संस्करण: 25 जुलाई- 2011

 गर्भनिरोधक गोलियों से स्वास्थ्य के लिए खतरा

? अंजलि सिन्हा

               गर्भनिरोधक गोलियों के बढ़ते प्रचलन की ख़बरों के बीच -जिसके लिए बड़ी बड़ी फार्मास्युटिकल कम्पनियों द्वारा दिए जानेवाले भ्रामक विज्ञापन कम जिम्मेदार नहीं हैं - यह आवाजें भी अब तेज हो रही हैं जो बता रही हैं कि इनका बढ़ता इस्तेमाल किस तरह महिलाओं के स्वास्थ्य पर भारी असर डाल रहा है।

               इक्कीस से चालीस के उम्र तक गर्भनिरोधक गोलियों का इस्तेमाल करनेवाली महिलाओं पर एक ताजा अधययन हुआ है जिसमें बताया गया है कि इन गोलियों का अधिक इस्तेमाल दिल को कमजोर बनाता है। फोर्टिस एस्कार्ट अस्पताल के कार्डियोवास्कुलर सर्जरी विभाग के डॉ. जेड एक. मेहरवाल ने बताया है कि गर्भनिरोधक गोलियों में एस्ट्रोजन हार्मोन पाया जाता है जो ब्लड़ प्रेशर बढ़ाता है तथा नसों में खून का थक्का जमने का कारण भी बन सकता है। दो से तीन साल तक गोलियों का इस्तेमाल सही माना गया है। दस से चौदह साल तक इन गोलियों का इस्तेमाल करनेवाली महिलाओं को विशेषज्ञों ने तुरन्त जांच की सलाह दी है। नॅशनल हार्ट इन्स्टिटयूट के डाँ ओ पी यादव ने भी क्लिनिकल टेस्ट की सलाह दी है। डाक्टरों के मुताबिक पिल्स के इस्तेमाल के लिए सबसे बेहतर समय 29-32 तक है। इससे अधिक उम्र में गर्भनिरोध के लिए पिल्स का प्रयोग सही नहीं कहा जा सकता। इस स्थिति में अधिक उम्र में गर्भधारण नवजात में मानसिक विकृतियां एवं अन्य परेशानियों का भी कारण बन सकता है।

               गर्भनिरोधक गोलियों के विपरीत प्रभावों को लेकर आ रही यह जागरूकता हमें बरबस 70 के दशक में अमेरिकी संसद में चली बहसों की याद दिलाती है जब इन पिल्स के खतरनाक प्रभावों को लेकर वहां बात चली थी और स्त्रियों के लिए ''मुक्तिदायी'' और ''क्रान्तिकारी'' कही गयी इन गोलियों के जरिए किस तरह स्त्रियों के जीवन पर पितृसत्तात्मक नियंत्रण नए सिरे से कायम किया जा रहा है, वह उजागर किया गया था। एक क्षेपक के तौर पर यह भी बताया जा सकता है कि गर्भनिरोधक गोलियों के आविष्कार के पीछे भी कुछ अग्रणी महिला कार्यकर्ताओं की कोशिशें थी जिन्होंने इस बात को देखते हुए कि गर्भावस्था एवं बच्चों के लालन पालन की अत्यधिक जिम्मेदारी चूंकि स्त्रियों के जिम्मे आती है, इसलिए ऐसे गर्भनिरोधक की कल्पना की थी जिस पर उन्हीं का नियंत्रण हो।

               अगर हम आंकड़े देखें तो वह उजागर करते हैं कि इन गोलियों का प्रचार प्रसार कितना बढ़ रहा है। आंकड़ों के हिसाब से 2010 में चार करोड़ गर्भ निरोधक गोलियां बिकीं, 2009 में यह संख्या 82 लाख थी। 2008 के मुकाबले 2009 का आंकड़ा 250 गुना ज्यादा था।

               इन गोलियों के अलावा गर्भनिरोधक टीकों का इस्तेमाल भी स्वास्थ्य के लिए बेहद खतरनाक बताया गया है। पिछले नवम्बर में कई महिला संगठनों ने मिलकर स्वास्थ्य मन्त्री गुलाम नबी आजाद तथा स्वास्थ्य सचिव सुजाता राव को एक ज्ञापन सौंपा जिसमें अनुरोध किया कि 'डेपो प्रोवेरा' तथा 'नेटन' नामक गर्भनिरोधक टीकों का इस्तेमाल नहीं किया जाय।

               एक तरफ भारत में जनसंख्या वृध्दि गम्भीर चिन्ता का विषय बना है तो दूसरी तरफ महिलाओं को अनचाहा गर्भ से मुक्ति भी चाहिए होती है। इसमें दो समस्याएं प्रमुख है। एक तो गर्भनिरोध के उपाय करने का बोझ आमतौर पर औरत का जिम्मा होता है। दूसरे इन टीकों या गोलियों के व्यापक जांच के बिना ही वह महिलाओं के इस्तेमाल के लिए तरह-तरह के ब्राण्डनेम से बाजार में उपलब्ध होती है। 'अनवान्टेड प्रेगनेन्सी' को रोकने के नाम पर युवतियों को केन्द्र में रखते हुए बनायी गयी विज्ञापन श्रृंखला सभी लोगों ने टीवी पर देखी होगी। इसके अलावा स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी तथा परिवार में महिला का उपेक्षित स्वास्थ्य कुल मिलाकर गम्भीर स्थिति पैदा कर देता है।

               हमारे समाज में नसबन्दी को लेकर जागरूकता के मामले में स्त्रियों एवं पुरूषों में कितना फर्क है यह कुछ आंकड़ों से भी परिलक्षित होता है। यह कहना अनुचित नहीं होगा कि पुरूषों का बहुमत इसका जिम्मा महिलाओं पर ही डालता है, फिर वह चाहे कापरटी लगवा ले या गर्भनिरोधक गोलियां लें या टीके लें। कुछ साल पहले दिल्ली स्टेट हेल्थ रिपोर्ट के मुताबिक राजधानी की लगभग 25 फीसद महिलाओं ने ऑपरेशन कराया जबकी पुरुषों में यह आंकड़ा एक फीसद का था। दिल्ली के हर जोन के आंकड़े मिशन के पास उपलब्ध होते हैं जिसमें पाया गया है कि महिलाओं में नसबन्दी के प्रति जागरूकता वढ़ी है जबकि पुरुष इस मामले में लापरवाह होते है। दिल्ली इकॉनॉमिक सर्वे रिपोर्ट से भी दिखता है कि 25 साल में (1980-81 से 2005-06 के बीच) पुरुषों की भागीदारी आधी घट गयी जबकि महिलाओं की भागीदारी ढ़ाई गुना बढ़ गयी। इसके बावजूद हमारे देश में अनचाहा गर्भ तथा असुरक्षित गर्भपात एक गम्भीर समस्या है। हर साल असुरक्षित गर्भपात के कारण 18 हजार महिलाएं मर जाती है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-3 के मुताबिक हर साल पैदा होनेवाले बच्चों में आधे से अधिक अनचाहे होते हैं। इसके लिए रिपोर्ट में जागरूकता की कमी का कारण बताया गया है। इन दोनों समस्याओं के कारण भारत में मातृ शिशु मृत्युदर आज भी गम्भीर बना है तथा भारत दुनियाभर में कुछ देशों को छोड़कर सबसे नीचली पायदान पर खड़ा है।

               अनचाहे गर्भ से मुक्ति के लिए जरूरी होता है बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं तथा जानकारी साथ ही पार्टनर का संवेदनशील और जागरूक तथा जवाबदेह होना भी जरूरी है। शोध बताते है कि पुरुषों को स्वास्थ्य सम्बन्धी जटिलताओं का सामना नही करना पड़ता है लिहाजा उन्हे यह जिम्मेदारी अधिक लेनी चाहिए। उनमें भी जानकारी का अभाव तरह-तरह की भ्रान्तियों के साथ लापरवाही एवम् गैरजिम्मेदारी का भाव ही प्रमुख कारण है कि वे निरोधों के प्रति सचेत नहीं है। इसलिए कोई भी उपाय हो महिला को ही करना पड़ता हैं। इस समस्या से निपटने के लिए व्यापक तथा गम्भीर प्रयास की जरूरत है। यह ऐसा मुद्दा भी है जिसपर हमारे समाज में खुलकर चर्चा होती नही हैे। लेकिन महिलाओं के स्वास्थ्य का नुकसान तथा होनेवाली दिक्कतों के मद्देनजर जरूरी है कि कई स्तर से बात उठे।  


? अंजलि सिन्हा