संस्करण: 25 जुलाई- 2011

इंडिया अगेंस्ट करप्पशन अभियान

अरविन्द केजरीवाल भ्रम में हैं या भ्रमित कर रहे हैं ?

                                             

? वीरेन्द्र जैन

               इण्डिया अगेंस्ट करप्पशन के मास्टर माइंड अरविन्द केजरीवाल गत दिनों अपने अभियान के अंतर्गत भोपाल में भी आये थे और उन्होंने एक प्रैस कांफ्रेंस के साथ प्रदेश के विभिन्न जिलों से आये स्वयंसेवियों से विमर्श करने के साथ साथ नगर के कुछ प्रबुध्दजनों को सम्बोधित करते हुए उनके साथ विचारों का आदान प्रदान किया था। वे एक ऊर्जावान युवा हैं और उन्होंने सूचना का अधिकार के पक्ष में वातावरण तैयार करके देश की जनता को यह महत्वपूर्ण अधिकार दिलवाने में अरुणा राय के साथ सक्रिय नेतृत्व प्रदान किया है। आई आई टी संस्थान खड़गपुर से मैकिनिकल इंजीनियरिंग की डिग्री लेकर निकले अरविन्द केजरीवाल ने कुछ वर्षों तक आयकर विभाग को अपनी सेवाएं दीं जहाँ से आयकर कमिश्नर के पद से स्वैच्छिक रूप से मुक्ति लेकर उन्होंने प्रशासन को स्वच्छ करने के लिए विभिन्न अभियान चलाने का फैसला किया। इसमें कोई सन्देह नहीं है कि सूचना के अधिकार ने देश में लोकतंत्र की जड़ों को मजबूती दी है,तथा बेलगाम प्रशासन की स्वेच्छाचारिता पर अंकुश लगा सकने वाला हथियार दिलाया है। उनके इस महत्वपूर्ण काम के लिए भले ही भारतीय मानस ने अपने स्वभाव के अनुसार उनके प्रति हार्दिक कृतज्ञता ही महसूस की हो किंतु मुखर रूप से अमेरिका से दिया जाने वाला फिलीपींस का 25 लाख रुपयों का मेग्सेसे पुरस्कार उन्हें मिला। पुरस्कार की इस राशि से उन्होंने सूचना के अधिकार के अंतर्गत महत्वपूर्ण कार्य करने वाले लोगों के लिए प्रतिवर्ष सम्मान देने का फैसला किया है।     इंडिया अगेंस्ट करप्शन अभियान, जिसके नेता अन्ना हजारे माने जाते हैं, केवल एक मुखौटा भर हैं। असल में इस अभियान के मुख्य कर्ताधर्ता श्री अरविन्द केजरीवाल ही हैं। अन्ना हजारे एक सीधे सरल चौथी कक्षा पास,सेना में ड्राइवर के रूप में सेवाएं देकर सेवा निवृत्ति लेने वाले भूतपूर्व सैनिक हैं,किंतु उन्होंने अपने गाँव में कृषि के विकास में और महाराष्ट्र राज्य में भ्रष्टाचार आदि के विरुध्द जो अभियान चलाया वह मील का पत्थर बना। उनके कारण राज्य के चार आरोपी मंत्रियों को पद छोड़ने के लिए विवश होना पड़ा। केजरीवाल ने इस अभियान में उन्हें आगे रखने का काम किया किंतु अभियान के विचार और कार्यक्रम के सारे सूत्र श्री केजरीवाल के हाथ में ही हैं। जहाँ एक ओर उनकी टीम के अन्ना हजारे, प्रशांत भूषण, सुशांत भूषण समेत किरन बेदी पर भी उनके कार्यकाल के काल से जड़े कार्यों पर छींटे उछाले गये वहीं श्री केजरीवाल पर कोई उंगली नहीं उठी। अपने भोपाल प्रवास के दौरान उन्होंने इंडिया अगेंस्ट करप्शन अभियान के अगले कार्यक्रम की जो रूप रेखा स्पष्ट की उससे ऐसा लगता है कि या तो वे स्वयं भ्रम में हैं अथवा वे भ्रष्टाचार के विरुध्द उठी तीव्र जनाकांक्षा को भ्रमित कर रहे हैं।

               अपने घोषित कार्यक्रम के अनुसार यदि सरकार आगामी सत्र में उनके द्वारा वांछित लोकपाल बिल सदन के पटल पर नहीं रखती है तो वे आगामी 16अगस्त से अन्ना ह्जारे को आमरण अनशन पर बैठा देंगे। सरकारी लोकपाल बिल और जनलोकपाल बिल के बीच उभरे बिन्दु सामने आ चुके हैं जिसमें जन लोकपाल बिल के प्रावधान ऐसे हैं जो बहुत ज्यादा ही आदर्श हैं और बिना पूरी व्यवस्था बदले उनका लागू हो पाना सम्भव नहीं होगा। श्री केजरीवाल स्वयं ही कहते हैं कि जनलोकपाल बिल को पास करने के बाद संसद के लोग अपने पैर पर ही कुल्हाड़ी मारेंगे इसलिए वे इसे कभी पास नहीं करेंगे। अर्थात टकराव अवश्म्भावी है। इसके साथ उनका आवाहन है कि पूरे देश के लोग एक सप्ताह का कार्य अवकाश ले सड़कों पर तिरंगा झंडा और भारत माता की जय के नारे के साथ सड़कों पर निकलें, भले ही सरकार धारा 144 लगा कर ऐसा करने से रोके। इस अभियान के लिए उन्होंने देश, प्रदेश, जिला और तहसील स्तर पर किसी भी समिति के गठन से इंकार किया। उनका कहना था कि इस अभियान में सम्मलित लोग व्यक्तिगत स्तर पर ही आगे आयें और अहिंसक रहकर स्वयं ही यह तय करें कि उन्हें किसके खिलाफ, कहाँ और कैसा आन्दोलन करना है। अर्थात नगर निगम का एक बाबू ट्रांस्पोर्ट कार्यालय के बाबू के भ्रष्टाचार के खिलाफ सड़क पर उतर सकता है तो ट्रांस्पोर्ट कार्यालय का बाबू नगर निगम के बाबू के खिलाफ भ्रष्टाचार पर उतर सकता है। इस अभियान से राजनीतिक दलों को दूर रखा गया है,इसलिए तय है कि राजनीतिक दलों के सक्रिय कार्यकर्ता भी उनके इस अभियान में साथ नहीं आयेंगे। इस अभियान में कर्मचारी यूनियनों छात्र यूनियनों,व ट्रेड यूनियनों को भी सम्मलित होने का आवाहन नहीं किया गया है। कुल मिला कर इस अभियान में संगठन के तौर पर केवल एनजीओ गैर सरकारी संगठन,को ही सम्मलित करने का फैसला किया गया है जिनके बारे में मान्यता है कि उनमें से नब्बे प्रतिशत केवल कागजी संस्थाएं हैं वे अपने प्रोजेक्ट्स का पचहत्तर प्रतिशत केवल वेतन और यात्रा भत्तों में ही खर्च करती हैं। उनके द्वारा किये बताये गये काम दृष्य में नजर नहीं आते। ध्यान देने योग्य बात यह है कि सरकारी लोकपाल बिल में इन एनजीओ को लोकपाल के दायरे में लाने का प्रस्ताव है जबकि जनलोकपाल बिल के प्रस्ताव में इन एनजीओ को लोकपाल के अंतर्गत लाने का विरोध किया गया है।

               यद्यपि यह सच है कि जनता का एक बड़ा हिस्सा भ्रष्टाचार की समाप्ति चाहता है वहीं यह भी सच है कि आबादी का एक बड़ा हिस्सा उसको इस तरह से स्वीकार कर चुका है कि उसने भ्रष्टाचारियों से नफरत करना छोड़ दिया है। इतना ही नहीं इनमें से बहुत सारे लोग कहीं न कहीं उसमें सम्मलित होने लगे हैं। यदि टैक्सचोर दुकानदार कहता है कि बिल लेने पर इतने पैसे अधिक लगेंगे तो अधिकांश लोग कहते हैं कि बिल की कोई जरूरत नहीं। ऐसा ही सरकारी कामों में विलम्ब और दुर्वयवहार से बचने के लिए रिश्व्वत देकर करने लगे हैं। अब भ्रष्टाचार की समाप्ति एक ठंडी सी जनाकांक्षा भर है, ऐसे में बिना राजनीतिक दलों, ट्रेड यूनियनों, छात्र संगठनों के सहयोग के स्वार्थी तत्वों द्वारा चलाये जा रहे गैर सरकारी संगठनों के सहारे इस अभियान को कैसे सफलता मिलेगी। बिडम्बना यह है भोपाल में एनजीओ चलाने वाले समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय पदाधिकारी श्री केजरीवाल के मंच का संचालन कर रहे थे जिनका दबे स्वरों में कहना था कि उन्होंने अपनी पार्टी को बता दिया है कि वे इस आन्दोलन के साथ हैं, पर उन्होंने पार्टी छोड़ देने के सवाल का पत्रकारों को कोई उत्तर नहीं दिया। उसी मंच पर भोपाल गैस आन्दोलन से अति सम्पन्न हुये एक गैर सरकारी संगठन चलाने वाले विवादास्पद सामाजिक कार्यकर्ता भी उपस्थित थे। ये उपस्तिथियां पूरे अभियान का मजाक बना रही थीं।  यदि फिर भी 16 अगस्त के उनके जन अभियान को वांक्षित सफलता मिल जाती है और एक सप्ताह के अवकाश के कारण पूरे देश का सारा कामकाज ठप्प हो जाता है तो उससे देश की व्यवस्था में जो एक शून्य पैदा होगा उसे कौन भरेगा? उसकी रीति नीतियां क्या कैसी होंगीं? यदि यूपीए की सरकार का पतन हो जाता है तो क्या स्वाभिक रूप से दूसरा सबसे बड़ा गठबन्धन एनडीए अर्थात आरएसएस नियंत्रित संगठन उसकी जगह आने की कोशिश नहीं करेगा, जो भ्रष्टाचार समेत हर रीति नीति में यूपीए का प्रतियोगी है। क्या केजरीवालजी यही चाहते हैं? यदि नहीं चाहते तो लगता है कि या तो उनका कोई छुपा एजेंडा है या वे स्वयं ही भ्रम में हैं।


? वीरेन्द्र जैन