संस्करण: 25फरवरी-2008

 भाजपा की उतरती कलई कैसा चेहरा? कैसी चाल? कैसा  चरित्र?
   वीरेन्द्र जैन

 

मधयप्रदेश की भाजपा सरकार ने अपने लिए अपने हाथों गढे गये सारे विशेषणों की वैसे ही हत्या कर दी है जैसे कि कृष्ण कथा में कंस ने अपना सिंहासन बचाने के लिए अपने भानजे भान्जियों की कर दी थी। चेहरा चाल चरित्र की बात करने वाली पार्टी के पास ना तो अब चेहरा बचा है ना चाल और ना ही चरित्र। उसके पास केवल धान है और भवन हैं। प्रशासनिक भ्रष्टाचार के किस्से तो हातिमताई की कहानियों की तरह समाप्त नहीं होते पर सांगठनिक क्षेत्र में भी पग पग पर किस्से ही किस्से बिखरे पड़े हैं।

देश के राष्ट्रीय हिंदी समाचार पत्र जनसत्ता के सोलह फरवरी 2008 के अंक में प्रकाशित समाचार के अनुसार साँची के चिंतन शिविर में मधयप्रदेश के एक मंत्री से सम्बंधित एक प्रकाशित खबर के बारे में जाँच करने का फैसला लिया गया था जिससे कि उसके गलत होने पर खण्डन जारी किया जा सके तथा सही होने पर संम्बंधित मंत्री के खिलाफ कार्यवाही की जा सके।

खबर यह थी कि एक मंत्री का स्कूल जाने वाला नौनिहाल अपने स्कूल बैग में एक एक हजार के नोटों की गिड्डियाँ लेकर गया और अपने सहपाठियों को दिखाने लगा पता चलने पर कक्षाधयापक ने इस छात्र से पूछा कि इतने सारे नोट वह कहाँ से लाया तो उसने उत्तर दिया कि 'अपने घर से। वहाँ बोरों में नोट रखे हैं सो उठा लाया। जब कक्षाधयापक ने मंत्रीपुत्र की तलाशी ली तो उसके पास हजार हजार के नोटों की तीन गिड्डियाँ अर्थात तीन लाख रूपये निकले। समझदार प्रधानाधयापक ने नोटों को एक स्कूल शिक्षक के साथ बंगले पर भेजा।

साँची शिविर को हुये लम्बा समय बीत जाने के बाद ना तो खबर का खंडन करने का साहस ही जुटाया जा सका और ना ही मंत्रीजी के खिलाफ कार्यवाही किये जाने का साहस ही जुटाया जा सका।इस ढीलमढाल अनुशासन के पीछे कारण यह माना जा रहा है कि सम्बंधित मंत्री भी कुछ गोपनीय दस्तावेज दावे बैठे हैं और कार्यवाही वाले दिन सब कुछ उजागर कर सकते हैं।दूसरा समाचार सर्वाधिक प्रसार का दावा करने वाले दैनिक भास्कर में छपा है जिसके अनुसार एक मंत्री के पुत्र और पुत्री एक ही कालेज में प्रवेश लिए हुये हैं व उनके आने जाने का समय भी एक ही है पर मंत्री जी के सुपुत्र और सुपुत्री अलग अलग गाड़ियों में स्कूल आते जाते हैं। चना चबेना खाकर देश सेवा का खोखला दावा करने वाली पार्टी के ऐसे चरित्र को देख कर मंत्रीजी के कार्यकर्ता भी दांतों तले उंगली दबाये रखते हैं।मंत्रिमंडल के एक युवा सदस्य की गत दिनों दुर्घटना में मृत्यु हो गयी थी पर मंत्रिमंडल के दूसरे सदस्य से उनके इतने अधिक नफरत के सम्बंध थे कि पूरे प्रदेश में यह आशंका व्यक्त की जा रही थी कि यह दुर्घटना की जगह किसी षड़यंत्र का परिणाम है। एक ही मंत्रीमंडल के दो सदस्यों के बीच ऐसी जानलेवा खुली दुश्मनी होने के जन विश्वास को बदलने का कभी कोई प्रयास नहीं हुआ। काँग्रेस के प्रवक्ता ने तो दुर्घटना की जॉच की मॉग तक कर डाली। वैसे तो भाजपा जनविश्वास पर बहुत तूल देती रही है। जब अयोधया में बाबरी मस्जिद स्थल पर ही राम के जन्म होने पर बहस में हारने की नौबत आ गयी थी तब आडवाणीजी ने कहा था कि हम नहीं कहते कि भगवान राम का जन्म इसी स्थल पर हुआ था पर लोगों का ऐसा विश्वास है इसलिए भव्य राम मंदिर का निर्माण इसी स्थान पर होना चाहिये। माननीय आडवाणीजी अब इस जनविश्वास का क्या करेंगे!

संघ के जाने माने स्वयंसेवक और पैरों में जूते न पहिनने वाले प्रदेश के गृहमंत्री को अपने इंदौर प्रवास के दौरान अपने प्रतीक्षारत कार्यकर्ताओं की जगह एक ऐसे उद्योगपति से मिलना अधिक रास आया जिस पर करोड़ों रूपयों के शेयर घोटालों के आरोप हें। जब निराश कार्यकर्ताओं ने इसकी शिकायत प्रदेश अधयक्ष नरेन्द्र सिंह तोमर से की तो उन्होंने सफाई दी कि अगर वह अपराधी है तो कानून अपना काम करेगा। पर क्या मधयप्रदेश में ऐसा साहसी कोई पुलिस अधिकारी बचा है जो उस आरोपी से पूछताछ कर सके जिससे मिलने प्रदेश का गृहमंत्री पार्टी काय्रकर्ताओं से मिलने के समय पर जा रहा हो!

दैनिक भास्कर में ही प्रकाशित एक समाचार के अनुसार मधयप्रदेश भारतीय जनता युवा मोर्चा के एक वरिष्ठ पदाधिकारी ने एक राष्ट्रीयकृत बैंक से लोन लिया था जिसकी किश्तें ना चुकाने पर उसकी कुर्की की नौबत आ गयी जिससे बचने के लिए उसने प्रापर्टी पर अपने नाम और भाजपा में मिले पद की तख्ती को प्रापर्टी पर लगा दी ताकि उज्जेन के सवरवाल काण्ड से भयभीत प्रदेश का कोई आदमी उसे खरीदने का दुस्साहस न करे। विधानसभा अधयक्ष ने उनके अपने ही जिले के मंत्री द्वारा मेडीकल कालेज में प्रवेश के सवाल पर धांधाली किये जाने का आरोप स्वयं लगाया था।पर बाद में सबने चुप्पी साघ ली थी।

भाजपा के थिंकटैंक रहे गोविन्दाचार्य से बेहतर भाजपा को कौन जान सकता है। उन्हीं गोविन्दाचार्य ने गत दिनों प्रकाशित अपनी पुस्तक 'लक्ष्य की ओर' में आरोप लगाया है कि भाजपा सत्ता प्राप्ति के लिए अपवित्र गठजोड़ करते हुये गिरोह में बदल गयी है तथा 1998 से लेकर 2004 में केन्द्र में शासन करने के बाद भी कोई बुनियादी परिवर्तन नहीं किया।

आज प्रदेश में जगह जगह भागवत कथाओं और अनेक तरह के धार्मिक आयोजनों की बाढ आ गयी है जो सारे आयोजन भाजपा नेताओं द्वारा प्रायोजित किये जा रहे हैं। कहीं कहीं कुछ गैर राजनीतिक लोगों को भी पदाधिकारी बना दिया जाता है पर कोषाधयक्ष और चन्दा वसूलने का काम भाजपा के कार्यकर्ताओं तक ही केन्द्रित रहता है ताकि वे चुनाव के लिए धान बचाने के साथ साथ लोगों से सम्पर्क करने और उनका मूड भांपने का काम कर सकें। स्मरणीय है कि गत दिनों खरगौन के लोकसभा उपचुनाव में भाजपा नेताओं व विधायकों को गाँव में घुसने ही नहीं दिया गया था इसलिए तोड़ के रूप में धार्मिक आयोजनों का सहारा लिया जा रहा है। पर अब समझदार लोग उन चन्दा याचकों से पूछ रहे हें कि गत चार साल में आपको जनता की याद नहीं आयी तो क्या भगवान की याद भी नहीं आयी। एक खिसयानी हुयी सी बेशरम मुस्कान के अलावा वे कोई उत्तर नहीं देते और उनके समर्थक जयकारा लगाने लगते हैं।

वीरेन्द्र जैन