संस्करण: 25फरवरी-2008

'अल्पसंख्यक' को पुनर्परिभाषित किया जाये
   डॉ. गीता गुप्त

 मुस्लिम-आरक्षण का उपाय ढूंढने वाली केन्द्र सरकार ने अन्तत: जनवरी 2008 में पचीस लाख अल्पसंख्यक विद्यार्थियों के लिए छात्रवृत्ति की घोषणा कर दी। इसके पहले यह ज्ञात करने के लिए ख़ासी क़वायद हुई कि शासकीय सेवाओं में कहाँ-कहाँ कितने मुसलमान पदस्थ हैं ? इस क़वायद की बहुत आलोचना हुई। अच्छा तो यह होता कि सरकार समूचे देश में मुस्लिम जनसंख्या की गणना करवा लेती; तब एक टण्टा सुलझ जाता।

फ़िलहाल अल्पसंख्यकों के लिए घोषित छात्रवृत्ति का लाभ मुसलमान के अलावा सिख, बौध्द और ईसाई विद्यार्थियों को भी प्राप्त होगा। मतलब, सरकारी नज़रिये से इस देश में सिख, बौध्द और ईसाई अल्पसंख्यक हैं। कहा जा रहा है कि प्रधानमंत्री जी ने सिखों को उपकृत कर दिया। इतना तो अपनी बिरादरी के लिए उन्हें करना ही चाहिए था। लगे हाथ ईसाइयों की भी बल्ले-बल्ले हो गयी। यूपीए अधयक्ष की बिरादरी धान्य हो गयी, उनकी भी जय-जयकार हो रही है अब। यह तो होना ही था। बौध्द(महार) तो पहले से ही अनुसूचित जाति के अन्तर्गत आरक्षण के पात्र हैं। कयास लगाये जा रहे हैं कि अभी अल्पसंख्यक-छात्रवृत्ति की घोषणा हुई (अमली कार्रवाई आरम्भ हो चुकी है.)। धीरे से उनके आरक्षण की राह भी सरकार निकाल ही लेगी। आख़िर उसे उनके कल्याण की चिन्ता जो है। अब मुसलमान, सिख और ईसाइयों के वोट काँग्रेस की झोली में पक्के हो गये। भारतीय जनता पार्टी द्वारा शासित राज्य-सरकारें भी उफ़ नहीं कर सकतीं क्योंकि वे भी इन वर्गों की ख़ुशामद करके सत्ताधीश बनने का स्वप्न देखती हैं।

प्रश्न यह है कि भारत की अधिाकतम जनता यदि हिन्दू है तो क्या हिन्दू होना अपराध है और इसीलिए सरकार द्वारा उनके हितों की अनदेखी की जानी चाहिए ? और यह भी कि पाकिस्तान मुसलमानों का देश है तो क्या वहाँ के हिंदू 'अल्पसंख्यक' माने जाते हैं, और जिस प्रकार यहाँ 'अल्पसंख्यक' कहलाने वाले मुसलमान सरकार के सिरमौर बने हुए हैं और अनेक सुविधाएँ भोग रहे हैं वैसा ही पाकिस्तान के हिन्दुओं को सुलभ हैं ? धार्मनिरपेक्षता की दुहाई देने वाली सरकार इसका उत्तर नहीं दे सकती। दरअसल, आज नये सिरे से 'अल्पसंख्यक' को परिभाषित किये जाने की आवश्यकता है। इस शब्द की आड़ में बहुत अनर्थ हो रहा है।

यह भी सत्य है कि इस देश में तुष्टिकरण की जड़ें गहरी हैं। आज़ादी के पूर्व भी कुछ दिग्गज राजनेताओं की इसी नीति के कारण लाला लाजपतराय जैसे सच्चे देशभक्त को स्वराज्य-दल छोड़ने के लिए विवश होना पड़ा। यहाँ स्मरणीय है कि धार्मनिरपेक्ष होते हुए भी अधिकतर भारतीय दिग्गज राजनेता हिन्दुत्व के हिमायती और कट्टर राष्ट्रवादी थे। मुसलमानों को प्रसन्न करने के लिए उनकी अनुचित माँगों को भी स्वीकार करना और इसके लिए हिन्दुओं की अवहेलना करना उन्हें स्वीकार न था। वे मानते थे कि देश का विभाजन हो चुका है और अधिसंख्यक मुसलमान पाकिस्तान को अपना देश मानकर वहाँ जा चुके हैं, जो स्वेच्छा से यहाँ रह गये उनकी हैसियत आम नागरिकों की तरह ही होनी चाहिए। इसमें ग़लत क्या है ?

 प्रतिबंधित है, जिनके अलग धार्मिक क़ानून हैं, जो इस देश में रहते तो हैं परन्तु 'वन्दे मातरम्' को अपने 'धार्म-विरूध्द' मानकर उसके गायन को पाप समझते हैं, जो आज तक मदरसों में राष्ट्रधवज नहीं फहराते थे, सरकार उनके लिए सर्वाधिक चिन्तित है। उल्लेखनीय है कि इस वर्ष सरकार ने मदरसों में राष्ट्रीय पर्व मनाने हेतु विशेष आर्थिक अनुदान की घोषणा की, शर्त यह थी कि मदरसे राष्ट्रीय धवज फहरायेंगे। क्या यह दु:खद और शर्मनाक नहीं ? इतने अरसे तक मदरसे राष्ट्रपर्व और राष्ट्रधवज से परहेज़ करते रहे और सरकारें सोती रहीं।

वस्तुत: समाज के सभी वर्गों को विकास के समान अवसर उपलब्धा कराना सरकार का प्राथमिक दायित्व है। समाज के जो वर्ग विभिन्न कारणों से विकास की दौड़ में अन्य वर्गों से पिछड़ जाते हैं उन्हें आगे लाने हेतु शासकीय प्रयास एवं प्रोत्साहन की आवश्यकता को नकारा नहीं जा सकता, मगर संकीर्ण राजनीतिक स्वार्थ-सिध्दि के लिए ऐसा किया जाना सर्वथा ग़लत है। अल्पसंख्यकों के कल्याण की बात करने के पूर्व जानना होगा कि उनकी दुर्दशा का कारण क्या है ? जो अपनी पृथक व्यवस्था (मदरसे, क़ानून, आयोग आदि) से सन्तुष्ट थे और अपने धार्मिक नेता के फ़रमान का ऑंख मूंदकर मुस्तैदी से पालन करते रहे, परिवार-नियोजन की अवहेलना करके देश में अनावश्यक जनसंख्या बढ़ाते रहे और स्वयं भी परेशान होते रहे;, उनकी अपनी कोई व्यक्तिगत सोच नहीं दिखी। सन् 2008 में उनके धार्मिक नेताओं  को जनसंख्या-वृध्दि के दुष्परिणाम का बोध हुआ और तब उन्होंने परिवार-नियोजन के उपायों को अपनाने की अनुमति की घोषणा की। मदरसों की शिक्षा-पध्दति की चर्चा ही बेमानी है। दो वर्ष पूर्व मदरसे से हायर सेकण्डरी उत्तीर्ण एक छात्रा ने बी.एस.सी. में प्रवेश लिया और अनुत्तीर्ण हो गयी। उसे हिंदी में शून्य अंक मिला था। वह मेरे पास पढ़ने आयी तो पता चला कि उसे ककहरा तक पहचानना नहीं आता था। ऐसी शिक्षा-व्यवस्था से क्या लाभ ? मदरसों में हिंदी पढ़ायी ही नहीं जाती थी तो छात्रा का क्या दोष ? अब मदरसों की ख़स्ता हालत सुधारने के लिए सरकार ने करोड़ों का अनुदान देने की घोषणा की है, तो क्या मात्र अनुदान से हालत सुधार जायेगी ?

सच्चर समिति ने अपनी विचित्र रपटों में देश के मुसलमानों के आर्थिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े होने का तथ्य रेखांकित किया है और उन्हें मुख्य धारा से जोड़ने हेतु विशेष क़दम उठाने की आवश्यकता व्यक्त की है। लेकिन उक्त समिति की रपटों और सिफ़ारिशों का इस आधार पर व्यापक विरोधा हुआ है कि इसमें देश को धाार्मिक आधाार पर बाँटने के बीज पड़े हैं। प्रसंगवश यहाँ उल्लेखनीय है कि संविधान-निर्माता एवं स्वयं भुक्तभोगी होते हुए भी बाबा साहब अम्बेडकर ने दलितों के लिए संविधान में अनन्तकालीन आरक्षण का प्रावधान नहीं किया क्योंकि उनकी नीयत साफ़ थी और वे एक सच्चे राष्ट्रवादी नेता थे। जाति या वर्ग के आधार पर पक्षपात-पूण्र्  व्यवहार से उत्पन्न होने वाली त्रासदी का उन्हें पूर्वानुमान रहा होगा इसीलिए उन्होंने मानव मात्र के समान अधिकारों की ही बात की।

यह ग़ौरतलब है कि बाद के राजनेताओं ने इस देश में हर क्षेत्र में विषमता के बीज बो दिये जिनका दुष्परिणाम जाने कितनी पीढ़ियाँ भुगतती रहेंगी ? स्वातन्त्र्योत्तर भारत में सामाजिक एकरूपता के प्रयास कदापि नहीं किये गये इसीलिए बुनियादी शिक्षा की विकृति हमारे सामने है। समाज में समान शिक्षा के प्रसार हेतु किसी ने धयान नहीं दिया। आज विचारक स्वीकारते हैं कि प्रारम्भिक शिक्षा में एकरूपता अनिवार्य है। जबकि प्राथमिक स्तर पर ही पाठयक्रम में विविधाता दिखायी देती हैं। राजनेताओं ने संवैधानिक प्रावधानों को तोड़-मरोड़कर ऐसा कुत्सित रूप दे दिया जिसकी परिणति सामाजिक भेद-भाव, असमानता और वर्ग-भेद की खाई के रूप में हमारे समक्ष स्पष्ट दृष्टिगोचर हो रही है। अरबों की जनसंख्या वाले विशाल देश में जाति-धार्म, ऊंच-नीच, सामाजिक असमानता आदि को प्रश्रय देने वाली हर ग़लत नीति स्वार्थप्रेरित राजनेताओं की संकीर्ण मनोवृत्ति का परिणाम है। उनकी घृणित राजनीति के कारण छ: दशक से आरक्षण का सुख भोगने वाली जातियाँ अब उस सुविधा को अपना अधिकार समझने लगी हैं और अपनी योग्यता सिध्द करना ही नहीं चाहतीं। वे दबे-कुचले, पिछड़े कहलाने में गर्व अनुभव करती हैं। आरक्षण का आकर्षण इतना प्रबल है कि सवर्ण भी झूठ बोलकर उसका लाभ पाने का प्रयास करने में नहीं सकुचाते। जैन और सिंधी भी 'अल्पसंख्यक' कहलाने हेतु उत्सुक हैं। अधिकतर जातियाँ स्वयं को नीचा सिध्द करने में जुटी हुई हैं, ताकि सरकारी लाभ प्राप्त कर सकें। यह स्थिति देश के लिए दुर्भाग्यपूर्ण है।

वर्तमान समय मात्र 'अल्पसंख्यक' की राजनीति करने का नहीं है वरन् गम्भीरतापूर्वक देश-हित में कठोर निर्णय लेने का है। यह राजनेताओं के स्वाभिमान की अग्निपरीक्षा की घड़ी है। तनिक विचार करें, सन् 1947 में भारत की स्वतन्त्रता और विभाजन के बाद देश की जनसंख्या मात्र तैंतीस करोड़ थी जिसमें ग्यारह प्रतिशत मुसलमान थे। आज भारत की जनसंख्या लगभग सवा अरब है। यह जनसंख्या-वृध्दि इसलिए क़ाबिले-ग़ौर है कि जिस धार्म में चार विवाह जायज़ हैं, परिवार नियोजन प्रतिबन्धित होने के कारण चौबीस बच्चे भी (यदि हों तो) सहज, स्वाभाविक हैं। तो इस दृष्टि से साठ वर्षों में देश की बढ़ी जनसंख्या में उनके अनुपात का अनुमान सरलता से लगाया जा सकता है और कहा जा सकता है कि मुसलमान 'अल्पसंख्यक' क़तई नहीं हैं।

डॉ. योगेश अटल ने लिखा है कि पाकिस्तान की जितनी कुल जनसंख्या है उससे भी अधिक मुसलमान भारत में हैं; फिर वे 'अल्पसंख्यक' कैसे हैं ? वे सचमुच 'अल्पसंख्यक' होते तो सरकार उनके मतों की चिन्ता क्यों करती ? और उसे फ़र्क क्यों पड़ता ? मगर सरकारें वास्तविकता जानती हैं; 'अल्पसंख्यक' शब्द की आड़ में 'कुर्सी' की राजनीति का खेल लज्जास्पद् है। सरकार ने सिखों और ईसाइयों को भी 'अल्पसंख्यक-छात्रवृत्ति' का पात्र घोषित किया है तो निश्चित रूप से इसका आधार स्पष्ट किया जाना चाहिए। यह समय की माँग है कि 'अल्पसंख्यक' को पुनर्परिभाषित किया जाये।

आज़ादी के साठ वर्षों बाद भी देश में सामाजिक समानता स्थापित नहीं हो सकी है और दूर-दूर तक इसकी सम्भावना दिखाई नहीं देती। सरकार द्वारा एक-एक करके अनेक जातियाँ 'आरक्षित' वर्ग की घोषित हो गयीं अथवा 'अल्पसंख्यक' के रूप में विशेष दर्जा पा चुकी हैं, तो समाज की शेष जातियों में से कौन 'बहुसंख्यक' है और किस आधार पर ? नेताओं द्वारा समाज को खण्ड-खण्ड कर देने वाली राजनीतिक चालों से जनता सदैव अनभिज्ञ रहेगी, ऐसा सोचना भारी भूल होगी। राजनेताओं के स्वेच्छाचार और संविधान की मनमानी व्याख्या से क्षुब्धा और मर्माहत बहुसंख्यक जनता का असन्तोष जिस दिन विस्फ़ोटक रूप धारण कर लेगा, क्या सत्ताधीशों को उस दिन की प्रतीक्षा है ?

  डॉ. गीता गुप्त