संस्करण: 25 जुलाई- 2011

देश में क्रांति लाने का शौक है, तो राजनैतिक नहीं हरित क्रांति लायें।,

? राजेन्द्र जोशी

               अपने राजनैतिक उद्देश्य की पूर्ति के लिए राजनैतिक पार्टियों, विशेषकर विपक्षी पार्टियों द्वारा क्रांति के नाम से अक्सर बखेड़ा खड़ा कर दिया जाता है। किसी भी विपक्षी दल को लगता है देश के चौतरफा विकास की लेश मात्र भी चिंता नहीं है। दिन रात सत्तारूढ़ पार्टियों की खिल्लियां उड़ाने, सरकार के जनकल्याण के कार्यक्रमों पर कुतर्क करने और अपनी सत्ता की भूख मिटाने के लिए आम जनता को भ्रमित कर उसे भावनात्मक रूप से भड़काने के सिवाय विपक्षी दलों के पास लगता है,कोई कार्यक्रम ही नहीं है। पूरे पूरे देश में राजनैतिक आंधियों के नकली बवंडर उठाये जा रहे हैं। विपक्षी दलों ने सत्ता के प्रति जन-जन में घृणा के भाव पैदा करने के हथकंडे अपनाने को ही प्राथमिकता मान लिया गया है।

               समाज सेवा के नाम पर जो कुछ भी नर्तन चलने लगा है वह चिंतनीय अफसोस जनक और अराष्ट्रीय होता जा रहा हैं। न तो कहीं मर्यादा ही सीमाएं नज़र आती हैं, न ही कतिपय राजनेताओं में कहीं कोई अनुशासन की झलक दिखाई देती है और न ही राजनैतिक शुचिता की चादर उजली बची है। प्रत्येक आत्मघोषित समाजसेवी अपने राजनैतिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए देश में क्रांति लाने का उद्धोष करते हुए सार्वजनिक मंचों पर पहुंच जाता है और अपना झंडा लेकर क्रांति के नाम पर अपना एजेंडा प्रस्तुत कर अपने आपको राष्ट्रभक्ति होने का दावा ठोंकता रहता है। ऐसे कतिपय नेतागण राजनीति, बस उसी को ही मानते है, जो वे कर रहे हैं। उनकी नज़र में सत्तारूढ़ दल में सभी भ्रष्टाचारी होते है, अनुभवहीन होते है और राष्ट्र के दुश्मन होते हैं। केवल वे ही भारतमाता की एकमात्र अकेली संतान है जिनमें राष्ट्रप्रेम है, देशहित में मर मिटने का संकल्प है, और सत्ता संचालन की काबलियत है। राजनीति में उतरे जिस नेता का राजनैतिक स्वार्थ पूरा नहीं होता और जो समझता है कि सत्ता पर काबिज होकर ही वह जनसेवा कर सकता है, ऐसा नेता वर्तमान सत्ता से दोष ही दोष देखता रहता है और उसके खिलाफ जनता को भड़काकर और भीड़ इकट्ठा कर अपने राजनैतिक स्वार्थों को भुनाता रहता है।

               राजनीति के पक्ष और विपक्ष दो पटिये होते हैं। दोनों पटियों पर देश का प्रजातंत्र बड़े ही सही ढंग से सीधा, सरपट दौड़ सकता है। किंतु विडम्बना है कि विपक्षी दल अपने प्रजातंत्रीय अधिकारों के विपरीत जाकर जिस तरह के आचरण पर उतारू हो जाते हैं उससे विश्व स्तर पर देश की परम्परागत रूप से जमी हुई सांस्कृतिक,आर्थिक और राजनैतिक साख को बट्टा लगता है।

               अब वह युग गया जब देश के महान नेताओं ने विदेशी हुकूमत के खिलाफ क्रांति का बिगुल बजाकर राष्ट्रीय अस्मिता का संरक्षण किया था। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान क्रांति शब्द का महत्व इसलिए था कि उस क्रांति के पीछे देश को गुलामी की बेड़ियों से मुक्त कराने का उद्देश्य था और भारत के नागरिकों के स्वाभिमान को जागृत कर उनमें स्वाभिमान, आत्मबल और आत्मनिर्भरता का जज्बा पैदा करके उन्हें अपने देश को आगे आ कर संचालित करने की जिम्मेदारी सौंपना था। क्रांतिकारियों ने त्याग, समर्पण और राष्ट्रप्रेम की भावना से क्रांति शब्द को मैदान में उतारा था। आज की विपक्ष की राजनीति ने क्रांति शब्द को अपना सहारा तो बना लिया किंतु, क्रांति करने के लिए जो चारित्रिक गुण, त्याग, समर्पण के जो भाव थे उन्हें छोड़ दिया। केवल क्रांति शब्द के नारे बना बनाकर जिस तरह की क्रांति को जमीन पर उतारा जा रहा है, उससे न तो कहीं पवित्र उद्देश्य, राष्ट्रप्रेम की भावना, त्याग और समर्पण की लेशमात्र भी झलक कहीं दिखाई देती है।

               क्रांति शब्द से कतिपय लोगों को अगर इतना ही 'शब्द लगाव' है तो उन्हें इस तरह की क्रांति का उद्धोष करना चाहिए जिसकी आज देश के विकास, खुशहाली और आर्थिक निर्भरता, के लिए परम आवश्यकता है। अभी हाल ही में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के स्थापना दिवस पर यह मुद्दा उठा कि देश के आर्थिक विकास और समृध्दता के लिए इस वक्त 'हरित क्रांति'की ज्यादा जरूरत है। प्रधानमंत्री का भी मानना है कि आनेवाले सालों में कृषि क्षेत्र के समक्ष कई चुनौहितयां होंगी और खाद्यन्न की बढ़ती मांग की पूर्ति करने के लिए हरित क्रांति लाना होगी। जब देश में पहली बार कृषि क्रांति का माहौल निर्मित हुआ था,तब जो उससे सफल और बेहतर परिणाम सामने आये उससे खाद्यन्न उत्पादन में कई गुना बढ़ौत्री हुई थी और देश आर्थिक विकास के मामले में विशेषकर कृषक भाइयों के हित में उन्हें आत्मनिर्भर बनने में कामयाब रहा। अब फिर विश्व में अपने आर्थिक दबदबे को बनाये रखने और किसान भाइयों, विशेष कर ग्रामीण क्षेत्रों के विकास के लिए और देश की आबादी की खाद्यान्न की पूर्ति की मांग पूरी करने के लिए कृषि उत्पादन में कम से कम दो प्रतिशत का इजाफा जरूरी है। मौजूदा कृषि वर्ष में प्राप्त आंकड़ों के अनुसार 24 करोड़ 10 लाख टन अनाज पैदा होने का अनुमान लगाया गया है, जबकि वर्ष 2020-21 तक अनाज की मांग 28 करोड़ टन तक पहुंच जायगी। देश के सामने वर्तमान में जो चुनौतियां है, उनमें महिलाओं और बच्चों के कुपोषण की समस्या भी है। प्रधानमंत्री ने इस मुद्दे को भी महत्वपूर्ण बताया कि खाद्य सुरक्षा अभियान सुनिश्चित हो और भुखमरी को मिटाया जाय। खाद्यन्न उत्पादन के आधुनिक तकनीकी ज्ञान की भी कृषि के क्षेत्र को बढ़ाने के लिए दूसरी हरित क्रांति को निहायत जरूरी बताया गया है। आज राजनीति करते हुए सिर्फ सत्ता हड़पने के लिए की जा रही क्रांतियों के बजाय आज देश में राजनैतिक क्रांति नहीं बल्कि हरित क्रांति से ही देश का चौतरफा विकास सुनिश्चित हो सकेगा।


? राजेन्द्र जोशी