संस्करण: 25 जनवरी-2010

नकली नोट के प्रचलन
पर कैसे लगे लगाम

 

शब्बीर कादरी

साल 2009 के अंतिम दिन नकली नोट का एक मामला भोपाल में फिर उजागर हुआ, इस तरह के मामले राजधानी में पूर्व में भी सामने आते रहे हैं और सच यह भी है कि आए दिन प्रकाशित होने वाली इन खबरों से अब किसी को कोई फर्क भी नहीं पड़ता क्योंकि इस तरह की घटनाएं नित्य ही देश के अधिसंख्य राज्यों से आती रही हैं।
नकली नोट का कारोबार दरअसल आर्थिक आतंकवाद का वह जाल है जो भारत के शत्रुओं द्वारा सीमापार से इस आशय से फैलाया जाता है कि देश के आर्थिक ढांचे पर उसका कुप्रभाव पड़े। नकली नोटों का कारोबार पिछले कुछ वर्षों में किस तेजी से फैला है, यह सरकार के आंकड़े खुद उजागर करते हैं। वर्ष 2002 में लगभग 15 करोड़ रु. 2003 में 5.57 करोड़ रु. वर्ष 2004 में 6.81 करोड़ रु. 2007 में लगभग 8 करोड़ रु. और वर्ष 2008 में लगभग 15 करोड़ रु. सरकारी एजेंसियों द्वारा देशभर के लगभग 1400 मामलों में बरामद किये। तेजी से बढ़ते इन आंकड़ों से स्वयं ही समझा जा सकता है कि हमारी अर्थव्यवस्था में नकली नोट झोंकने वाले अपराधी कितनी तत्परता और नियोजित रूप से इस आतंकवाद को अंजाम दे रहे हैं।

आईबी के पूर्व संयुक्त निदेशक श्री एम.के. धार के अनुसार हमारे देश में आतंकवादी गतिविधियों को चलाने के उद्देश्य से पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आई.एस.आई. लगभग एक करोड़ अस्सी लाख रु. की नकली करंसी भारत में भेजती है। नकली नोटों की यह आमद केवल पाकिस्तान सीमा से ही नहीं बांग्लादेश और नेपाल के रास्ते भी होती है। पूर्व सीबीआई निदेशक जोगिंदर सिंह भी मानते हैं कि आइएसआई पाकिस्तान इंटरनेशनल एयरलाइंस के विमानों के जरिये जाली नोटों को नेपाल, बांग्लादेश और श्रीलंका भेजने का काम कर रही है। एक सरकारी अनुमान के मुताबिक 16,90,000 करोड़ रुपये के नकली नोट देश की वर्तमान अर्थव्यवस्था में धाड़ल्ले से चल रहे हैं, यद्यपि भारतीय रिजर्व बैंक इन आंकड़ों को खारिज करता है। हमारे बाजार का शायद ही कोई हिस्सा हो जो इस तरह के नोट से बच पाया हो। कहा जा रहा है कि 20 से 25 प्रतिशत जाली नोट बाजार में धाड़ल्ले से चल रहे हैं जो हमारी अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचाने के लिये काफी हैं। नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरों के अनुसार पिछले वर्ष जनवरी से अगस्त के बीच नकली नोटों की 1,170 मामले पूरे देश में दर्ज किये गये थे जिनका बाजार मूल्य 3.63 करोड़ रु. के बराबर था।

असली की तरह दिखने वाले इन नकली नोट की तकनीक प्राप्त करने के पीछे हमारे गृह मंत्रालय की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि आईएसआई ने कई यूरोपीय कंपनियों से भारतीय करंसी संबंधी गोपनीय बातें प्राप्त कर ली हैं। मंत्रालय की रिपोर्ट में कहा गया है कि आईएसआई ने इन यूरोपी कंपनियों से भारतीय करंसी नोट से उसकी बनावट, खास विवरण और अन्य गोपनीय कोड़ हस्तगत कर लिये हैं। ये कंपनियां भारत को उसके करेंसी नोट के लिये सुरक्षित कागज की आपूर्ति करती हैं। इसी तरह भारतीय नोट की सुरक्षित इंक आपूर्तिकर्ता स्विटजरलैंड की कंपनियों से भी महत्वपूर्ण जानकारियां प्राप्त की जा चुकी हैं। सरकार को संदेह है कि भारत को करेंसी संबंधी वस्तुओं की आपूर्ति करने वाली ये यूरोपीय कंपनियां पाकिस्तान को नोट के लिये कागज और इंक की आपूर्ति करती हैं। गौरतलब है कि भारत का उसकी करेंसी नोट के लिये पेपर और इंक आपूर्तिकर्ता कंपनियों से खास करार है कि वह पेपर की सुरक्षा संबंधित कोई सूचना को लीक नहीं करेगी और न ही इन वस्तुओं का निर्यात अन्य देश को करेगी। अब केबिनेट सचिव की बैठक में निर्णय लिया गया है कि भारतीय करेंसी नोट के छापने का एकमात्र तरीका यह हो कि कागज और इंक बनाने की प्रक्रिया देश में ही शुरू की जाए।

देश में होशंगाबाद स्थित बैंक नोट पेपर मिल के पास 100,500 और 100 के नोट छापने की प्रौद्योगिकी नहीं है। मिल के पास केवल 2500 मीट्रिक टन कागज उत्पादन की ही क्षमता है। अब आरबीआई और वित्त मंत्रालय को कहा गया है कि वह देश में भारतीय नोट के कागज के लिये 12,000 मीट्रिक टन कागज उत्पादन करने वाली मिल की स्थापना विदेशी कंपनियों के साथ मिल कर तुरंत करें। इस संयुक्त उद्यम के लिये चार विदेशी कंपनियों के प्रस्ताव विचाराधीन हैं। यद्यपि मिल की स्थापना और उत्पादन प्रारंभ करने में कम से कम तीन वर्ष से अधिक समय अवश्य लगेगा। इस दौरान नकली करेंसी से बचने के लिये सरकार को चाहिये कि नोटों के कागज, स्याही आदि आपूर्तिकर्ता को बदल दिया जाए या फिर बेहतर हो कि प्लास्टिक नोटों का चलन प्रारंभ हो। इस प्रकार की करेंसी सिंगापुर, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, आयरलैंड जैसे देशों में प्रयोग की जाती है, जहां नकली नोटों की कोई समस्या नहीं है।

नकली भारतीय करेंसी ने प्रचलन पर नकेल कसने के लिये गृह मंत्रालय ने एक बहुआयामी एजेंसी फेक इंडियन करेंसी कोऑडिनेशन सेंटर ''(एफ-कोड)'' का गठन किया है। इसके तहत राज्य पुलिस बल, राजस्व खुफिया निदेशालय (डीआरडीआई), रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया और सीबीआई के लिये पकड़े गये नकली नोट की मात्रा और अभियुक्तों के बारे में बहुआयामी जांच एजेंसी एफ-कोड को अवगत कराना अब बाधयकारी होगा। एफ-कोड उनसे उपलब्धा सूचनाओं के आधार पर जांच और विश्लेषण करेगी। यहां तक कि देश में जाली नोट के वितरण को रोकने के काम में लगी सभी एजेंसियां एफ-कोड की छतरी से तालमेल बिठाकर काम करेंगी।

कारगिल में हुई पाकिस्तान की करारी हार के बाद से उसकी खुफिया एजेंसी ने भारत के खिलाफ नकली करेंसी को एक रणनीति के तहत उपयोग करना प्रारंभ किया है उसे लगने लगा है कि आर्थिक मोर्चे पर भारत की प्रगति को बाधित करना है तो उसका यही एकमात्र तरीका है। अब यह हमारी सरकार और खुफिया एजेंसियों की परीक्षा का समय है कि ऐसे आर्थिक आतंकवाद को जागरूक नागरिकों की मदद से कैसे और कितनी जल्दी नियंत्रण में लेकर दुश्मन देश को सबक सिखाती है।
 
शब्बीर कादरी