संस्करण: 25फरवरी-2008

उ.प्र. में सी.बी.आई. जाँच का नाटक
   सुनील अमर

  मुख्यमंत्री मायावती ने अपने नौ महीने के कार्यकाल के दौरान सातवाँ मामला जाँच के लिए केन्द्रीय अन्वेषण ब्यूरो यानी सी0बी0आई0 को सौंपा है और हमेशा की तरह एक बार फिर दोहराया है कि 'ताकि उन पर कोई पक्षपात का आरोप न लगा सके।' लेकिन स्थिति यह बन रही है कि अपनी विश्वसनीयता बनाये रखने के नाम पर मुख्यमंत्री जो कदम उठा रही हैं वही उनको सबसे ज्यादा अविश्वसनीय बना रहा है। आश्चर्यजनक यह है कि पूर्व में भेजे गए छह मामलों में आज तक सी0बी0आई0 की स्वीकृति न मिलने के बावजूद मुख्यमंत्री ने बहुचर्चित पुलिस भर्ती घोटाले को भी बीती 4 फरवरी को सी0बी0आई0 को सौंपने का ऐलान कर दिया। ऐसे में यह प्रश्न सहज ही उठता है कि आखिर कुमारी मायावती क्यों इतने अधिक मामलों को केन्द्रीय एजेन्सी को सौंप रही हैं? क्या राज्य में कोई सक्षम और निष्पक्ष जाँच एजेन्सी नहीं रह गई है? वास्तव में ऐसा करके कुमारी मायावती एक तीर से कई निशाने साधा रही हैं। सी0बी0आई0 को सौंपे जाने वाले मामलों पर एक नजर डालने से यह स्पष्ट हो जाता है कि ऐसा करने के पीछे उनकी मंशा क्या है। मुलायम सिंह यादव सरकार द्वारा किए गए तथाकथित पुलिस भर्ती घोटाले के अलावा वरिष्ठ कांग्रेसी नेता व केन्द्रीय मानव संसाधान मंत्री अर्जुन सिंह की पौत्रवधू द्वारा लगाया गया दहेज उत्पीड़न का मामला, भाजपा द्वारा 2007 विधानसभा चुनावों के दौरान तथाकथित साम्प्रदायिक सद्भाव बिगाड़ने वाली सी0डी0, बसपा विधायक राजूपाल (इलाहाबाद) की हत्या में सपा की कथित संलिप्तता तथा नोएडा भूमि घोटाला व खाद्यान्न घोटाला के अलावा फैजाबाद के चर्चित शशि हत्याकाण्ड में बसपा के पूर्व मंत्री आनन्द सेन का नाम होने के मामले इसमें शामिल हैं। इस प्रकार आज की तारीख में मुख्यमंत्री मायावती के जितने भी प्रमुख राजनीतिक शत्रु हैं, उन सबसे सम्बन्धित मामलों की जाँच की सिफारिश उन्होंने सी0बी0आई0 से कर दी है। यह अलग बात है कि सी0बी0आई0 ने इनमें से एक भी मामला हाथ में लेने की घोषणा अभी तक नहीं की है। कुमारी मायावती द्वारा ऐसा किए जाने के पीछे दरअसल साल भर के भीतर ही होने वाला लोकसभा चुनाव है। वे इस तरह की जाँच के बहाने विपक्षी दलों को घेरना चाहती हैं। मायावती के राजनीतिक शत्रुओं में पहले नम्बर पर कांग्रेस, दूसरे पर सपा तथा तीसरे नम्बर पर भाजपा है। वास्तव में एक ही वोट बैंक होने के कारण बसपा और कांग्रेस स्वाभाविक रूप से आमने-सामने आ गई हैं। यह टकराव काफी कम हो सकता था अगर नौ माह पूर्व सम्पन्न उ0प्र0 विधानसभा चुनाव में बसपा को प्रबल बहुमत न मिला होता लेकिन कथित दलित-सवर्ण गठजोड़ की सफलता से बसपा प्रमुख को लगने लगा है कि अब दिल्ली दूर नहीं है। उन्हें लगता है कि यह तभी सम्भव हो सकता है जब कांग्रेस कमजोर हो तथा मतदाता उससे रुष्ट होकर बसपा से मिलें। इसी योजना के तहत उन्होंने लगभग दो माह पूर्व से अपनी जान को खतरा बताना शुरू किया। अपनी जान को खतरा वैसे तो वे हमेशा ही बताती रही हैं लेकिन इधार उन्होंने केन्द्र की कांग्रेस-नीत सरकार से बाकायदा माँग कर डाली कि उन्हें उस प्रकार की सुरक्षा दी जाये जो प्रधानमंत्री को उपलब्धा है। केन्द्र ने पहले तो इसे यह कहकर टाला कि इसके लिए संविधान में संशोधान की आवश्यकता पड़ेगी लेकिन मामले को राजनीतिक रंग लेते देख केन्द्र ने मायावती को कुछ और सुरक्षा उपलब्धा करा दी है। केन्द्रीय मंत्री अर्जुन सिंह से क्योंकि मायावती को कुछ लेना-देना नहीं है इसलिए उनकी जाँच सी0बी0आई0 को सौंपने का अनुरोध कर उन्होंने अर्जुन सिंह प्रकरण केन्द्र के पाले में डाल दिया है। बुन्देलखण्ड समेत कई अन्य मुद्दों पर वे कांग्रेस से बाकायदा भिड़न्त की स्थिति में हैं।

समाजवादी पार्टी से कुमारी मायावती का बैर राजनीतिक होने के साथ-साथ कुछ व्यक्तिगत भी लगता है। वास्तव में वर्ष 1995 में हुए 'राज्य अतिथि गृह काण्ड' के बाद से सपा-बसपा के बीच दूरी लगातार बढ़ती ही गई है। वर्ष-2006-07 में कई चरणों में हुई 18000 से अधिक पुलिस-पी0ए0सी0 जवानों की भर्ती में व्यापक घोटाला तथा महिला अभ्यर्थियों के यौन शोषण की शिकायतें आने पर मायावती सरकार ने इस भर्ती को रद्द कर पहले तो विभागीय जाँच बैठाई तथा बाद में इस प्रसंग को सी0बी0आई0 को सौंप दिया है। जाँच सी0बी0आई0 को सौंपने के पीछे रहस्य यह बताया जा रहा है कि मुख्य सचिव की अधयक्षता में गठित तीन सदस्यीय समिति ने ऐसे साक्ष्य जुटा लिए हैं जिनमें राजनेता न सही तो आई0पी0एस0 तथा पी0पी0एस0 अधिकारियों को फँसना तो निश्चित ही है। अब पेंच यह है कि अगर अधिकारी नपेंगे तो वे उन नेताओं का नाम शर्तिया लेंगे जिन्होंने उन पर दबाव बनाकर घोटाले को अंजाम दिया। ऐसा करके मुख्यमंत्री सपा के खिलाफ कांग्रेस के हाथ में भी एक 'टूल' दे रही हैं जिसे वह चाहे तो इस्तेमाल करे। इसके अलावा बसपा विधायक राजू पाल हत्याकाण्ड का मामला है। हालाँकि इसमें शामिल बताए जा रहे सांसद अतीक अहमद से सपा ने अपना सम्बन्धा खत्म कर लिया है और अतीक जेल में हैं किन्तु मामले की सी0बी0आई0 जाँच कराकर सपा पर दबाव तो बनाया ही जा सकता है। चुनाव में यह प्रकरण काफी काम देगा।

  अन्य चर्चित मामलों में भाजपा का सी0डी0 काण्ड है। उ0प्र0 विधानसभा चुनावों के दौरान भाजपा द्वारा यह विवादित सी0डी0 जारी की गई थी। हालाँकि सी0डी0 जारी करने वाले भाजपा के तत्कालीन मीडिया को-आर्डिनेटर राजनाथ सिंह सूर्य थे, किन्तु मायावती भाजपा अधयक्ष राजनाथ सिंह को इसमें लपेटना चाह रही हैं। राजधाानी के राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि भाजपा के एक राष्ट्रीय स्तर के प्रभावशाली तथा राजनाथ विरोधाी नेता इन दिनों मुख्यमंत्री मायावती के सम्पर्क में हैं। इस नेता ने संभवत: मायावती से वादा कर रखा है कि अगर राष्ट्रीय अधयक्ष राजनाथ सिंह किसी तरह इस काण्ड की लपेट में आ जायें और राजग को केन्द्र में सरकार बनाने का मौका मिले तो वह उपप्रधानमंत्री पद के लिए मायावती की दावेदारी पक्की कर देगा। अब कांग्रेस और सपा के साथ बसपा की बढ़ती खुन्नस को देखते हुए सिर्फ भाजपा ही बचती है जिससे मायावती तालमेल कर सकती हैं और ऐसा करने का काफी पुराना तजुर्बा उन्हें है भी। उ0प्र0 में इस बार सत्ता संभालने के कुछ ही दिनों बाद मुख्यमंत्री मायावती ने एस0आई0टी0 (स्पेशल इन्वेस्टीगेशन टीम) नामक जाँच दल का गठन कर घोषणा की थी कि यह दल उच्चाधिकार प्राप्त होगा तथा भ्रष्टाचार व अपराधा के मामलों की सी0बी0आई0 की तरह जाँच करेगा। अरबों रुपए के बहुचर्चित खाद्यान्न घोटाले की जाँच भी एस0आई0टी0 को गठन के तुरन्त बाद सौंपी गई किन्तु जाँच पूरी होने से पूर्व ही मुख्यमंत्री ने इसे भी सी0बी0आई0 को सौंप दिया है। राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता अपनी जगह है लेकिन उसके लिए सरकारी जाँच एजेन्सियों को छवि खराब करना किसी भी दृष्टि से उचित नहीं है। पुलिस भर्ती घोटाले में मायावती की सरकार ने जितने तरह की पैंतरेबाजी और बर्खास्तगी-बहाली का नाटक चलाया है उससे स्वयं उनकी विश्वसनीयता ही संदिग्धा हो गई है। मायावती ने विधानसभा चुनाव के दौरान ऐलान किया था कि वे सत्ता में आते ही मुलायम सिंह-अमर सिंह की जोड़ी को जेल भेज देंगी। ऐसा तो वे अभी तक कर नहीं सकी हैं उल्टे जाँच भी राज्य से हटाकर केन्द्र को भेज दी है। मायावती की इन कार्यवाहियों से नि:सन्देह राज्य-पुलिस बल पर प्रतिकूल असर पड़ रहा है। प्रदेश में एक सक्षम जाँच प्रणाली है बशतरें उसे राजनीतिक अड़ंगेबाजी के बगैर काम करने दिया जाय। किसी भी वाजिब मामले की जाँच स्वीकार करने में राज्य सरकार के अनुरोध के बाद सी0बी0आई0 ज्यादा देर नहीं लगाती। किन्तु बसपा सरकार द्वारा भेजे गए उपर्युक्त सातों मामलों में सी0बी0आई0 ने अभी तक कोई स्वीकृति नहीं दी है उल्टे फैजाबाद की छात्रा शशि हत्याकाण्ड में नामजद बसपा के तत्कालीन मंत्री आनन्द सेन के प्रकरण में तो सी0बी0आई0 ने प्रतिरोध करते हुए कहा था कि प्रदेश सरकार ने उससे जाँच की सिफारिश ही नहीं की है। जनता भी इस तरह की राजनीतिक नूरा-कुश्तियों को अब समझने लगी है तथा संचार माधयमों की सक्रियता भी काफी कुछ पर्दाफाश करती रहती है।

   मायावती जिस दावे और वादे के साथ सत्ता में प्रबल बहुमत लेकर आई हैं उसमें वाजिब तो यह होता कि वे राज्य की ही जाँच एजेन्सियों से ईमानदारी और सख्ती से जाँच कराकर दूधा का दूधा और पानी का पानी करदेतीं। यह कदम उनकी आगामी लोकसभा चुनाव की रणनीति के लिए ज्यादा कारगर होता बजाय इसके कि वे सी0बी0आई0 जाँच का नाटक करके पुलिस भर्ती तथा खाद्यान्न घोटाले जैसे अति महत्वपूर्ण मामलों को भी ठण्डे बस्ते में डाल रही हैं तथा प्रदेश की मशीनरी को हतोत्साहित कर रही हैं। चुनावी रणनीति के दृष्टिकोण से यह उनके लिए नुकसानदेह होगा।

सुनील अमर