संस्करण: 25फरवरी-2008

 गांवों से आती सुखद बयार
   महेश बाग़ी

   विवाह सामाजिक परंपरा का एक अनिवार्य अंग हैं। लेकिन इस परंपरा पर आज भौतिकता हावी हो गई हैं। जिस वैवाहिक संस्कार पर समाज टिका है, अगर वही संस्कार समाज का अहित करने लगें तो क्या यह ज़रूरी नहीं है कि समाज इस पर विचार करे और ऐसा बदलाव लाए कि समाज और देश का भला हो। दिल्ली तथा पंजाब के सौ से अधिक गांव वालों ने इस दिशा में एक अनुकरणीय पहल की है। इन गांवों के ग्रामीणों ने यह फ़ैसला किया है कि अब तमाम शादियां दिन में ही होगी। यहाँ तक कि प्रोसेशन (वन निकासी) भी दिन के उजाले में ही आयोजित की जाएंगी। यह फ़ैसला बिजली संकट के मद्देनज़र लिया गया है। कहने की ज़रूरत नहीं कि बिजली संकट का सामना ग्रामीण् को ही अधिक करना पड़ता है। बिज़ली के अभाव में खेतों में सिंचाई नहीं हो पाती है और अपनी दिन-रात की मेहनत को मुरझाता देख कर किसान हताश हो जाता है। कहने को यह किसानों की समस्या है, पर वास्तव में इसका सरोकार हर भारतवासी से है। मान लो कि अगर किसानों ने खेती करना बंद कर दिया तो हम क्या खाएंगे ? जिस मेक्सिकन गेहूं को देख कर हम नाक-भौं सिकोड़ लेते हैं, क्या उसी पर निर्भर रह जाएंगे ? अगर वह गेहूं भी नहीं मिला तो क्या हवा-पानी खाकर ज़िंदा रहेंगे ?

किसानों को खाद-बीज़ के साथ-साथ पर्याप्त बिजली भी मिलती रहे, यह हम सबकी चिंता होना चाहिए। दिल्ली और पंजाब के ग्रामीणों ने बिजली की बचत करने के लिए दिन में शादी समारोह आयोजित करने का जो फ़ैसला किया है, उससे शहरी लोगों को सबक हासिल करने की ज़रूरत है। कहने को हम शहरी खुद को अधिक सभ्य, सुसंस्कृत और प्रगतिशील मानते हैं, लेकिन व्यवहार में अपढ़-गंवार कहे जाने वाले ग्रामीणों से भी बदतर आचरण् करते हैं। हमारे विवाह समारोह फ़िजूल के दिखावे के ऐसे उदाहरण है, जिन पर गर्व नहीं, बल्कि शर्म करना चाहिए। भारतीय संस्कृति की पताका विश्वभर में फहराने वाले स्वामी विवेकानंद ने कहा था कि अगर धारती पर एक भी व्यक्ति भूखा सोता है तो इसकी ज़िम्मेदारी हम सब पर है।हम अपनी संस्कृति पर गर्व करते नहीं अघाते,लेकिन उसके अनुरूप आचरण करने में अपनी हेठी समझते हैं। 'वसुधौव कुटुम्बकम्' का उद्धोष करते हुए हम अपनों को श्रेष्ठ समझते हैं, लेकिन अपने पड़ोस या मोहल्ले में किसी पीड़ित व्यक्ति का दर्द बांटने में पीछे हट जाते हैं। यह कैसी मानवता है ?

इसलिए अगर दिल्ली-पंजाब के ग्रामीण अगर दिन में शादी करने का फ़ैसला करते हैं तो शहरी लोगों को भी आगे आकर इसी तरह की घोषणा करना चाहिए। जब बिजली की समस्या का सरोकार हम सबसे है तो हम भी बिजली  बचाने की समस्या का सरोकार हम सबसे है तो हम भी बिजली बचाने की इस अनूठी पहल में अपना योगदान क्यों नहीं दे सकते ? ऐसी प्रगतिशील धारा में बहते हुए हमें यह भी सोचना होगा कि यदि गंगोत्री ही सूख जाएगी तो हरिद्वार-इलाहाबाद की गंगा में अवगाहन कैसे संभव होगा ? यहां इस तथ्य पर भी गंभीरता से विचार करना हागा कि जब पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था औंधो मुंह गिरी पड़ी है, तब भी हम शान से सिर उठाए खड़े हैं तो इसका कारण हमारे किसान ही हैं, जो हमें प्राणवायु देकर ज़िंदा रखे हुए हैं। जब किसान अपने खेतों की प्यास बुझाने के लिए दिन में शादियां कर बिज़ली की बचत कर रहे हैं तो हम शहरी लोगों को अपनी ज़िम्मेदारी का अहसास क्यों नहीं हो रहा है ? भारतीय ग्रामीण परिवेश साधान और सुविधाओं से वैसे ही महरूम है। इसके बावज़ूद वे सादगी और समाज सुधार की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं तो हम अपनी समृध्दि का अश्लील दिखावा करने पर क्यों आमादा हैं ? माना कि पैसों से सब कुछ ख़रीदा  जा सकता है, पर बिजली का स्रोत तो दोनों के लिए एक ही है।

ऐसे में क्या यह संभव नहीं है कि हम शहरी लोग भी दिन में शादियां करने का फैसला कर लें ? देशभर में बिजली की खपत जिस अनुपात में बढ़ रही है, उस अनुपात में उसका उत्पादन नहीं हो रहा है। ऐसे में विवाह समारोहों में भारी-भरकम विद्युत सज्जा कर हम अपने ऐश्वर्य का प्रदर्शन क्यों करने पर तुले हैं ? ऐसे आयोजनों पर अब विराम लगना चाहिए। वैसे भी किसी धार्मिक ग्रंथ में इस बात का कहीं उल्लेख नहीं है कि शादियां रात में ही होना चाहिए। कभी कोई दौर रहा होगा, जब रात में बारात और भोज के आयोजन की परंपरा पड़ी होगी, पर आज समय की मांग यही है कि हम इस परंपरा को बदलने के लिए आगे आएं। हम खुद को प्रगतिशील मानते हुए ग्रामीणों पर गंवार का लेबल चस्पा कर देते हैं, लेकिन हकीकत यह है कि व्यावहारिकता के पैमाने पर ग्रामीण हमसे अधिाक प्रगतिशील हैं और दिन में शादियां करने का फैसला कर उन्होंने अपनी श्रेष्ठता एक बार फिर साबित कर दी है। सिख, पंजाबी और सिंधी समाज की अधिकांश शादियां तो दिन में ही होती हैं और उनकी सामाजिक मान-मर्यादा भी कम नहीं है। फिर हम अपनी फ़िजूल की नाक की खातिर बिजली बर्बाद कर अपनी किस मर्यादा का प्रदर्शन कर रहे हैं ? उम्मीद की जाना चाहिए कि ग्रामीणों की तरह हम भी दिन में शादियां कर ऊर्जा बचाने की दिशा में आगे बढ़ेंगे वरना कुछ समय बाद ग्रामीण समाज की नज़र में हम शहरी गंवार कहलाने लायक हो जाएंगे।

महेश बाग़ी