संस्करण: 25 अगस्त- 2014

प्राचीरों पर चढ़े, दिल से उतरे

? विवेकानंद

         15 अगस्त को नरेंद्र मोदी की वह ख्वाहिश पूरी हो गई, जो पिछले करीब एक साल या यूं कहें कि जबसे मीडिया ने उन्हें बीजेपी की ओर से बतौर पीएम कैंडीडेट प्रचारित करना शुरू किया था,हिलोरें ले रही थी। निर्विवाद रूप से मोदी ने इसके लिए अथक मेहनत की। अपने भाषणों में अच्छा-बुरा,सच-झूठ का ऐसा मिश्रण तैयार किया कि जनता चकरघिन्नी हो गई। चौतरफा मोदी ही मोदी दिखाई देने लगे। वाक कला में उनकी विलक्षण निपुणता काम आई और जनता ने सत्ता उन्हें सौंप दी। और फिर वह मौका भी आ गया जब मोदी को लालन कालेज या नकली लालकिले से बोलकर आत्मसंतुष्टि नहीं करनी थी, वे असली लालकिले पर थे।

                 मोदी जब लालकिले पर चढ़ रहे थे तब जनता की उम्मीदों का ज्वार भी चढ़ रहा था। लेकिन महज एक डेढ़ घंटे में वह उतर गया। शेष रहा तो सिर्फ मोदी की वाकपटुता,उसमें कोई परिवर्तन नहीं आया। मोदी ने तमाम मुद्दों पर बात की लेकिन उन मुद्दों पर मौन साध गए,जिन पर लोगों की भावनाओं को भड़काकर वोट मांगा था। बलात्कार, भ्रष्टाचार, रोजगार, आतंकवाद पर लालकिले से मोदी का बोल नहीं फूटा, जबकि चुनावी सभाओं में वे इन्हीं मुद्दों पर धमाके किया करते थे। जाहिर है यह बात जनता को समझ नहीं आई। बातों में आप अगले 10नहीं 100साल का विजन दिखा दीजिए,क्या फर्क पड़ेगा यदि बुनियादी समस्याएं जस की तस रहीं?मोदी के पहले भाषण में यही अहसास हुआ कि उन्होंने उन बुनियादी समस्याओं पर अपने 10 साल के विजन का पर्दा डालकर जनता को भ्रमित करने का प्रयास किया है। मोदी चुनाव प्रचार के दौरान कहते थे कांग्रेस के 60 साल के शासन के बदले मुझे 60 महीने चाहिए। लेकिन स्वतंत्रता दिवस के भाषण में उन्होंने 10 साल का प्लान पेश किया। यानि अब उन्हें 10 साल चाहिए। इससे ज्यादा भी हो सकते हैं।

                चुनाव प्रचार में मोदी नारा लगाते थे अच्छे दिन आएंगे। लेकिन लालकिले की प्रचीर से नहीं बताया कि अच्छे दिन कब आएंगे। चुनाव से पहले मोदी कहते थे कि अपनी बेटी को दिल्ली मत भेजना वहां मनमोहन सिंह बैठे हैं। तब देश में हो रहे बलात्कारों के लिए सिर्फ और सिर्फ यूपीए सरकार जिम्मेदार नजर आती थी। दावा था कि मैं आऊंगा तो सब ठीक कर दूंगा। लेकिन महज 80 दिन में भाषा बदल गईं, विचार बदल गए। अब मोदी जी लालकिले के कंगूरे से ऐसी ही कुछ समस्याओं के लिए सरकार की बजाए समाज को दोषी ठहराते हैं। वे कहते हैं कि बेटी से तो सैकेड़ों सवाल मां, बाप पूछते हैं, क्या कभी मां, बाप ने अपने बेटों से पूछने की हिम्मत की है। आखिर बलात्कार करने वाला किसी न किसी का बेटा तो है। निश्चित रूप से मोदी सही कह रहे हैं, माता पिता को ही अपने बेटों पर लगाम लगानी होगी जो कानून से कहीं ज्यादा कारगर और सख्त हो सकती है। लेकिन मोदी को और बीजेपी को यह सही बात तब याद नहीं आई जब संसद में इस मामले पर बहस हो रही थी। तब नहीं आई जब मोदी जी ने बेहद ओछे शब्द मनमोहन सिंह के लिए इस्तेमाल किए थे। तब तो दावा यह था कि बस राजनीतिक पार्टी के बदल जाने से भारत बदल जाएगा।

               महंगाई जिसको लेकर मोदी चुनाव में ऐसा दृश्य खड़ा करते थे मानो हजारों लोग आज ही महंगाई के कारण दमतोड़ देंगे। लालकिले से उनके वे शब्द दमतोड़ गए। महंगाई यथावत है। आतंकवाद और सीमाओं पर पड़ोसी राज्यों की घुसपैठ को लेकर तो बीजेपी ने विपक्ष में रहते वक्त तत्कालीन भारत सरकार को अब तक की सबसे कमजोर सरकार करार दिया था। किसी पिद्दी से देश के सामने अपनी सरकार को सिर्फ इसलिए नीचा दिखाने का प्रयास करना, कि ऐसा करने से जनता आपसे प्रभावित होगी और इससे सत्ता पाने में मदद मिलेगी, जनता से इससे बड़ा धोखा और कोई नहीं हो सकता। लेकिन राजनीतिक फायदे के लिए मोदी ने यह सब किया। पर जब वे खुद लालकिले पर चढ़े तो आतंकवाद और पड़ोसियों की हरकत पर मौन साध गए। लालकिले से मोदी ने पाकिस्तान को नहीं ललकार, चीन को चुनौती नहीं दी। उल्टा पाकिस्तान धमका रहा है कि कश्मीर भारत का नहीं और हम भारत के गुलाम नहीं, हम जो चाहे करेंगे। जनता को समझ नहीं आ रहा है कि 80 दिन में 57 बार सीमा पर गोलीबारी हो रही है और मोदी मौन क्यों हैं? कश्मीर से अलगावादी नेता आते हैं, पाकिस्तानी उच्चायुक्त से मिलते हैं और सीना ठोककर कहते हैं कि कश्मीर पर हमको छोड़कर चर्चा नहीं हो सकती और मोदी सरकार सचिव स्तर की वार्ता रद्द करके अपने आप को तीरंदाज साबित करने में जुटी है। क्या फर्क पड़ेगा सचिव स्तर की वार्ता रद्द करने से। वे तेवर कहां गए जो विपक्ष में रहते वक्त हुआ करते थे?

                 भ्रष्टाचार को लेकर भी मोदी चुनावों में खासे मुखर रहे हैं। लेकिन लालकिले पर मोदी की बोलती इस मामले में बंद थी। उन्होंने नहीं बताया कि भ्रष्ट्राचार कैसे खत्म होगा, संसद के दोनों सदनों में जनलोकपाल बिल पास हो गया है कि लेकिन अभी तक गठन की प्रक्रिया पर कोई कदम नहीं उठाया गया है। जाहिर है मोदी वैसे कतई नहीं है जैसा कि उन्हें प्रचारित किया गया है या किया जाता है। मोदी विशुध्द अवसरवादी आदमी हैं और लोगों को भ्रमित करना जानते हैं। चुनाव से पहले भी वे बड़े ही नाटकी अंदाज में खुद को देश के चौकीदार के रूप में चुनने की अपील कर रहे थे और लाल किले से भी उन्होंने खुद को प्रधान सेवक कहकर जनता को भावनात्मक रूप से छूने का प्रयास किया। चुनाव के दौरान बार-बार अपनी गरीबी का जिक्र करते और लालकिले से भी अपनी गरीब और ग्रामीण पृष्ठभूमि का जिक्र करते हुए खुद को दिल्ली के लिए अजनबी बताकर नाटक करते रहे।

? विवेकानंद