संस्करण: 25फरवरी-2008

 अमेरिकी चुनाव : मुद्दे क्या हैं ?
   अशोक कुमार पाण्डेय

     चुनाव विशेषज्ञों की उम्मीदों के विपरीत महामंगलवार भी अमेरिकी चुनाव की तस्वीर स्पष्ट नहीं कर पाया। जहां रिपब्लिकन पार्टी के उम्मीदवारों में जॉन मैकेनन अपने दोनों प्रतिद्वन्द्वियों मिट् रोमनी और पादरी माईकल हक्काबी पर स्पष्ट बढ़त लेने में कामयाब रहें वही डेमोक्रेटिक पार्टी के उम्मीदवारों बरॉक ओबामा और हिलेरी रोधाम क्लिंण्टन में श्रेष्ठता की जंग अब भी जारी हैं। महामंगलवार के चुनावी समर में जहाँ ओबामा ज्यादा प्राथमिक मत प्राप्त करने में सफल रहे वहीं हिलेरी केलिफोर्निया, न्यूजर्सी और न्यूयार्क जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में बढ़त बनाने में सफल रहीं। अब यह तो भविष्य ही बतायेगा कि विश्व के सबसे ताकतवर देश के राष्ट्रपति का ताज कौन पहनेगा लेकिन अब तक के रूझानों से इतना तो काफी विश्वास के साथ कहा जा सकता है कि अमेरिकी बहुमत इस बार डेमोक्रेटिक पार्टी के साथ है यानि अमेरिका का अगला राष्ट्रपति बरॉक ओबामा या हिलेरी क्लिण्टन में से ही कोई होगा। लेकिन यहां प्रश्न यह उठता है कि क्या एक ही पार्टी के इन दो उम्मीदवारों के बीच लड़ाई सिर्फ़ व्यक्तित्वों की है या फिर व्यापक मतैक्य के बावजूद इनके बीच महत्वपूर्ण राष्ट्रीय तथा अंर्तराष्ट्रीय मुद्दों पर वास्तविक मतभेद भी है अगर पिछले दिनों इनके द्वारा दिये गये वक्तव्यों तथा सीनेटर के रूप में इनके कदमों की विवेचना करें तो यह स्पष्ट हो जाता है कि मीडिया द्वारा इस चुनाव को व्यक्तित्वों की टकराहट के रूप में पेश किये जाने के बावज़ूद ये चुनाव ओबामा की व्यंग्योक्तियों और हिलेरी के आंसुओं से कहीं आगे और दरअसल अमेरिका तथा विश्व राजनीति में इसके स्थान के संदर्भ में दो भिन्न दृष्टिकोण के बीच टकराव हैं।

अगर शुरूआत ओबामा से करें तो श्रीमती क्लिण्टन के 'गंभीर मुद्दों पर स्पष्ट विचार न रखने के आरोपों के बावजूद अपने भाषणों में वह अपनी स्थिति पूरी तरह से स्पष्ट कर देते हैं। अपने भाषणों का आरम्भ वह' देश युध्द में उलझा है और धारती नष्ट हो रही है' से करते हैं और इस प्रकार वह अपनी प्राथमिकतायें साफ कर देते है-इराक युध्द का विरोध और पर्यावरणीय खतरों के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण। दरअसल इराक युध्द का सीधा और समझौताहीन विरोधा ओबामा और क्लिण्टन के बीच सबसे बड़ी विभाजक रेखा है। चुनावी भाषणों से बहुत पहले अक्टूबर-2002 में, जब ओबामा मात्र एक साधारण विभाजक ही थे, उन्होंने इलिनॉयस में युध्दविरोधी रैली में सक्रिय भागीदारी की थी। जबकि लगभग उसी समय एक सीनेट के रूप में श्रीमती क्लिण्टन ने इराक में सेना भेजे जाने को वैधाता प्रदान करने वाले प्रस्ताव के पक्ष में मतदान किया था। जहां हिलेरी इस युध्द को अमेरिकी हितों के अनुरूप बताती थीं वहीं ओबामा ने इसे 'क्रूर तथा निरर्थक' बताते हुये इसका कड़ा विरोधा किया था। और आज पांच वर्षों के बाद भी ओबामा की स्थिति में कोई मौलिक परिवर्तन नहीं आया है। ओबामा ने अपने चुनावी घोषण्-पत्र में इराक से अमेरिकी सेनाओं की पूरी तरह वापसी तथा बगदाद स्थित दूतावास की सुरक्षा के अलावा किसी दूसरे कार्य हेतु सेनाओं का स्थायी आधार न बनाने का वादा किया है। साथ ही इराक के पड़ोसियों खासतौर पर इरान और सीरिया से बातचीत की प्रक्रिया का आरंभ करने की बात भी की गई है। ओबामा कहते हैं 'मज़बूत देश अपने मित्रों तथा शत्रुओं दोनो से बात करते है।' इस तर्क को आगे बढ़ाते हुये वह बुश के दो कट्टर विरोधायों वेनेजुएला के हयूगो शावेज तथा क्यूबा के फिडेल कास्त्रों से बातचीत करने के लिये भी तैयार हैं। यही नहीं, ओबामा अपनी क्रूरता के लिये कुख्यात ग्वाण्टामओ खाड़ी के यातनागृहों को बंद करने तथा ऐसा कानून बनाने का भी वादा करते हैं जिससे किसी को भी मात्र संदेह के आधार पर गिरफ्तार न किया जा सके। 'आतंक के विरूध्द युध्द' के नाम पर मानव अधिकारों की अवहेलना के प्रति उनकी चिंता अंर्तराष्ट्रीय परिपेक्ष्य में उनकी नई विश्वदृष्टि की स्पष्ट परिचायक है। ओबामा का यह कहना कि ''हम केवल युध्द नहीं बल्कि युध्द छेड़ने वाली मानसिकता को समाप्त करना चाहते हैं।' शांति के प्रति उनकी प्रतिबध्दता तथा बुश प्रशासन की युध्दोनमादी नीतियों से स्पष्ट सम्बंधा विच्छेद का परिचायक है।

ओबामा सिर्फ नीतिगत अनुशंषाये ही नहीं करते वह इनके लिए वास्तविक समाधानों के रूप में मधयपूर्व के तेल भण्डारों के वर्चस्व की लड़ाई से हाथ खींचकर 'हरे ऊर्जा स्रोतों' के अधिकाधिक प्रयोग की भी बात करते हैं।

राष्ट्रीय स्तर पर ओबामा शिक्षकों के वेतन बढ़ाने और छात्रों तथा सेवानिवृत्त सैनिकों के लिये बेहतर सुविधाओं का समर्थन करते हैं। इस संबंध में उनकी प्राथमिकतायें और स्पष्ट हो जाती हैं।जब वह कहते हैं कि 'यह वित्तीय अराजकता है कि एक सीईओ दस मिनट में उतना कमाता है जितना लोग वर्ष भर में नहीं कमा पाते।' साथ ही वह सामाजिक सुरक्षा योजनाओं के लिये पूंजीपतियों पर ज्यादा करारोपण करने का भी वायदा करते हैं।

लेकिन यहाँ इन सभी मुद्दों पर ओबामा की अधिक मुखरता के बावज़ूद दोनों रिपब्लिक उम्मीदवारों के विचार कमोबेश एक जैसे हैं वही स्वास्थ्य सुविधाओं के मुद्दे पर दोनों में गंभीर मतभेद हैं। जहां हिलेरी ऐसा कानून बनाने की बात करती हैं जिससे सभी अमेरिका वासियों को स्वास्थ्य बीमा योजना के तहत लाया जा सके ओबामा ऐसे किसी प्रत्यक्ष कदम की जगह आय का पुनर्वितरण इस रूप में करना चाहते हैं जिससे हर व्यक्ति इस सुविधाओं का लाभ उठा पाने में समर्थ हो सके।

लेकिन वास्तविक नीतिगत अन्तर डेमोक्रेटिक उम्मीदवारों से नज़र आता है। जहाँ हक्काबी इराक में अमेरीकी उपस्थिति का समर्थन करते हैं वहीं रोम्नी गवाण्टामाओं की क्षमता दूनी करने का वायदा करते हैं। मैक्केन इतने कड़े शब्दों का प्रयोग न करते हुये भी इराकी युध्द से पूरी तरह सहमत हैं। पर्यावरण के मुद्दे पर भी डेमोक्रेटिक उम्मीदवार बुश की तरह ही इसे विशेष महत्व नहीं देते और सामाजिक सुरक्षा के खर्चो को तो फिजूलखर्ची बताकर खारिज करते हैं।

इसीलिये स्पष्ट है कि बुश-गोर चुनाव से बिल्कुल अलग इस बार के अमेरिकी चुनाव केवल व्यक्तियों की टकराहट नहीं है। इनके परिणाम न केवल अमेरीकी अपितु पूरी दुनिया को दूरगामी रूप से प्रभावित करेंगे। देखना यह है कि अमेरिकी जनता क्या चाहती है-एक अधिक शांतिप्रिय और कल्याणकारी सरकार या फिर बुश का ही एक और अवतार।

अशोक कुमार पाण्डेय