संस्करण: 25फरवरी-2008

प्रत्यक्ष कृषि ऋण बढ़ाने की ज़रूरत
  अखिलेश सोलंकी

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने किसानों पर कर्ज़ के बोझ को लेकर एक बार फिर चिंता ज़ाहिर की हैं। पिछले दिनों फिक्की की सालाना आम बैठक को संबोधित करते हुए उन्होंने यह भी कहा कि उनकी सरकार जल्द ही किसानों को ऋणग्रस्तता से उबारने के लिए एक पैकेज लाएगी। महीने भर पहले यू.पी.ए. सरकार ने इकतीस जिलों के किसानों पर एक जुलाई 2006 से बकाया ब्याज़ माफ करने का फैसला किया था। उम्मीद की जा सकती है कि संभावित पैकेज किसानों को राहत देने की दिशा में एक और महत्वपूर्ण कदम साबित होगा। लेकिन सवाल है कि इससे खेती की दशा में कितना सुधार होगा।

तीन साल पहले केन्द्र सरकार ने हर साल कृषि ऋण में तीस फीसद की बढ़ोत्तरी करते हुए इसे दोगुना करने का लक्ष्य तय किया था। हालिया आंकड़ों के मुताबिक इस लक्ष्य का लगभग पा लिया गया है। लेकिन अब भी कृषि की तस्वीर वैसी ही है और थोड़ी कमी आने के बावज़ूद किसानों की खुदकुशी का सिलसिला बदस्तूर जारी है।

इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि खेती अरसे से घाटे का धांधा बनी हुई है। उपज का लाभकारी मूल्य अक्सर नहीं मिल पाता, कई बार लागत भी नहीं निकल पाती। नतीजतन, कृषि के प्रति लोगों का आकर्षण लगातार कम हो रहा है। इसमें लगे ज्यादातर लोग मज़बूरी में ही इससे चिपके हुए हैं। जिस क्षेत्र से देश की दो तिहाई आबादी आजीविका पाती हो, उसकी यह दशा हमारी राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था का सबसे चिंताजनक पहलू है। खेतिहर परिवारों के भविष्य के साथ ही हमारी खाद्य सुरक्षा के लिहाज से भी इस पर विचार किया जाना चाहिए।

सत्ता में बैठे लोगों और योजनाकारों की चिंता कृषि की विकास दर को लेकर ज़रूर सामने आती रहती है लेकिन किसानों को उनकी पैदावार का न्यायसंगत मूल्य कैसे मिले, यह उनकी प्राथमिकताओं में नहीं है। कृषि में निवेश बढ़ाने की बात भी वे करते हैं।प्रधानमंत्री ने खुद स्वीकार किया है कि नब्बे के दशक के मधय से लेकर एक दशक तक कृषि क्षेत्र के निवेश में गिरावट दर्ज हुई है। अगर इसकी तह में जाएं तो यह साफ़ हो जाएगा कि यह उदारीकरण की नीतियों का ही असर था कि बैंकों के कुल ऋणों में कृषि ऋण का हिस्सा कम होता गया।

कृषि ऋण को आमतौर पर दो हिस्सों में बांटा जाता है प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष। प्रत्यक्ष कृषि ऋण उसे कहते हैं जो किसानों को सीधो मिलता है। अप्रत्यक्ष ऋण कृषि क्षेत्र की मदद के नाम पर खाद-बीज आदि के व्यापारियों और बिजली बोर्डों आदि को दिया जाता है। यह धयान देने वाली बात है कि किसानों के प्रत्यक्ष ऋण में तो कमी आती गई लेकिन अप्रत्यक्ष ऋण में लगातार इजाफा हुआ है। जाहिर है, कृषि ऋण के कुल आंकड़ों से असलियत का पता नहीं चलता।प्रधानमंत्री से लेकर वित्त मंत्रालय और योजना आयोग सब कृषि ऋण के प्रवाह को बढ़ाना चाहते हैं और बैंकों से कृषि ऋण का लक्ष्य बढ़ाने को कहा जा रहा है। कम से कम सार्वजनिक बैंकों ने इस दिशा में सक्रियता दिखाई भी है। लेकिन सवाल है कि इसका लाभ क्या वास्तविक ज़रूरतमंदों को मिल पा रहा है ?

गौरतलब है कि रिजर्व बैंक ने कृषि ऋण की सीमा को बढ़ाकर एक करोड़ रुपए तक कर दिया है। ज़ाहिर है, उसके इस कदम का फायदा किसानों को नहीं बल्कि व्यापारियों, बिचौलियों और कंपनियों को मिल सकता था और यही हो रहा है। लिहाजा, कृषि क्षेत्र में ऋण प्रवाह बढ़ाना काफ़ी नहीं है, सरकार को यह भी देखना चाहिए कि उसका लाभ किन लोगों को मिल रहा है। साथ ही यह भी कि और कदम क्या हो सकते हैं जिनसे खेती की तस्वीर को सुधारा जा सके और किसानों की हालत बेहतर हो।

आम लोग जो महज पांच से छह हजार रुपए कमाते हैं, उनके लिए मुख्य मुद्दा रोटी, दाल, चावल सब्जी आदि की आपूर्ति का है। इस काम के आदमी को आयकर, शेयर बाज़ार कंपनियों के गठजोड़, नैनो कार आदि से कोई खास मतलब नहीं है। आटा अगर 16 से 20 रु. किलो है और लहसुन 150 रु. किलो है तो आम आदमी चटनी-रोटी से भी गया। लोगों की रोजमर्रा के उपयोग की वस्तुएं मूल रूप से कृषि क्षेत्र से जुड़ी हुई होती हैं। ऐसे में अगर किसानों और कृषि क्षेत्र की स्थिति अच्छी होगी तो स्वत: ही आम लोगों की स्थिति सुधारेगी।

कृषि क्षेत्र से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तौर पर लगभग 70 फीसदी लोग जुड़े हुए हैं। इसमें 84 फीसद सीमांत किसान हैं जिनकी खेती मुनाफे की नहीं होती है। एक तरफ महंगाई की मार तो दूसरी तरफ कर्ज का बोझ किसानों पर भारी पड़ रहा है। कृषि क्षेत्र के 3.8 फीसद की गति से बढ़ने की उम्मीद व्यक्त की गई है। लेकिन सुनिश्चित करना होगा की किसान को खुदकुशी करने पर मज़बूर न होना पड़े और वह सम्मान की जिंदगी जी सके।

अखिलेश सोलंकी