संस्करण: 25 अगस्त- 2014

आई.एस. और भारतीय मुसलमान

? जावेद अनीस

                दुनिया के सब से प्राचीन सभ्यताओं में से एक ईराक आज अपने अस्तित्व के लिए जूझ रहा है, पुराने समय में मेसोपोटामिया सभ्यता के नाम से विख्यात यह मुल्क शिक्षा, व्यापार, तकनीक, सामाजिक विकास, संस्कृति को लेकर काफी समृध्द रहा है लेकिन पिछली सदी के आखिरी दशक में इस प्राचीन सभ्यता को आधुनिक महाशक्तियों की नजर लग गयी,जिसकी वजह बना ''ईराक धरती में दफन तेल''।

                अमरीका और उसके साथी देशों द्वारा ईराक के तत्कालीन सद्दाम सरकार के पास खतरनाक जैविक हथियारों के होने का बहाना बना कर हमला किया गया था,ईराक में खतरनाक जैविक हथियार तो मिले नहीं स्थिर ईराक आईएस जैसे बर्बर और घोर अतिवादी संगठन के चुंगल में फंस कर बर्बर मध्ययुग के दौर में पहुँच गया दिखाई पड़ता है।

                गौरतलब है कि अपने आप को दुनिया भर में लोकतंत्र के सबसे बड़े रखवाले के तौर पर पेश करने वाले पश्चिमी मुल्कों ने अपने हितों के खातिर सिलसिलेवार तरीके से एक के बाद एक इराक में सद्दाम हुसैन, इजिप्ट में हुस्नी मुबारक और लीबिया में कर्नल गद्दाफी आदि को उनकी सत्ता से बेदखल किया है,इन हुक्मरानों का आचरण परम्परागत तौर पर सेक्यूलर रहा है। आज यह सभी मुल्क भयानक खून- खराबे और अस्थिरता के दौर से गुजर रहे हैं और अब वहां धार्मिक चरमपंथियों का बोल बाला है, ''इस्लामिक स्टेट'' भी इसी की देन है। 

       इस्लामिक स्टेट इराक और सीरिया के एक बड़े हिस्से पर अपना कब्जा जमा चूका है, उनका मकसद चौदहवी सदी के सामाजिक-राजनीतिक प्रारुप को फिर से लागू करना हैं, जहाँ असहमतियों की कोई जगह नहीं है, उनकी सोच है कि या तो आप उनकी तरह बन जाओ नहीं तो आप का सफाया कर दिया जायेगा।

              धर्म के नाम पर अपनी गतिविधियाँ चलने वाले इस्लामिक स्टेट ने इन्टरनेट पर पांच मिनट का दिल दहला देने वाला वीडियो जारी किया, इस वीडियो में एक नकाबपोश आतंकी अमेरिकी पत्रकार जेम्स राइट फोलेय की गर्दन चाकू से काटकर उनकी बेरहमी से हत्या कर रहा है।

               इससे पहले भी पूरी दुनिया इराक में आईएस आतंकियों द्वारा जातीय अल्पसंख्यक यजीदी समुदाय का बड़े पैमाने पर किये जा रहे जनसंहार को देख और सुन रही थी, बर्बरता की दास्तानें रोंगटे खड़ी कर देने वाली हैं,यजीदी समुदाय की महिलाओं और बच्चों को जिंदा दफन किया जा रहा है, महिलाओं को गुलाम बनाया गया है। गैर-सुन्नी मुसलमानों के खिलाफ भी यही बर्ताव किया जा रहा है, एकांगी इस्लाम में विश्वास करने वाले इस्लामिक स्टेट के चरमपंथी कब्रों और मकबरों को इस्लाम के खिलाफ मानते हैं। इसलिए वे पागलपन की हद को पार करते हुए गैर-सुन्नी मुसलामनों के एतिहासिक धार्मिक स्थलों को तबाह कर रहे है, उनकी सोच कितनी छोटी है इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने एक आदेश जारी किया है कि दुकानों पर लगे हुए सभी बुतों के चेहरे ढके हुए होने चाहिए। यही नहीं उन्होंने सीरिया के एक शहर में रसायन शास्त्र व दर्शन शास्त्र की पढ़ाई पर रोक लगाते हुए इन्हें 'गैर- इस्लामिक' घोषित कर दिया है।

               इस बीच आईएसआईएस के गठन में सीआईए और मोसाद जैसी खुफिया एजेंसियों की सक्रिय भूमिका की खबरें भी आयी हैं।

                अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए के पूर्व अधिकारी एडवर्ड इस्नोडन ने खुलासा किया है कि इस्लामिक स्टेट का मुखिया अबू बकर अलबगदादी अमेरिका और इसराइल का एजेंट है और उसे इसराइल में प्रशिक्षण प्रदान किया गया। एडवर्ड के अनुसार सीआईए ने ब्रिटेन और इजरायल के खुफिया एजेंसियों के साथ मिल कर इस्लामिक स्टेट जैसा  जिहादी संगठन बनाया है जो दुनिया भर के चरमपंथियों को आकर्षित कर सके,इस  नीति को 'द हारनीटज नीसट' का नाम दिया गया, अमरीका के पुराने इतिहास को देखते हुए एडवर्ड इस्नोडन  के इस खुलासे को झुठलाया भी नहीं जा सकता है, आखिरकार यह अमरीका ही तो था जिसने अफगानिस्तान में मुजाहिदीनों की मदद की थी, जिससे आगे चल कर अल-कायदा का जन्म हुआ था। अमरीका के सहयोगी खाड़ी देशों पर आईएस की मदद करने के आरोप हैं, साथ ही इस संगठन के पास इतने आधुनिक हथियार कहां से आये इसको लेकर भी सवाल है ?

          इस्लामिक स्टेट का मंसूबा है कि 15वीं सदी में दुनिया के जितने हिस्से पर मुसलमानों का राज था, वह दोबारा वहाबी हुकूमत कायम हो, शायद इसी वजह से इस्लामिक स्टेट ने खिलाफत का ऐलान करते हुए अपने नेता अबु अल बगदादी को पूरी दुनिया के मुसलमानों का खलीफा घोषित कर दिया है और स्वयम्भू खलीफा ने दुनिया भर के मुसलमानों से एकजुट हो कर कई देशों के खिलाफ जिहाद छेड़ने की अपील जारी की है,जिसमें भारत भी शामिल है। यह सर्वादित है कि दुनिया भर के मुस्लिम बाहुल्य देशों में ऐसे लोगों की कमी नहीं है, जो एकछत्र इस्लामी राज्य की कल्पना करते हैं।

                   भारत के सम्बन्ध में बात करें तो यहाँ भी कुछ चुनिन्दा चौकाने वाली घटनायें हुई हैं, पिछले दिनों नदवा जैसी विश्वविखयत शिक्षा केंद्र के एक अध्यापक सलमान नदवी द्वारा आई एस आई एस के सरगना अबूबकर बगदादी को एक खत लिख कर उसकी हुकूमत को बधाई देने की बात सामने आई है, उन्होंने लिखा है कि आप जो भूमिका निभा रहे हैं उसको सभी ने स्वीकार किया है और आप को अमीर उल मोमेनीन (खलीफा) मान लिया है, सलमान नदवी विश्वविख्यत इस्लामी विद्वान् स्वर्गीय मौलाना अबुल हसन नदवी उर्फ अली मियां के नाती हैं। इसी तरह से महाराष्ट्र के चार युवा जो की पढ़े लिखे प्रोफेशनल है जिहादियीं का साथ देने इराक चले गये है, तमिलनाडु में मुस्लिम युवाओं द्वारा जो इस्लामिक स्टेट के चिन्हो वाली टीशर्ट बांटे जाने की खबर भी सामने आई है, इस्लामिक स्टेट द्वारा बंधक  बनायी गयी नर्सों के सकुशल  वापस लौटने के बाद सोशल मीडिया पर इस्लामिक स्टेट के तारीफ में पोस्ट और फोटो शेयर किये जा रहे थे जो नर्सों के इन बयानों पर आधारित थे कि जिहादियों द्वारा  उनके साथ बहन जैसा सलूक किया गया है। कुछ मुस्लिम समूहों ने इस्लामिक स्टेट के गतिविधियों का सावर्जनिक विरोध भी किया है, लेकिन जिहादियों का साथ देने के लिए ईराक जाना और अबूबकर बगदादी को खत लिखना चिंता के सबब है । भारत का इस्लाम उदार है ,और इसमें  भारत के स्थानियता (लोकेलिटी ) समाहित है, भारत में  सूफी संतों की वजह से इस्लाम की एक रहस्यमयी और सहनशील धारा सामने आई जो  एकांकी नहीं है । सूफियों संतों ने दोनों धर्मों की कट्टरता को नकारा  और सभी  मतों, पंथों से परम्पराओं और विचारों को ग्रहण किया। उन्होंने हिन्दू और मुसलमानों को सहनशीलता, एक दूसरे के धर्म का आदर करना  और साथ रहना  सिखाया, और यही असली भारतीयता है । दोनों तरफ से लाख कोशिशों के बावजूद यहाँ की हिन्दू दृमुस्लिम जनता एक साथ अपने सूफी दृ संतो की दरगाहों पर बड़े अकीदत से जाती है और उनके  सम्मोहित कर देने वाले  गीतों को पसंद करती है, लेकिन पिछले कुछ दशकों से  भारत में इस्लाम के ''अरबीकरन'' और सनातन धर्म का ''हिन्दुत्वकरण'' करने का प्रयास किया जा रहा है । नयी सरकार बनने के बाद से संघ परिवार लगातार यह सुरसुरी छोड़ रहा है कि भारत हिन्दू राष्ट्र है, यहाँ के रहने वाले सभी लोग हिन्दू है और अकेली हिन्दुत्व ही हमारी पहचान है। दरअसल दोनों ही धारायें अतिवादी है और इनके विचार देश के भविष्य के लिए मुफीद नहीं है यह विचार न केवल  हमारे संविधान का उलंघन है बल्कि हमारे देश की बहुलतावादी स्वरूप और मिली जुली भारतीय संस्कृति से भी मेल नहीं खाते है ।

? जावेद अनीस