संस्करण: 25फरवरी-2008

 ''रोकना होगा मिट्टी का विनाश''
    स्वाति शर्मा

दिन प्रति दिन बढ़ती जनसंख्या व घटते खाद्यान्न के अंतर को समाप्त करना वर्तमान समय की प्रमुख आवश्यकता है। यह कैसे होगा, इस पर अनेक प्रकार से विचार चल रहा है, परन्तु गौर करें तो पाएँगे कि सर्वप्रथम मिट्टी की उत्पादन क्षमता को बढ़ाना होगा। मिट्टी एक ऐसा बुनियादी साधान है जिसे खींचतान कर नहीं बढ़ाया जा सकता। सीमित भू-भाग से अधिक से अधिक फसलें लेने के कारण मिट्टी की उर्वरता में कमी आई है क्योंकि सघन खेती करते हुए हम मिट्टी को स्वत: प्राकृतिक रूप से उर्वरता प्राप्त करने का मौका ही नहीं दे रहे हैं। यही नहीं मिट्टी के क्षरण द्वारा होने वाली पोषक तत्वों की हानि को भी हम रोक नहीं पा रहे हैं।

मिट्टी को खींचतान कर फैलाया नहीं जा सकता। उपजाऊ मिट्टी की मात्र एक सेमी, मोटी ऊपर की परत बनाने में प्रकृति को लगभग 300 वर्ष लगते हैं जबकि हमारे यहाँ हर साल 600 करोड़ टन मिट्टी कटाव के कारण बह जाती है और उसके साथ ही बह कर चले जाते हैं लगभग 84 लाख टन पोषक तत्व। किसी भी देश की सुख-समृध्दि तथा विकास के लिए उस देश के मृदा और भूमि संसाधानों का अच्छा होना अत्यंत आवश्यक है। अपने देश में उत्पादक भूमि निरंतर कम हो रही है। भूमि की प्रति व्यक्ति उपलब्धाता सन् 1950 में 0.48 हेक्टेयर थी जो 2000 में घट कर 0.15 हेक्टेयर रह गई। यही नहीं जो भूमि उपलब्धा है उसका भी हर साल 16.35 टन प्रति हेक्टेयर की दर से कटाव होता जा रहा है। यह दर भूमि कटाव की 12.5 टन प्रति हेक्टेयर की अधिकतम उचित दर से काफ़ी ज्यादा है।

विश्व खाद्य एवं कृषि संगठन ने अनुमान लगाया है कि विश्व की लगभग 30-50 प्रतिशत जमीनें अनुचित प्रबंधा के कारण खराब हो चुकी हैं। खास तौर से पिछले 25 वर्षों में खेती के लिए जंगल साफ़ करने और खेती से ज्यादा पैदावार निचोड़ने के दोहरे लालच ने मिट्टी के कटाव से उत्पन्न पोषक तत्वों, सूक्ष्मजीवों की कमी की समस्या बढ़ा दी है। इस प्रकार हर वर्ष लगभग 60 लाख हेक्टेयर भूमि खेती के योग्य नहीं रहती। कुछ इलाकों में तो मिट्टी का कटाव इतना ज्यादा हो चुका है कि भारी खर्चा करने पर भी इन मिट्टियों में जान डालना मुश्किल है।

कितनी विडंबना है कि एक ओर तो उपजाऊ मिट्टी भू-क्षरण द्वारा नष्ट हो रही है, दूसरी ओर हम अपनी आवश्यकता के लिए मकान इसी उपजाऊ कृषि भूमि पर बनाते चले जा रहे हैं। इसी पर हमने सड़कों, रेल लाइनों, नहरों का जाल भी फैला रखा है। ऐसा अनुमान है कि हमारे यहाँ कुल कृषि योग्य क्षेत्र के 80 मिलियन हेक्टेयर की 6000 मिलियन टन मिट्टी हर वर्ष कटाव से नष्ट हो जाती है।नदियों में तलछट बढ़ने से बाढ़ की स्थिति बनती है और फिर मिट्टी के कटाव की स्थिति उत्पन्न होती है व खेती योग्य भूमि का नुकसान होता है।

बहुत अधिक भाग में लवण के जमाव, पानी जमा होने, खनन व औद्योगिक अपशिष्टों को जल स्रोतों में छोड़ने आदि के कारण भूमि में उर्वरता की कमी आना गंभीर चिंता का विषय बन चुका है। प्रतिवर्ष खनन के कारण लगभग 1400 हेक्टेयर भूमि का नुकसान होता है। कटाव का शिकार होने वाली भूमि में 53.7 लाख से 84 लाख टन तक प्रमुख पोषक तत्वों की हानि हो जाती है। सब प्रकार की भूमियों में कुल मिलाकर प्रतिवर्ष 3 करोड़ से 5 करोड़ टन का मृदा क्षरण होता है।

निरंतर बढ़ती हुई जनसंख्या को देखते हुए इन बेकार पड़ी भूमियों के सुधार की आवश्यकता है। तभी हम बढ़ते मुँह और घटते भोजन की खाई को पाट सकेंगे। यदि भूमि की ठीक प्रकार से देखभाल की जाए और हम उसके पोषक तत्व बढ़ाते रहें तो यह भूमि हम सबके लिए पर्याप्त अन्न उपजा सकती है। अत: सामाजिक आर्थिक परिवर्तन के साथ-साथ पर्यावरण के महत्वपूर्ण पहलुओं पर धयान देना होगा और इस दिशा में बंजर भूमि  सुधार का काम शुरू करने में सरकारी मदद का इंतजार किए बगैर किसानों को खुद पहल करनी होगी। भूमि में लवणों की अतिरिक्त मात्रा को बरसात के पानी से धो सकते हैं। कम उर्वरक भूमि में पर्याप्त कार्बनिक पदार्थ मिला कर व उपयुक्त फसलों तथा पौधां को उगा कर उपजाऊ भूमि में बदला जा सकता है।

केन्द्र एवं राज्य की योजनाओं के तहत बंजर भूमि विकास का लक्ष्य प्रतिवर्ष वित्तीय उपलब्धाता के आधाार पर निधर्रित किया जाता है। बंजर भूमि को कृषि योग्य बनाने के उद्देश्य से 1985 में राष्ट्रीय बंजर भूमि विकास बोर्ड की स्थापना की गई, जो वृक्षारोपण के कार्यक्रम भी चलाता है।

भूमि की उत्पादन क्षमता बनाए रखने के लिए सघन खेती द्वारा अधिक अन्न उपजाने की लालसा का त्याग करना होगा। जहाँ तक हो सके मिट्टी के लिए आवश्यक आवरण पेड़-पौधो, वनस्पतियाँ आदि नष्ट न करें। साथ ही चारागाहों की अंधाधुध चराई पर प्रतिबंधा लगाएँ ताकि भू-क्षरण कम से कम हो। जहाँ तक संभव हो हम मिट्टी में जल-भराव की स्थिति उत्पन्न न होने दें। रासायनिक उर्वरकों का कम से कम प्रयोग किया जाए। इस प्रकार यह निष्कर्ष निकलता है कि हम मिट्टी की समस्याओं को समझने का प्रयास करें तथा उपर्युक्त उपायों द्वारा उन्हें दूर करने का प्रयास करें, तभी यह धारती हम सभी का पेट भरने हेतु पर्याप्त अन्न उपजा सकेगी।

स्वाति शर्मा