संस्करण: 25 जुलाई- 2011

आश्चर्य में डालती

मंदिरों की दौलत

? प्रमोद भार्गव

               प्राचीन व प्रतिष्ठित मंदिरों से निकल रहे धन-दौलत के खजाने आश्चर्यचकित करने वाले हैं। केरल की राजधानी तिरूअनंतपुरम् के श्री पद्मनाभ स्वामी मंदिर के गर्भ गृह से निकले खजाने से साबित होता है कि भारत को सोने की चिड़िया यूं ही नहीं कहा गया ? यवन आक्रांता महमूद गजनबी से लेकर फिरंगियों की ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारत को लूटने की यात्राएं बेवजह नहीं कीं। भारत में सोने-चांदी, हीरे-जवाहरात के अकूत भण्डार थे। हालांकि भारत जब सोने की चिड़िया कहलाता था तब भी गांवों में सामंती व्यवस्था के चलते ग्रामों में गरीबी पसरी थी, किंतु भगवान तब भी अमीर थे। आज जब मंदिरों के चढ़ाये जाने वाले चढ़ावों की जानकारी बाहर आ रही है, तब भी हैरानी होती है कि इन मंदिरों में चढ़ावों का धन-संपत्ति विदेशी बैंकों में जमा कालाधन की कुल जमा संपत्ति से कहीं ज्यादा है। अकेले पद्मनाम स्वामी मंदिर के गुप्त खजाने ने करीब एक लाख करोड़ की संपदा उगली है। यह धन देश के कई राज्यों के वार्षिक बजट से ज्यादा है। यदि इस धन राशि से राज्यों की अर्थव्यवस्था को मजबूत किए जाने का सिलसिला शुरू हो जाए तो कई राज्यों का कायाल्प हो सकता है। लेकिन आस्था के चलते क्या जंग खा रही इस विपुल धन राशि को इंसानी सरोकारों से जोड़ना संभव है ?

               मंदिरों से मिल रहे खजानों के बाद अब इन तथ्यों को झुठलाने की कोई जरूरत नहीं रह गई है कि भारत में यवन, तुर्क, मुगल और अंग्रेज भारत को लूटने के नजरिए से ही आए थे। क्योंकि देश के प्रमुख राष्ट्रीयकृत बैंकों और सरकारी कोषालयों से कई गुना ज्यादा खजाना धार्मिक स्थलों के तहखानों में पाया जाना इस बात का प्रमाण है कि देश आर्थिक रूप से हमेशा संपन्न रहा है। श्री पद्मनाभ स्वामी मंदिर खजाने ने फिलहाल सबसे अमीर माने जाने वाले मंदिर तिरूपति बालाजी को पीछे छोड़ दिया है। यहां तक खोले गए छह में से पांच तलघरों से एक लाख करोड़ की संपत्ति मिल चुकी है। अभी कुछ और तहखानों को खोला जाना बाकी है। इस मंदिर से अभी तक जो धनराशि मिली है, उसका यदि तुलनात्मक मूल्यांकन किया जाए तो यह देश के कई राज्यों के सालाना बजट से कहीं ज्यादा है। दिल्ली, झारखण्ड और उत्तराखण्ड के कुल वार्षिक से भी यह राशि 23 हजार करोड़ रूपए ज्यादा है। देश की सबसे बड़ी 'मनरेगा' परियोजना का बजट भी इससे आधा है। तिरूपति बालाजी मंदिर के पास भी इतनी दौलत है कि वह देश के कुल बजट के पांचवें हिस्से तक पहुंच गई। इस मंदिर के खजाने में अभी 50हजार करोड़ रूपए जमा हैं। एक साल में करीब 650 करोड़ कमाने वाले अरबपति बालाजी भगवान दुनिया में सबसे धनपति भगवान हैं। यह मंदिर अब विदेशी मुद्रा की आय का भी जरिया बन रहा है। अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा, सिंगापुर, दक्षिण अफ्रीका, मलेशिया जैसे 12 देशों की मुद्रा चढ़ावे के रूप में यहां उपलब्ध है। इस मंदिर को करीब एक सौ करोड़ रूपए की वार्षिक कमाई अकेले मुंडन कराने आए श्रध्दालुओं के बाल काटकर बेचने से होती है।

               श्री पद्मनाभ स्वामी मंदिर से निकले खजाने को लेकर इस पर किसका अधिकार हो यह बहस भी छिड़ गई है। कुछ तर्कशास्त्री तर्क दे रहे हैं कि आखिरकार किसी भी देश में मौजूद कोई भी संपत्ति राष्ट्र की धरोहर होती है, इसलिए इसे राष्ट्रीय संपत्ति घोषित की जाकर देश के पिछड़े क्षेत्रों के कमजोर तबकों व वंचित समाज के कल्याण में लगाया जाए। इन तबकों के बच्चों को उच्च गुणवत्ताा वाले विद्यालयों में धनाभाव के कारण प्रवेश नहीं मिल पाता इसलिए अच्छे स्कूल खोले जाने में इस राशि को खर्च किया जाए। ग्रामीण क्षेत्रों में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र न होने के कारण, इस राशि को स्वास्थ्य के क्षेत्र में खर्च किए जाने की भी पैरवी की जा रही है। हालांकि इस दौलत को जनता की भलाई में लगाने की वकालत करने वाले एक तर्कशास्त्री यू कलानाथन को कट्टर धर्मावलंबियों के गुस्से का शिकार भी होना पड़ा। इनके घर में तोड़फोड़ की गई। हालांकि इस तरह के आक्रोश को तार्किक नहीं कहा जा सकता है। यह विपुल राशि यदि चलन में नहीं लाई जाती है तो यह खोटी कहलाएगी और इसकी सार्थकता के कोई मायने नहीं रह जाएंगे। भगवान को अर्पित दौलत से यदि गरीबों का कल्याण होता है तो इससे भला कोई दूसरा काम नहीं हो सकता है।

               हालांकि बहस इस बात पर हो सकती है कि इस धन संपदा पर पहला हक किसका हो, राज्य सरकार का अथवा केंद्र सरकार का ?चूंकि यह संपदा केरल के मंदिर से हासिल हुई है इसलिए इसमें कोई दो राय नहीं होनी चाहिए कि इस पर पहला अधिकार राज्य सरकार का है। यह दौलत केरल के कुल वार्षिक बजट से दोगुनी है। यदि केरल का कर्ज पटाने में इस राशि का उपयोग किया जाए तो केरल पूरी तरह कर्ज मुक्त हो चुकने बावजूद 30 हजार करोड़ की संपत्ति राज्य सरकार के पास बची रहेगी। हालांकि इस दिशा में एकाएक कोई राय जताकर फैसला ले लेना जल्दबाजी होगा। वैसे भी करीब डेढ़ सौ सालों से बंद तहखानों के कपाटों (द्वारों) को सुप्रीम कोर्ट के आदेश से खोला गया है। दौलत की गणना और जांच-पड़ताल भी कोर्ट की निगरानी में चल रही है। अभी एक तहखाना खुलना बाकी भी है।

               इतिहासकारों का यह मानना है कि यह खजाना त्रावणकोर के राज परिवार का है। उन्होंने लुटेरों से इसे सुरक्षित रखने की दृष्टि से तिलिस्मी शिल्प से बनाए गए तलघर में रखा था। क्योंकि इस तहखाने का रास्ता किवाड़ों से बंद न होकर ग्रेनाइट की मजबूत चट्टानों से ढका था। इन चट्टानों को खिसकाने पर एक गुप्त कक्ष मिला है। जिसका रास्ता एक सुरंग से होकर गुजरता है। इस सुरंग में एक बार एक ही व्यक्ति प्रवेश कर सकता है। मिला खजाना कक्ष के फर्श पर बिखरा था। कुछ खजाना दीवारों में खचीं लोहे की तिजोरियों में बंद। इनमें से कुछ तिजोरियां खोली जानी हैं। इन तिजोरियों के ऊपर सांप के चिन्ह बने हुए हैं। इन चिन्हों को देखकर राजपरिवार के वंशज, पुजारी व कुछ धर्मभीरू यह आशंका जता रहे हैं कि इन तिजोरियों को खोला गया तो अपशकुन होगा। जिसके प्रभाव से राज्य में सूखा पड़ सकता है अथवा कोई भयंकर प्राकृतिक आपदा आ सकती हैं। लेकिन ये आशंकाएं भ्रामक हैं। इन शगुन-अशगुनों व चमत्कारों के फेर में भारत ने बहुत खामियाजा भुगता है। इन थोथे भ्रमों से भारतीय इतिहास भरा पड़ा है। जब भारत में पहला लुटेरा यवन महमूद गजनवी आया था तो उसने सशस्त्र लुटेरों के साथ सोमनाथ के विश्व प्रसिध्द मंदिर पर हमला बोला। तब मंदिर के पंडे-पुजारियों ने मंदिर की सुरक्षा में तैनात सैन्य बलों को भरोसा जताया कि भोले शंकर तीसरा नेत्र खोलेंगे और हमलावर शिव की क्रोधाग्नि से भस्म हो जाएंगे। लेकिन इतिहास गवाह है कि ऐसा नहीं हुआ। आक्रमणकारियों ने पवित्र शिवलिंग तो खण्डित किया ही मंदिर की अकूत व बहूमूल्य धन-संपदा भी लूटकर ले गए। लिहाजा तहखाने में उपलब्ध प्रत्येक कक्ष और तिजोरी को बिना किसी दैवीय शक्ति के भय के खोला जाना जरूरी है। प्राचीन समय में ऐसे भय एवं भ्रम लुटेरों से सुरक्षा की भी दृष्टि से जानबूझकर सुनियोजित ढंग से फैलाए जाते थे।

               इस मंदिर की दौलत को आम आदमी की भलाई में लगाने की प्रेरणा हमें पुट्ठापार्थी के सत्य साईं ट्रस्ट, तिरूपति बालाजी और शिरडी के साईं बाबा मंदिर न्यास से लेनी चाहिए। सत्य साईं न्यास के उच्च गुणवत्ता वाले बड़े अस्पताल और चिकित्सा महाविद्यालय तो हैं ही, 750 ग्रामों की पेयजल व्यवस्था भी यह ट्रस्ट अपने खर्चे से उठाता है। तिरूपति बालाजी मंदिर न्यास भी कई शिक्षा व स्वास्थ्य संस्थानों का संचालन कर गरीब बच्चों को शिक्षित तो कर ही रहा है,स्थानीय लोगों को बड़े स्तर पर रोजगार भी दे रहा है। इधर महाराष्ट्र के भोईरपाड़ा में शिरडी के ट्रस्ट ने सुजलान कंपनी के साथ गठबंधन करके बिजली उत्पादन के लिए पवनचक्कियों की एक पूरी श्रृंखला खड़ी कर दी है। इस परियोजना से प्रतिमाह लाखों यूनिट बिजली का उत्पादन हो रहा है। इस परियोजना में ट्रस्ट ने 15करोड़ की धनराशि का पूंजी निवेश किया था। बहरहाल यदि मंदिरों में जंग खा रही अटूट संपत्तिा को पेयजल, स्वास्थ्य, शिक्षा, जल संग्रहण व बिजली उत्पादन से जुड़े क्षेत्रों में लगाया जाता है तो यह राशि राष्ट्र निर्माण से जुड़ी बुनियादी समस्याओं के काम आएगी और आम आदमी की भगवान के प्रति आस्था भी मजबूत होगी।

 

? प्रमोद भार्गव