संस्करण: 25फरवरी-2008

 प्राकृतिक प्रकोपों से झुलसता है किसान राजनैतिक दल सेंकते हैं रोटियां
   राजेन्द्र जोशी

   अपने कृषि प्रधान देश की उपजाऊ माटी पर गर्व करने वाले हम भारतवासियों को गहरा धाक्का तब लगता है, जब प्रकृति के कोपभाजन का हम शिकार हो जाते हैं। कृषि हमारे देश का आर्थिक-आधार है। इस व्यवसाय से देश के करोड़ों किसान जुड़े हैं। ये किसान बहुत ही परिश्रम, निष्ठा और विभिन्न विपरीत परिस्थितियों से जूझते हुए दृढ़ संकल्पित होकर अन्न, उपजाने के कार्य में लगे रहते हैं। किंतु मौसम की मार के थपेड़ों को झेलते हुए कई बार ये किसान सफलता अर्जित कर पाने में बेबस हो जाते हैं।

जलवायु की विविधाता के कारण हमारा देश बारह महीने किसी न किसी फसल को लेने वाला एक सशक्त देश है। खाद्यान्न, दलहन, तिलहन और विभिन्न किस्मों की पैदावार हमारे खेतों में होती है। ग्रीष्म, शीत और वर्षाऋतुओं में हमारे कृषक दिन रात मेहनत कर खेत बनाते हैं। खेत को हलने-बखरने, उसमें बुआई करने, फसलों को पकाने और फिर उसकी कटाई करने की प्रक्रिया में हमारे किसान भाई कोई कसर बाकी नहीं छोड़ते। खेत में पैदा होने वाला खाद्यान्न केवल उस किसान के लिए ही नहीं होता बल्कि पूरा समाज उसका उपभोग करता है। समाज के प्रति अपने इस उत्तरदायित्व को निभाने में और देश में अनाज के भंडार को बढ़ाने में योगदान देना उसकी प्राथमिकता है, चाहे अपने इस कार्य के लिए उसे बैंकों से या साहूकारों से कर्ज ही क्यों न लेना पड़े ! बीज बोकर किसान फसल के ऊगने से लेकर करने तक की अवधि में वह एक तनाव से भी गुजरता है। यह तनाव होता है, मौसम के औचक होते विपरीत आचरण् से। भरोसा नहीं कब उसकी फसल किस तरह के प्रकोप से ग्रसित हो जाय। यह तनाव उसे तब तक रहता है जब तक फसल पककर खलिहान से समाज के बीच तक नहीं पहुंच जाय।

वर्तमान युग विज्ञान का युग है और कृषि, वैज्ञानिकों ने इतने अधिक अवसर और साधान-सुविधाएँ ईज़ाद कर दी हैं कि देश में परम्परागत खेती करने के तरीकों के बजाय किसान आधुनिक साधानों से खेती-किसानी में आगे बढ़ रहा है। इन सब कृषि-विज्ञान की उपलब्धियों के बावज़ूद मौसम की कृपा पर भी किसान की निर्भरता रहती है। प्रकृति में निरन्तर बढ़ रही हलचलों के कारण मौसमों ने भी अपने चक्र को या तो बदल दिए हैं या अनियमित कर दिए हैं। ग्रीष्म ऋतु में पाले और इल्लियों के प्रकोपों की मार किसानों पर पड़ती ही रहती है। जो फसलें इस तरह की विपदाओं से नष्ट प्राय: हो जाती हैं, उसमें किसान की आर्थिक, मानसिक और शारीरिक शक्ति बेकार चली जाती है। मौसम के बदलते तेवरों से लड़ने की क्षमता न रखने वाले छोटे और मझले किसानों के दर्द को किसी पैमाने से नापा नहीं जा सकता है। बैंकों और साहूकारों के चंगुलों में फंसे है। बैंकों और साहूकारों के चंगुलों में फंसे ऐसे प्रभावित किसान भाइयों के सपनों पर जब ओले पड़ने लगते हैं, तब उसे सहयोग, सांत्वना और हमदर्दी की ज़रूरत होती है। स्वाभाविक है ऐसे में प्रशासन और सत्ता की ओर वह देखता है, और संवेदनशीलता की अपेक्षा रखता है।

अब की बार भी इस ऋतु में किसानों की मेहनत पर संकट छा गया है। खेतों में खड़ी फसलों पर, मौसम का पारा काफ़ी नीचे गिर जाने के कारण पाला पड़ रहा है। कई क्षेत्रों में फसलों में कीड़े, इल्लियां लगने के मामले सामने आ रहे हैं। इस समय किसान को आर्थिक सहयोग के साथ ही रासायनिक खाद, कीटनाशक दवाइयों और उपचार के विभिन्न साधानों की आवश्यकता होती है। ऐसे में सत्ता और प्रशासनिक व्यवस्थाओं में जो हमदर्दी और मदद का रूख होना चाहिए, वह नहीं दिख पाता। जहाँ तक सत्ता का प्रश्न है, उसका मुख्य उद्देश्य तो अपनी राजनीति की चमक को बनाये रखना होता है। प्राकृतिक प्रकोपों से प्रभावित किसानों को तो ऐसे संकट के समय में राजनीति की नहीं, बल्कि पीठ पर हाथ फेरने वाली व्यवस्था की आशा होती है।  किसान को अनियंत्रित प्रशासन व्यवस्था, शासकीय सेवकों की हृदयहीन प्रवृत्ति और भ्रष्टाचार के चलते वांछित राहत नहीं मिल पाती। सत्ता चूंकि राजनैतिक दल संचालित करते हैं, अत: ऐसे अवसरों को सत्ता और उसके संगठनों को अपने राजनैतिक लाभ कमाने के अवसर उपलब्धा हो जाते हैं। अपने-अपने राज्यों में जिस दल की सत्ता अस्तित्व में होती है, वह दल ऐसे में जब प्राकृतिक प्रकोपों से किसान झुलस रहा होता है, तब वह अपनी रोटियां सेंकने में पीछे नहीं रहना चाहता है। राजनैतिक दल किसानों को इस दुखद घड़ी में हमदर्दी प्रदर्शित करने के लिए जगह-जगह भीड़ जुटाकर घड़ियाली आंसू बहाते हैं तथा उनकी भावनाओं से जुड़ने का भ्रमजाल फैलाकर उनके आंसू पोछने के नाम पर बदले में उनके वोट हासिल करने का षडयंत्र करते हैं। प्राकृतिक प्रकोपों के दौरान यदि निर्वाचन नजदीक हो तो फिर क्या पूछना। प्राकृतिक प्रकोपों से कई बार तो इतनी अधिक कृषि हानि होती है कि राज्य की क्षमताओं के बाहर की स्थिति उत्पन्न हो जाती है, तब राज्य केन्द्र की तरफ आर्थिक सहयोग की गेंद फेंक देता है। राज्य और केन्द्र की सत्ताएं यदि एक ही राजनैतिक दल की होती हैं, तो समन्वय ठीक चलता रहता है, राज्य की सत्ता अपने राज्य के किसानों को भरसक मदद करती है और केन्द्र के प्रति सहयोगात्मक रूख रखती है। यदि राज्यों और केन्द्र में अलग अलग राजनैतिक दलों की सत्ताऐं विद्यमान होती है, तो स्थिति टकराहट की बन जाती है। राज्य की सत्ताऐं ऐसी स्थिति में अपनी अक्षमता छुपाने के लिए केन्द्र की सत्ता को अपने प्रदेश के किसान भाइयों का दुश्मन बनाने की चालें चलती रहती हैं। केन्द्र और राज्य में विद्यमान विपरीत दलों की सत्ताओं के बीच के कटु रिश्तें ऐसे संवेदनशील मौकों पर राजनैतिक लाभ उठाने के काम आ जाते हैं। देखा जाय तो किसानों की संकटकालीन स्थिति में उनको सहयोग प्रदान करने का पहला कार्य राज्य की सरकारों का होता हैं। वे अपने संसाधानों से चौपट हो रही फसलों से प्रभावित कृषकों के प्रति हमदर्दी रखकर सहयोग प्रदान करें। केन्द्र के उत्तरदायित्व को भी नकारा नहीं जा सकता। केन्द्र भी अपने स्तर पर राज्यों से मांग आने पर या स्वयं आगे आ कर कृषि-हानि का आंकलन कर प्रभावितों को राहत पहुँचाने का काम करता है। हानि के इस दौर में किसान तो दु:खी रहता है, किंतु राजनैतिक दल उसके दुख में सहभागिता का ढिंढोरा पीट-पीटकर एक दूसरे दलों के साथ खुन्नस निकालने के लिए किसान को अपने पक्ष में रखना चाहते है। उसकी भावना और संवेदनाओं के साथ खेलकर उसे मरहम लगाने के बजाय उसे दूसरें दलों के ख़िलाफ भड़काने के पांसे फेंके जाते हैं। राज्यों के सत्तारूढ़ दलों का केन्द्र से अपने अधिकार का हिस्सा मांगने का हक तो है, किंतु उस अधिकार के निर्वहन की प्रक्रिया ऐसी होनी चाहिए कि दुखी और पीड़ित किसानों को भ्रमित कर उनकी भावनाओं से खिलवाड़ नहीं होना चाहिए।

 राजेन्द्र जोशी