संस्करण: 25 जुलाई- 2011

नेहरू परिवार के विरूध्द विषवमन करते नहीं

थकता संघ परिवार

? एल.एस.हरदेनिया

               राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के दो मुखपत्र हैं। एक है हिन्दी ''पांचजन्य'' और दूसरा अंग्रेजी का ''आर्गनाइजर''। दोनों प्रति सप्ताह प्रकाशित होते है। संघ की जानी मानी नीति के अनुसार,ऐसा कोई सप्ताह नहीं गुजरता जब इन दोनों साप्ताहिकों में नेहरू परिवार के बारे में बेबुनियाद बातें न छपें और उसे हर  प्रकार से बदनाम न किया जाए।

               उदाहरणार्थ, दोनों साप्ताहिकों के 17 जुलाई के अंक में जवाहरलाल नेहरू, सोनिया गाँधी और राहुल गाँधी के विरूध्द विषवमन किया गया है। पांचजन्य के अंक को ही लें। उसमें छपे एक लेख का शीर्षक है ''क्या माँ-बेटा पार्टी ही कांग्रेस है। निस्काम निर्मोही पटेल सत्ता कामी-वशंवादी नेहरू''।   

               लेख में पटेल और नेहरू के बारे में ऐसा लिखा गया है मानों वे एक दूसरे के दुश्मन थे। नेहरूजी के बारे में बहुत ही घटिया दर्जे की भाषा का उपयोग किया गया है। लेख में लिखा गया है, ''एक धनी, अंग्रेजीदां, शहरी परिवार में जन्मे नेहरू, प्रारंभ से ही अपने स्थान के प्रति जागरूक दिखते हैं। पिछले कुछ वर्षों में प्रकाशित ''सिलेक्टेड़ वक्र्स ऑफ नेहरू'' की प्रथम श्रृंखला को देखकर स्पष्ट होता है कि सन् 1903 में 14 वर्ष की आयु से ही उन्होंने अपने सब पत्रों की नकल संभालकर रखना शुरू कर दिया था। गाँधीजी के प्रति उनकी भावनाओं का विश्लेषण करने पर स्पष्ट हो जाता है कि अपनी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा की पूर्ति की एक सीढी के रूप में ही उन्होंने गाँधीजी का इस्तेमाल किया। गाँधीजी के साथ उनके पत्राचार, उनकी आत्मकथा, और ''डिस्कवरी ऑफ इंडिया'' जैसी रचनाओं को पढ़ने से स्पष्ट हो जाता है कि उन्हें गाँधीजी का जीवनदर्शन, उनके आर्थिक और सामाजिक विचार  कदापि स्वीकार्य नहीं थे। उन्होंने बार-बार कहा कि मेरा मस्तिष्क गाँधी से बगावत करना चाहता है पर गाँधी से टक्कर लेने की ताकत मेरे पास नहीं है और गाँधी के बिना देश का आज़ाद होना संभव नहीं है, जबकि मैं अपने सपनों का भारत आज़ादी के बाद बना सकता हँ।''

               ''नेहरू की समाजवाद में आस्था भी सतही थी। सुभाष के एक प्रश्न का उत्तर देते हुए एक स्थान पर नेहरू लिखते है ''मैं बौध्दिक धरातल पर समाजवादी हँ, किन्तु मैं प्रवृत्ति से व्यक्तिवादी हॅँ।'' लेख में यह भी दावा किया गया है कि सरदार पटेल, निष्काम कर्मयोगी थे, तो नेहरू बौध्दिकता-प्रधान वाकशूर थे। ''नेहरू की पूरी महानता उनके लेखक और नाटकों तक सीमित है''। पूरे एक में पेज में छपे इस लेख में नेहरूजी की घोर निंदा की गई है। इसी तरह, सोनिया गाँधी के बारे में अत्यधिक भडकाऊ भाषा में एक लेख है। लेख में सोनिया गाँधी की अध्यक्षता वाली राष्ट्रीय सलाहकार परिषद की तीव्र शब्दों में निंदा की गई है। लेख का शीर्षक है ''सोनिया सलाहकार परिषद ने लगाया संसदीय लोकतंत्र पर ग्रहण''। लेख में आगे लिखा गया है ''द्वैत शासन,भारतीय जनतंत्र पर एक ग्रहण के समान है। यह प्रश्न कांग्रेस,संप्रग या मनमोहन सिंह तक सीमित न होकर पूरे जनतांत्रिक समाज और व्यवस्था को उद्वेलित कर रहा है। राष्ट्रीय सलाहकार परिषद,सरकार की नाकामयाबी सिध्द कर सोनिया गाँधी की अलग छवि पेश करने में लगी है। अधिनायकवाद इसी प्रकार से संसदीय जनतंत्र को निगलता है। समय आ गया है जब संसद से सड़क तक राष्ट्रीय सलाहकार परिषद पर सवाल खड़ा किए जाएं''।

               आखिर संघ, सलाहकार परिषद से क्यों नाराज है? शायद इसलिए कि परिषद में ऐसे लोग शामिल हैं जो गरीबों के हित में चिंतन करते हैं, जो देश से भुखमरी कैसे समाप्त की जाए, उसकी योजना बनाते है, जो एक ऐसे विधेयक का प्रारूप तैयार करते हैं जिससे सांप्रदायिक दंगो पर बेहतर नियंत्रण हो सकेगा। यदि ऐसा होता है तो अल्पसंख्यक कांग्रेस को अपना हितैषी समझेंगे। परिषद द्वारा सुझायी गई नीतियों पर यदि ईमानदारी से अमल होता है तो इससे कांग्रेस के वोट बैंक में इजाफा हो सकता है। शायद यही संघ परिवार की सबसे बड़ी चिंता है, जो हर हालत में भारत को हिन्दू राष्ट्र बनाना चाहता है।

               एक और लेख में, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ व विश्वहिन्दू परिषद को सलाह दी गई है कि वे हिन्दू राष्ट्र के निर्माण का उत्तरदायित्व स्वयं ले। लेख में कहा गया है कि भारतीय जनता पार्टी के नेताओं से इसकी अपेक्षा नहीं की जा सकती है क्योंकि वे भ्रष्ट हो गये हैं, अय्याशी का जीवन बिता रहे हैं, सत्ता का दोहन कर सुख-सुविधा की जिन्दगी जी रहे हैं।

               अंग्रेजी साप्ताहिक आर्गनाईजर में प्रकाशित लेख में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का आव्हान किया गया है कि वह भारतीय जनता पार्टी के नेताओं को सादगी से जीवनयापन करने का परामर्श दे। जो सुविधायें भाजपा के नेताओं को प्राप्त हैं उनसे वे भ्रष्ट हो गए हैं। इससे भाजपा की लोकप्रियता में भी कमी आई है एवं जनता में भाजपा की छवि  धूमिल हुई है। पहले भाजपा और अन्य पार्टियों में जो अंतर होता था अब वह समाप्त हो गया है। अब भाजपा के लोग भी स्वयं के निहित स्वार्थों की पूर्ति में लगे रहते हैं। संघ को चाहिए कि वह भाजपा के सांसदों और विधायकों को अपनी जीवनशैली बदलने का परामर्श दे। इसके साथ ही अब समय आ गया है जब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और विश्व हिन्दू परिषद,सीधे राजनीति में दिलचस्पी लें। यदि वे ऐसा करते हैं तब ही संघ का भारत को हिन्दू राष्ट्र बनाने का सपना पूरा होगा।

               इस समय संघ परिवार, विशेषकर, भारतीय जनता पार्टी, राहुल गाँधी से बहुत खफा है। खफा होने का मुख्य कारण है राहुल गाँधी का आम जनता के साथ सीधे संबंध बनाने का प्रयास। वर्षो पहले जब जवाहर लाल नेहरू, लंदन से अपनी पढ़ाई करके वापिस आये थे तब उन्होंने भी उत्तरप्रदेश का दौरा किया था। नेहरूजी साइकिल से उत्तरप्रदेश के विभिन्न क्षेत्रों में गए थे और लोगों की समस्याओं से रूबरू हुए थे। लगभग यही राहुल गाँधी कर रहे हैं। आज भी कितने नेता जनता,विशेषकर ग्रामीण जनता के बीच जाते हैं?राहुल के इस जनसंपर्क अभियान को पांचजन्य ने ''राजनैतिक प्रपंच'' बताया है। इसी शीर्षक से लिखे संपादकीय में कहा गया है ''सोनिया पार्टी अपने ''युवराज'' राहुल गाँधी का राजनीतिक कद बड़ा करने के लिए कितनी कुशलता से मीड़िया प्रबंधन कर रही है, इन दिनों उनकी पदयात्रा को लेकर दिखाई जा रही मीड़िया की ''दरियादिली'' इसका प्रमाण है। कितने प्रायोजित रूप से राहुल गाँधी के चलने-फिरने खाने-पीने और ठहरने, सोने की खबरें प्रकाशित की जा रही है ताकि एक जननेता, विशेषकर किसान नेता के रूप में ''युवराज'' को प्रक्षेपित किया सके। दस जनपथ के कारिंदे तो पिछले दिनों राहुल गाँधी के जन्म दिवस को किसान दिवस के रूप में मना चुके हैं। भारतीय राजनीति का इससे बड़ा दुर्भाग्य और क्या होगा कि जिस नौजवान का देश की परंपरा, संस्कृति और जीवन प्रवाह से कोई जुडाव न हो तथा खेती-किसानी से जिसका दूर का भी संबधा न हो, उसे किसान नेता के रूप में प्रायोजित किया जाए। इस वंशवाद की स्तुति में लगा सेक्यूलर मीडिया भी इस सच्चाई की अनदेखी का, इस तमाशे का हिस्सा बन रहा है, यह बेहद आश्चर्यजनक हैं। इस तरह, संघ के अखबारों ने नेहरू परिवार के प्रति जमकर जहर उगला है।


? एल.एस.हरदेनिया