संस्करण: 25 जुलाई- 2011

भूजल दोहन और भरपाई हेतु कड़ा कानून जरूरी

? शब्बीर कादरी

               'सरकार सिंचाई और औद्योगिक उद्देश्यों के लिए भूजल के अनियंत्रित दोहन पर लगाम लगाने की तैयारी में है, क्योंकि इससे ग्रामीण भारत में पेयजल की आपूर्ति पर दुष्प्रभाव पड़ रहा है। भूजल के स्रोत जरूरत से यादा दोहन के चलते सूख रहे हैं और ऐसे में पेयजल की आपूर्ति प्रभावित हो रही है क्योंकि ग्रामीण भारत में 90 प्रतिशत योजनाऐं भूजल स्रोतों पर निर्भर रहती हैं। औद्योगिक और सिंचाई उद्देश्यों के चलते इस भूजल के अनियंत्रित दोहन के कारण ये स्रोत सूखते जा रहे हैं। 'हाल ही में ये विचार केन्द्रीय ग्रामीण विकास मंत्री ने एक कार्यक्रम में व्यक्त किये हैं। कुछ समय पूर्व भूजल की परिस्थिति से चिंतित योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया ने भी कहा था कि भूजल को केन्द्र और राय की समवर्ती सूची में लाया जाना चाहिये और इसकी निकासी पर कुछ करारोपण किया जाना आज की आवश्यकता है'। वास्तव में वर्षों से वर्षा हमारी पेयजल, सिंचाई और औद्योगिक आवश्यकताओं की पूर्ति करती आई है पर जब कभी मानसून या मौसम दगा दे जाता है तो आमजीवन की समस्याऐं कहीं अधिक जटिल बन जाती हैं। मानसूनी वर्षा पर अभी भी हमारी कृषि और पेयजल का आधे से अधिक भाग निर्भर है। मानसूनी वर्षा के समुचित उपयोग के संदर्भ में अभी हमारा हाल यह है कि वर्षा कम हो या अधिक हम उसका नियोजित उपयोग करने में असफल रहे हैं। हरित क्रांति के जनक और प्रमुख कृषि वैज्ञानिक स्वामीनाथन ने दुख व्यक्त करते हुए हाल ही में कहा है कि हमारे पास कमजोर मानसून से निपटने और अच्छे मानसून का भरपूर फायदा उठाने की कोई रणनीति नहीं है। अगर अच्छी वर्षा हुई तो बाढ़ का विनाश हमे झेलना पड़ता है और कम वर्षा हुई तो सूखा हमारे जीवन की राह में काँटे बिछाता है।

               पिछले कुछ वर्षों से देशभर के अधिसंख्य शहरों और गाँवों में न सिर्फ नदियाँ सूख कर पानी के लिये तरस गई हैं, कुंए और नलकूप भी आश्चर्यजनक गहराई में जल की बची खुची मात्रा से अपना अस्तित्व बचाए हुए हैं। भू-गर्भ जल संकट की स्थिति यह है कि देश के कुल 5,723 ब्लाके में से 839 अत्यधिक भू-गर्भ ज के दोहन के कारण 'डार्क जोन' में चले गए हैं। 226की स्थिति क्रिटीकल और 550 सेमी क्रीटिकल मे हैं। पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, आंध्रप्रदेश और तमिलनाडु गंभीर रूप से इस संकट का सामना कर रहे हैं। जबकि उत्तरप्रदेश, उत्तराखंड, पश्चिम बंगाल, गुजरात और केरल भी इस समस्या से अछूते नही हैं। रायवार यदि देखें तो तमिलनाडु के 385 ब्लाक में से 33 क्रिटीकल और 57 सेमी क्रीटिकल जोन में हैं। आंध्रप्रदेश में 219 ब्लाक में 77 क्रिटीकल और 175 सेमीक्रि टीकल जोन में हैं। हरियाणा के 113 ब्लाक में से 11 क्रिटीकल और पांच सेमी क्रिटीकल हैं। सर्वाधिक खराब स्थिति पंजाब की है जहां के 137 ब्लाक में पांच क्रि टीकल और चार सेमी क्रिटीकल जोन में हैं। भूजल में कमी के मामले में मध्यप्रदेश की एक रिपोर्ट बताती है कि यहां सतत प्रवाही नदियों के तटवर्ती क्षेत्र को छोड़, सभी क्षेत्रों में भू-जल स्तर नीचे जा रहा है। मालवा, बुन्देलखंड और विंध्य क्षेत्र में तो भू-जल स्तर तेजी से नीचे खिसक ही रहा है। राय के सतपुड़ा और विंध्याचल पर्वतों की तलहटी के भूभागों में भी जल स्तर एक से दो मीटर नीचे खिसक गया है।      

               योजना आयोग के अनुसार भूजल का 8प्रतिशत उपयोग हमारे कृषि क्षेत्र द्वारा किया जाता है। विश्व बैंक की मानें तो भूजल का सर्वाधिक 92 प्रतिशत और सतही जल का 89 प्रतिशत उपयोग कृषि में होता है। 5 प्रतिशत भूजल व 2 प्रतिशत सतही जल उद्योग में 3 प्रतिशत भूजल व 9 प्रतिशत सतही जल घरेलू उपयोग में लाया जाता है। योजना आयोग के ही अनुसार देश का 29 प्रतिशत क्षेत्र पानी की गंभीर समस्या से जूझ रहा है। भले ही जल संकट की यादा जिम्मेदारी कृषि पर डाली जाए लेकिन हकीकत है कि जल संकट गहराने में उद्योगों की भी विशेष भूमिका है। विश्व बैंक के अनुसार कई बार कारखाने एक ही बार में इतना अधिक पानी खींच लेते हैं कि जितना एक गांव पूरे महीने में भी नहीं खींच पाता।

               केन्द्रीय भूजल बोर्ड कहता है कि हर साल 432 अरब मीटर भूजल उपयोग के लिए हम प्राप्त कर सकते हैं जिसकी भरपाई भी संभव है। भूजल दोहन के अनियंतित्र दोहन के संबंध में केन्द्र का एक आदर्श विधेयक पिछले 40 वर्षों से सत्ता के गलियारों में भटक रहा है। वर्ष 1970 में केन्द्र ने इस विधेयक जिसे भूजल संरक्षण विधेयक कहा गया देश के सभी रायों, केन्द्र शासित रायों को भेजा, बाद में कोई प्रतिक्रिया न होने पर इसे फिर से 1992, 1996, 2005 में भी भेजा गया पर रायों ने इसे लागू करने में कोई रूचि नहीं दिखाई अभी केवल देश के 11 राय और केन्द्रशासित राय इसे अपने यहां लागू किए हुए हैं।

               भूजल भरपाई के लिए वाटर हार्वेस्टिंग एक उत्तम उपाय है पर न केवल आमजन बल्कि उद्योग और सरकार भी इस मामले में बेहद उदासीन है। भोपाल के अधिसंख्य लोग बाकी भूजल पर ही निर्भर हैं, लगभग हर दूसरे घर में नलकूप मिल सकता है। हालांकि निगम प्रशासन ने छूट दे रखी है कि रेन वाटर हार्वेस्टिंग करवाने वालों को उस वर्ष देय संपत्ति कर में 6प्रतिशत की छूट दी जाएगी पर कड़ाई न लागू होने से आमजन और बिल्डर इस तरफ घ्यान ही नहीं देते। रेन वाटर हार्वेस्टिंग को अनिवार्य बनाने हेतु कई बार नियम बनाए गए हैं वर्ष 2000से शहर में 1000 वर्गमीटर से अधिक के निर्माण क्षेत्र पर इसे अनिवार्य किया गया है फिर इसे वर्ष 2005 में 250 वर्गमीटर से अधिक के निर्माण हेतु जरूरी बनाया गया। वर्ष 2007 में 140 वर्गमीटर से अधिक के निर्माण हेतु इसे लागू किया गया और अब निगम प्रशासन ने भवन अनुज्ञा के साथ ही इसे आवश्यक बना दिया है फिर भी वाटर हार्वेस्टिंग के संतोषजनक ऑंकड़े नहीं मिल पा रहे हैं ये कहानी सिर्फ एक शहर की है आप समझ सकते हैं पूरे जिले, राय और अन्य रायों का भूजल संरक्षण के प्रति क्या रवैया होगा। एक और भूजल का दोहन बेरहमी से किया जाए और दूसरी और वाटर रीचार्जिंग पर कोई सख्ती न हो ऐसे में इस लापरवाही को आपराधिक कृत्य निरूपित करते हुए कड़ी कार्यवाही की जाना कल के जीवन के लिये बेहद जरूरी है।


? शब्बीर कादरी

लेखक 'नेचरटुडे' पत्रिका के संपादक हैं