संस्करण: 25 जुलाई-2011

 

फयाज़ उस्मानी पर मत रो

कौन है वे लोग जो दो पड़ोसी मुल्कों के बीच अमन की पटरी को उखाड़ना चाहते हैं ?

? सुभाष गाताड़े

हम कैसे गुनहगार हैं, उनसे न पूछिए

वे अदालतों के पार हैं, उनसे न पूछिए

ये जुल्म ओ सितम उनके, और ये अपनी बेकसी

जो मौत के फनकार हैं, उनसे न पूछिए

-गोरख पाण्डेय

               37 साल के फयाज उस्मानी का 'कसूर' महज इतना ही था कि वह उस शख्स का बड़ा भाई था, जिसे पिछले तीन साल से अहमदाबाद बम धमाके में संलिप्तत के नाम पर जेल में ठूंसा गया है। फिलवक्त हम इस बहस में भी नहीं जाएंगे कि उसका छोटा भाई वास्तविक दोषी था या नहीं,मगर अगर कानून का राज कहा जाता है तो यह कैसे मुमकिन हुआ कि घर से स्वस्थ्य थाने पहुंचा फयाज़ चन्द घण्टों के अन्दर ही अस्पताल पहुंचा दिया गया जहां उसकी मौत हुई।

               लाजिम है कि समूचे मुल्क में हिरासत में मौत के मामले में अव्वल कही जानेवाली महाराष्ट्र पुलिस के नुमाइन्दे अभी इसी कवायद में लगे हुए हैं कि उसकी मौत को स्वाभाविक घोषित किया जाए,जिसके लिए रातोंरात तैयार की गयी उसकी मेडिकल हिस्टरी भी अख़बारों को सौंपी जा चुकी है। वैसे सूबाई पुलिस का अपना रेकार्ड देखें तो पता चलता है कि वह बन्दियों के साथ कितने जालिमाना ढंग से पेश आती है। नेशनल क्राइम रेकार्डस ब्यूरो की ताजा रिपोर्ट बताती है कि पिछले साल देश भर में पुलिस हिरासत या लॉक अप में बन्दियों की मौत की आधिकारिक तौर पर जो 59 घटनाएं दर्ज की गयीं उनमें से 18 अकेले महाराष्ट्र से थीं, नौ मध्य प्रदेश तो 6 उत्तर प्रदेश से थी। (महा रेकार्डस हायेस्ट नम्बर आफ कस्टोडियल डेथ्स, टाईम्स आफ इण्डिया, 18 जुलाई 2011)

               मुंबई बम धमाके की जांच के नाम पर - जिसमें 21 निरपराध लोग मारे गए और एक सौ से अधिक जख्मी हुए -पुलिस महकमे का कहर किस तरह समुदाय विशेष के लोगों पर बरपा हो रहा है,फयाज की अस्वाभाविक मौत इसकी महज एक बानगी है। हम अन्दाजा ही लगा सकते हैं कि गृहमंत्री पी चिदम्बरम के बयानों के विपरीत - जिसमें उन्होंने मुल्क के सभी दुश्मनों को इन बम धमाकों के लिए जिम्मेदार ठहराया था,जिसमें किसी समुदाय विशेष या उसके संगठन निशाने पर नहीं थे - अब जबकि सूबा महाराष्ट्र की एण्टी टेररिस्ट स्क्वाड की टीमें देश के अलग अलग हिस्सों से कुख्यात जिहादी संगठनों के सदस्य होने के नाम पर संदिग्धों के यहां छापेमारी कर रही हैं तब कितने बड़े पैमाने पर यह सिलसिला तारी होगा। कितने बड़े स्तर पर निरपराध युवाओं की गिरफ्तारियां हो रही होंगी जिनके बारे में यह 'सबूत' बटोरा गया होगा कि वह घटना के वक्त इलाके में ही कहीं थे !

               21 वीं सदी की पहली दहाई से तेज हुए इस सिलसिले को हम बार बार देख चुके हैं । एक तरफ देश के विभिन्न हिस्सों में आततायी संगठनों द्वारा किए गए हमले सूर्खियां बने हैं -उसी की उपकथा के तौर पर हम सभी इसी तरह निरपराधों के पकड़े जाने, समुदाय विशेष से सम्बध्द होने के नाते अनावश्यक निशाना बनाये जाने जैसी तमाम घटनाओं से परिचित हो चले हैं। अभी ज्यादा दिन नहीं हुआ जब दिल्ली में विभिन्न नागरिक संगठनों की पहल पर एक सुनवाई का आयोजन हुआ था, जिसमें देश भर से आए सैंकड़ों भुक्तभोगी या उनके परिवारजन शामिल थे। उनकी आपबीती पर केन्द्रित एक विस्तृत रिपोर्ट का भी उस वक्त प्रकाशन हुआ था।

               वैसे अब जबकि पूरी दुनिया के सामने है कि आतंकी घटनाओं में जिहादी संगठन ही नहीं बल्कि हिन्दुत्व के संगठन भी शामिल रहते आए हैं, जिसके लिए उन्होंने फौज तक में घुसपैठ की है, तब यह बात समझ से परे जान पड़ती है कि पुलिस के रडार पर फट से अल्पसंख्यक समुदाय के युवाओं के चेहरे या इस्लामिक आतंकवाद में संलिप्त संगठनों के नाम ही क्यों आते हैं ?सबकुछ इतना सुनियोजित ढंग से चलता है कि आप देखते ही रह जाते हैं। संविधान में भले ही हम लोगों ने कसमें खायी हों कि किसी के साथ भी जाति, धर्म, लिंग, नस्ल आदि के नाम पर भेदभाव नहीं किया जाएगा मगर जब ऐसी कोई मानव निर्मित आपदा सामने आती है, सबसे पहले इसी सिध्दान्त को भुला दिया जाता है।

               चाहे मालेगांव 2006 का बम धमाका हो या बम्बई की 2007 की लोकल ट्रेनों में बम विस्फोटों की घटना हो, 2007 में ही अंजाम दिए गए अजमेर शरीफ या मक्का मस्जिद के बम धमाके हों, जयपुर के बम धमाके हों या इक्कीसवीं सदी की पहली दहाई की शुरूआत में सामने आया घाटकोपर बम धमाका हो। आप नाम लें और इन विभिन्न घटनाओं के साथ जांच के नाम पर प्रताडित किए गए सैकड़ों युवाओं या उनके हजारों आप्तजनों के किस्से नमूदार होते हैं।

               घाटकोपर बम धमाके (दिसम्बर 2002) को ही देखें जब पुलिस ने आप्रवासी भारतीय एवं पेशे से इंजिनीयर ख्वाजा यूनूस के अलावा तमाम लोगों को पकड़ा था, मगर तीन साल के अन्दर सभी अभियुक्त बेदाग बरी हो गए थे। मालूम हो कि ख्वाजा यूनूस को इस कदर प्रताडित किया गया था कि पुलिस हिरासत में ही उसकी मौत हुई,जिसे स्वाभाविक मौत साबित करने की पुलिस ने कोशिश की थी। यह अलग बात है कि ख्वाजा यूनूस की मां आसियाबी ने हार नहीं मानी और अन्तत: दोषी पुलिसकर्मियों पर मुकदमा कायम हुआ तथा कइयों की गिरतारी भी हुई।

               जुलाई 2006 में सामने आए बम्बई ट्रेन धमाकों के बाद भी अल्पसंख्यक समुदाय की बस्तियों को निशाना बनाने का,लोगों को अवैध ढंग से हिरासत में लेने का सिलसिला तभी रूक सका था जब महाराष्ट्र से एक प्रतिनिधिमण्डल जाकर प्रधानमंत्री एवं सुश्री सोनिया गांधी से मिला था। मालेगांव 2006 के बम धमाके को याद करें जब इसी तरह बम धमाकों में चालीस से अधिक निरपराध अल्पसंख्यक मारे गए थे और तमाम सबूतों को दरकिनार करते हुए आतंकवाद विरोधी दस्ते ने तमाम अल्पसंख्यकों को ही गिरफ्तार कर उनके खिलाफ आरोपपत्र दाखिल किया। संघ परिवार से सम्बध्द असीमानन्द की गिरफ्तारी एवं उसके कबूलनामे के बाद ही घटना का वास्तविक आयाम सामने आया था, जब मालूम चला था कि इस काण्ड को ही संघी गिरोह से सम्बध्द आतंकियों ने अंजाम दिया है।

               कोई यह पूछ सकता है कि क्या आप दोषियों को बचाना चाहते हैं ? निश्चित ही नहीं। हमारी यही इल्तिजा है कि मुल्क में कानून का राज चले जिसके सामने किसी खास समुदाय का होना या न होना कोई मुद्दा न हो। दोषी चाहे जिस भी कौम, जाति का हो, वह अपने किए की सज़ा अवश्य पाए।

               इस बात को मद्देनज़र रखते हुए कि आतंकी हमले के बाद पुलिस महकमे पर पक्ष-विपक्ष दोनों ही तरफ से नतीजे दिखाने का दबाव रहता है,इसलिए फिलवक्त इस बात की उम्मीद न के बराबर है कि वह सोशल प्रोफाइलिंग अर्थात समुदाय विशेष को निशाने पर रखने से बाज आएगी,जांच के मामले में सभी विकल्पों को खुला रखेगी या अलसुबह मानवाधिकारों पर सख्ती से अमल करना शुरू करेगी। विडम्बना यही कही जाएगी कि इक्कादुक्का नेताओं को छोड़ दें तो मुख्यधारा के किसी भी नेता की तरफ से ऐसी मांग नहीं की जा रही है।

               अगर हम अपने स्तर पर इस बात को समझने की कोशिश करें कि बम धमाके को किस संगठन ने अंजाम दिया होगा तो एक बात स्पष्ट है कि ऐसे किसी समूह ने इसे अंजाम दिया है जो भारत पाकिस्तान की प्रस्तावित शान्ति वार्ता के दूसरे चरण में खलल पैदा करना चाहता है। समझौता एक्सप्रेस बम धमाके (2007) के अनुभव को हमें नहीं भूलना चाहिए जिसे उसी वक्त अंजाम दिया गया था जब पाकिस्तानी विदेश सचिव भारत यात्रा पर आनेवाले थे।

               बम्बई बम धमाके के बाद पाकिस्तानी दक्षिणपंथ की प्रतिक्रिया को देखें या भारत के दक्षिणपंथी विचारकों को पढ़े तो यह बात स्पष्ट होती है। उदाहरण के लिए सुब्रहमण्यम स्वामी के डीएनए में प्रकाशित लेख में (डीएनए 16 जुलाई 2011) 'हिन्दुओं को एक होकर उग्र प्रतिक्रिया करने का आवाहन करते हैं।' या मेघनाद देसाई (इण्डियन एक्सप्रेस, 17 जुलाई) में प्रकाशित लेख में लिखते हैं ''हमें यह पहले ही पता होना चाहिए था कि जिस दिन अमेरिकी सुरक्षा बलों ने लादेन को मार गिराया उसके बाद ऐसी घटना कभीभी हो सकती है। आई एस आई की मदद से अल कायदा और लश्कर ए तोइबा अमेरिकियों का बदला हम पर आसानी से निकाल सकता है।' लिबरल कहे जानेवाले देसाई का राजयह लेख वार्ताओं के सिलसिले को निरर्थक घोषित करता है।

               कुल मिलाकर दोनों किस्म के दक्षिणपंथियों का यही सपना है कि वार्ताओं से कुछ हासिल नहीं होनेवाला है और 'चिरवैरियों' का खातमा जरूरी है। इस बार गनीमत यही समझी जाएगी कि कमसे कम दोनों सरकारों की तरफ से ऐसे एकांगी किस्म के बयान नहीं आए। ऐसा प्रतीत होता है कि कमसे कम दोनों हुकूमतें इस बार शान्ति वार्ता को आगे बढ़ाना चाहती हैं। यहां तक कि विदेश सचिव सुश्री निरूपमा राव ने यहां तक कहां कि 26/11 के बाद पाकिस्तान के साथ वार्ताओं का जो सिलसिला रोक दिया गया था, वह एक भूल थी।

                इस पूरी आपाधापी में यह बात सुकून देनेवाली कही जा सकती है कि भारत एवं पाकिस्तान की अवाम जंग नहीं अमन चाहती है, यह अलग बात है कि इस मौन बहुमत को अपनी बात रखने के उचित मंच उपलब्ध नहीं हैं। वे सभी जिन्होंने बम धमाके के बाद राजघाट,दिल्ली स्थित महात्मा गांधी की समाधि पर पाकिस्तानी एवं भारतीय नागरिकों के साझा आयोजन को देखा हो वह बता सकता है कि अमन का यह जज्बा जंगखोरों को एक न दिन शिकस्त अवश्य देगा।

               इस सन्दर्भ में बरबस हम इण्डियन एक्स्प्रेस में प्रकाशित (22 फरवरी 2007) लाहौर के एक अधयापक जनाब फुरूख खान का लेख बेहद समीचीन जान पड़ सकता है जो बताता है कि किस तरह 'एक नया रास्ता खुलता है जब एक व्यक्ति सरहद के इस पार से उस पार जाता है' और किस तरह 'इस छोटीसी प्रतीकात्मक कार्रवाई से हम आबादी के अच्छे खासे हिस्से में बैठे डरों एवं घृणा को चुनौती दे सकते हैं'। अपने लेख का अन्त करते हुए उन्होंने लिखा था 'कई किस्म की गतिविधियों में शामिल होकर नैतिक बहुमत को अपनी उपस्थिति को दर्ज करना होगा ताकि अल्पमत के लिए यह अधिकाधिक मुश्किल होता जाए कि वह सरहद के दोनों पार फैले लोगों के बीच आपसी सदभाव की भावना को खतम कर सकता है। अगली बार जब कोई दिल्ली से लाहौर के लिए निकले तब उसका स्वागत लाहौरी की खातिरदारी से हो न कि खूनी धुएं या भयानक हमले से हो।' 

? सुभाष गाताड़े