकिन ममता ने आवेश में अप्रत्यक्ष से प्रणब दा को यह दोनों तमगे दे दिए। दूसरी बुरी बात यह है कि ममता जैसी नेता ने राजनीति के स्थान पर चालाकियों का सहारा लिया। ममता भले ही कहें कि उन्होंने कुछ भी गलत नहीं किया, लेकिन इसे उनके अलावा कोई और स्वीकार नहीं करेगा। ममता को यदि प्रणब दा पसंद नहीं थे तो कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी से बातचीत के दौरान वे कह सकती थीं। वे सोनिया गांधी से यह भी कह सकती थीं कि हम तीन लोगों में से किसी एक को राष्ट्रपति बनाना चाहते हैं वे फलां-फलां हैं। लेकिन ममता ने घाघ राजनीतिज्ञ की तरह सोनिया गांधी को मात देने की कोशिश की और पहले उनकी पसंद को उजागर किया और फिर अपनी ओर से मुलायम सिंह यादव के साथ मिलकर तीन नाम जाहिर किए। और सबसे बड़ी बात यह कि इसमें भी उन्होंने मनमोहन सिंह का नाम लेकर कांग्रेस को उलझन में डालने की साजिश कर डाली। ममता जानतीं थी कि जो तीन नाम वे सुझा रहीं हैं उन पर कांग्रेस कभी राजी नहीं होगी। कलाम को लेकर कांग्रेस में आमराय नहीं बनती क्योंकि पहली बात कांग्रेस के पास अपना नेता उपलब्ध है और वह भी सर्वमान्य। दूसरे थे मनमोहन सिंह, यदि कांग्रेस उन्हें प्रधानमंत्री की कुर्सी से उतार कर राष्ट्रपति पद पर बैठाती तो न केवल परंपराओं के विपरीत होता बल्कि सरकार में प्रधानमंत्री पर अविश्वास का सवाल खडा हो जाता। और तीसरे थे पूर्व लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी। सोम दादा फिलहाल अलग-थलग पड़े हुए हैं, वामदलों ने उन्हें पार्टी से बाहर किया हुआ है, इसलिए उन पर आमराय बनाना नामुमकिन था। यदि ममता की बात मान भी ली जाती तो सोम दा के लिए वोट जुगाड़ना मुश्किल हो जाता। भाजपा उन पर शायद ही राजी होती। यानि ममता ने पूरा प्लान बना रखा था कि कांग्रेस को कैसे फंसाया जाए। यदि ऐन वक्त पर सोनिया गांधी कमान न संभलतीं और पार्टी के वरिष्ठ नेता सक्रिय नहीं होते तो ममता का जयचंदी कदम कांग्रेस के लिए किरकिरी का सबब बन जाता। ममता ऐसा क्यों कर रही हैं?स्थानीय राजनीति का तकाजा है या वाकई उनकी प्रणब दा से व्यक्तिगत रंजिश है,लेकिन उन्होंने जो किया है उससे गठबंधन की राजनीति में देश का उध्दार और लोकतंत्र की सुरक्षा देखने वालों का मिथक जरूर टूटा है। ममता ने पहले एनडीए की सरकार में मनमानी की और अब यूपीए की सरकार में उनके अड़ियल रवैए के कारण कई महत्वपूर्ण निर्णय रुके पड़े हैं। ममता को अपनी जिद के आगे रसातल में जाती राष्ट्र की अर्थव्यवस्था दिखाई नहीं देती। यह स्वार्थ की पराकाष्ठा है। इसके पीछे एनडीए थी इसका खुलासा भी हो चुका है। जिन्हें आज तक देश स्वीकार नहीं कर पाया वे जनता पार्टी के अध्यक्ष सुब्रह्मण्यम स्वामी इस षडयंत्र के सूत्रधार थे। कहते हैं न जिनसे अपना घर नही संभलता वे दूसरों के घर तोड़ने पर उतारू हो जाते हैं। एनडीए भी आजकल इसी पीड़ा से ग्रस्त है। एनडीए के प्रमुख घटक दल जदयू के नेता गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के खिलाफ हैं। हाल ही में पार्टी ने साफ चेतावनी दे दी है कि यदि मोदी को पीएम पद का कंडीडेट घोषित किया गया तो गठबंधन टूट जाएगा। ऐसे लोग यदि किसी दूसरे का घर फोड़ने की कोशिश करें तो उनकी लाचारी को समझा जा सकता है।

                बहरहाल कोई भी अच्छा काम हो विघ्नसंतोषी मिल ही जाते हैं। संसार की सबसे ईमादार चौकड़ी यानि टीम अन्ना ने भी प्रणब मुखर्जी पर भ्रष्टाचार में लिप्त होने के आरोप लगा डाले। एक नहीं चार-चार। पता नहीं इन आरोपों में कितना दम है,लेकिन प्रणब दा का जितना सम्मान देश में है,उसे देखकर तो इनमें दम नहीं लगता। अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसौदिया ने जो राग अलाप रखा है, ऐसा लगता है कि उस वक्त विपक्ष नहीं था, इसलिए उसे इन सभी घटनाओं की जानकारी नहीं है। क्या मजाक है कि अन्ना हजारे स्वयं प्रणब दा को बधाई दे रहे हैं और कह भी रहे हैं कि मोजूदा राजनेताओं वे सर्वश्रेष्ठ हैं, वहीं उनकी टीम कह रही है कि दादा भ्रष्टाचार में लिप्त हैं। अगर प्रणब वाकई भ्रष्टाचार में लिप्त होते तो क्या भाजपा और समूचे एनडीए को दादा ने कोई रिश्वत खिलाई है जो अपना मुंह बंद किए बैठी है? यूपीए के कंडीडेट के खिलाफ प्रत्याशी ढूंढ रही एनडीए क्या दादा के दागों को सामने लाकर उनके खिलाफ जनमत खड़ा नहीं कर सकती है? 2जी मामले में गृह मंत्री चिदंबरम को लेकर आसमान सिर पर उठा लेने वाली भाजपा क्या ऐसे व्यक्ति को खुल्ला छोड़ देती जो सरकार का संकट मोचक कहा जाता है? पर शायद विपक्ष से यादा टीम अन्ना को किसी स्वार्थ पूर्ति का इंतजार है,इसलिए वह लगातार कुछ न कुछ ऐसा बोलती रहती है जिससे उसे छपने और दिखने का मौका मिलता रहे। हाल ही में अरविंद केजरीवाल इंदौर आए थे , उन्होंने यहां आकर नया रहस्योद्धाटन किया कि टीम अन्ना को तोड़ने के लिए 100करोड़ रुपए खर्च किए गए हैं। क्या यह आंकड़ा विश्वास करने लायक है? बिल्कुल नहीं है लेकिन  सुर्खियों में जरूर रहा।

                गोस्वामी तुलसीदास ने ऐसे लोगों के लिए कहा है:

                ऊंच निवास नीच करतूती। देख न सकईं पराई विभूति

                 अर्थात जो बैठे तो ऊंचे स्थान पर होते हैं, लेकिन उनकी आदतें छोटी होती हैं, ऐसे लोगों से दूसरे का भला होते नहीं देखा जाता।

                प्रणब मुखर्जी पर हो सकता है आरोप हों, उनके हाथ से यह भी संभव है कि कुछ ऐसे काम हो गए हों जिन्हें भ्रष्टाचार के रूप में देखा जा रहा है। लेकिन इससे पहले वे अपने गिरेवां में झांक लें जो अपने एनजीओ के लिए पैसा बचाने के लिए सस्ते किराए में सफर करके महंगे सफर की रकम वसूलते हैं, वे भी अपने आप को परख लें जिन्होंने समाजसेवा के नाम पर सरकारी नियमों को ताक पर रख दिया था। और वे भी इस विरोध पर विचार करें जिनसे अपना घर नहीं संभल रहा है।

? विवेकानंद