संस्करण: 25 जनवरी-2010

मध्यप्रदेश की ओर से चेतावनी

रमेश फड़के

   कुछ सप्ताह पहले संडे एक्सप्रेस ने यह खबर प्रकाशित की कि भूख सूचकांक में मध्यप्रदेश का 30.9 पर होना इथोपिया में भूख की स्थिति से भी खराब स्थिति थी। जबकि इसके दो पड़ोसी राज्य झारखंड और छत्तीसगढ़ की स्थिति भी क्रमश: 28.7 और 26.6 पर कुछ बेहतर थी। बीबीसी ने भी अक्टूबर 2008 में इसी तरह की एक रिपोर्ट जारी की थी।

उस रिपोर्ट के मुताबिक ये आंकड़े देश के योजना आयोग से प्राप्त हुए, न कि किसी स्थानीय एनजीओ से और इन आंकड़ों ने अधिकारियों को पूरी तरह से सचेत कर दिया था। विकास के मामले में 1994 में प्रदेश का 11वां स्थान था, लेकिन यह 2008 में नीचे खिसककर 17वें स्थान पर आ गया। 2009-10 के लिए तैयार वार्षिक योजना के कागजात में यह व्यक्त किया गया है, ''यह स्पष्ट तौर पर सूचित किया जाता है कि मध्यप्रदेश की स्थिति गरीबी उन्मूलन के मामले में खराब हो चुकी है।'' अन्य आंकड़े भी इसी तरह निराशाजनक हैं। तीन साल से कम उम्र के कुपोषित बच्चों का प्रतिशत, जो पहले ही नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे (एनएफएचएस)-2 में 53.5 प्रतिशत के उच्च स्तर पर था, वह एनएफएचएस-3 में बढ़कर 60.3 प्रतिशत हो गया। इसी तरह, इन दोनों सर्वे में एनेमिया या खून की कमी से प्रभावित बच्चों की संख्या भी गंभीर रूप 71.3 प्रतिशत के स्तर से उछलकर 82.6 प्रतिशत के स्तर पर पहुंच गई है। यह रिपोर्ट आगे बताती है कि ''गरीब मानव विकास संकेतकों के लिए कारण प्राय: प्रदेश में प्रति व्यक्ति आय कम होना है, जो 1999-2000 में 12,384 रुपये, जो आंशिक रूप से बढ़कर 2007-08 में 14,346 रुपये हो गई, जबकि राष्ट्रीय औसत प्राय: इससे दुगुना 16,258 से 33,000 रुपये तक है। यह वाकई में चौकाने वाला है।

ये आंकड़े पुन: प्रदेश व केंद्र सरकार से सहायता दावे खड़े करते हैं और यह दर्शाते हैं कि भारत ने सम्मिलित रूप से जो प्रगति की वह पूरी तरह से खोखली है। इसमें भी कोई आश्चर्य नहीं कि ये इलाके कई वर्षों से नक्सली हिंसा के चंगुल में हैं। भारतवासी प्राय: यह दावा करते हैं कि चूंकि देश की कुल आबादी में 35 साल के नीचे उम्र के लोगों का प्रतिशत बहुत अधिक है, इसलिए भारत को, न कि चीन को, अगले कुछ दशकों तक जनसांख्यिकीय फायदा मिलेगा। जब तक भारत लोगों के लिए स्वीकार्य आय और पोषण स्तर सुनिश्चित नहीं कर पाता है, तब तक कैसे यह उम्मीद कर सकते हैं कि करोड़ों कमजोर युवाओं को इतना शिक्षित और प्रशिक्षित कर दिया जाएगा कि वे रोजगार पा लेंगे।

दरअसल, निम्न प्रति व्यक्ति आय और पोषण स्तर, स्थिति को और गंभीर बना देंगे, क्योंकि इससे अस्वस्थता का स्तर ऐसा हो जाएगा कि स्वास्थ्य लाभ के लिए अधिक धन और पारिवारिक सहयोग की जरूरत होगी। इसी के साथ इसका हमारे युवाओं की श्रमशक्ति की कार्यक्षमता और उत्पादकता पर विपरीत प्रभाव पड़ेगा, जो आर्थिक प्रगति की गति को आगे चलकर धीमी कर देगा। पिछले साल, स्वतंत्रता दिवस के आसपास, एक प्रसिध्द साप्ताहिक ने बुंदेलखंड के आसपास के क्षेत्र में भूख/अभाव के कारण मौत की खबर प्रकाशित की थी। सरकार ने इस खबर से इंकार किया था, लेकिन इसका प्रमाण है कि प्रदेश और केंद्र सरकार के अधिकारी इससे वाकिफ थे। यदि मध्यप्रदेश में यही प्रदेश का प्रशासन है, जो देश की राजधानी से ज्यादा दूर नही है, तो फिर दूर-दराज में स्थित उत्तर-पूर्व के राज्यों में गरीबों की स्थिति क्या होनी चाहिए ? दो बड़े रेलवे लाइन और कम से कम तीन उच्च पथ देश के ज्यादातर हिस्सों को जोड़ते हैं, जो मध्यप्रदेश से होकर भी गुजरते हैं। एक साधारण पर्यवेक्षक भी आसानी से रेलवे लाइन और सड़कों के किनारे फैले कमजोर गुणवत्ता की वस्तुओं, विकृत व बेकार भूमि की खबर ले सकते हैं। ये खुले स्थान न केवल रेलवे लाइन अथवा सड़कों के करीब होते हैं, बल्कि कुछ बड़े कस्बों/शहरों से भी सटे होते हैं, जैसे भोपाल, विदिशा, बीना और होशंगाबाद। प्रदेश के त्वरित आर्थिक विकास को सुनिश्चित करने के लिए इन जगहों को आसानी से स्पेशल इकानॉमिक जोन (एसईजेड) के रूप में विकसित किया जा सकता है।

यहां मुश्किल से कोई बड़ा उद्योग अथवा मेगासिटी देखने को मिलती है। भोपाल, इंदौर, ग्वालियर और जबलपुर ही केवल हैं, जहां शायद ऐसी समृध्दि है। यहां के लोग जैसा कि सड़क के किनारे अथवा अनेक रेलवे स्टेशन के किनारे एक अरसे से निवास कर रहे हैं, उनकी स्थिति काफी खराब, कुपोषित और कुछ स्थानीय धार्मस्थलों या त्योहारों पर निर्भर है। ये लोग एक तरह की असंवेदनशीलता प्रदर्शित करते हैं और वे देश के बाकी हिस्सों में क्या कुछ हो रहा है, इससे बेखबर नहीं हो सकते। हालांकि यह देश के कई अन्य पिछड़े क्षेत्रों का भी सच है, लेकिन मधयप्रदेश की स्थिति बदतर नहीं, तो खराब तो लगती ही है।

कथित तौर पर मध्यप्रदेश में बिजली की स्थिति पर्याप्त है, लेकिन इसके दुरुपयोग की गंभीर समस्या है। कुछ साल पहले नेशनल रिमोट सेसिंग एजेंसी (एनआरएसए) ने यह रिपोर्ट जारी की थी कि प्रदेश के ज्यादातर हिस्सों में भूमिगत जलस्तर गंभीर रूप से नीचे चला गया है। ज्यादातर नदिया,  शायद नर्मदा, सोन व ताप्ती को छोड़कर, में पानी कम हो गया है। सिंचाई सुविधाएं सुविकसित नहीं हैं और इस कारण कृषि बुरी तरह से प्रभावित हो रही है, जो बेरोजगारी और गरीबी को बढ़ावा दे रही है। प्रदेश की इस गंभीर समस्या से निपटने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर एक प्रोजेक्ट शुरू करना बेहद जरूरी हो चुका है। गरीबी और पिछड़ेपन के कारण प्रदेश व देश की सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है।

1992 में 'सर्वाइवल वे बैक' में लिखते हुए वर्तमान में आईआईएसएस लंदन के महानिदेशक डॉ. जॉन चिपमैन ने कहा था कि 'न्यूक्लियर एकाउंटेंसी' के पार रणनीतिक अधययन चलते रहना चाहिए। मानव सुरक्षा राष्ट्रीय सुरक्षा का एक आवश्यक तत्व है और जो स्वयंसिध्द है। क्या भारत 2020 तक एक विकसित देश बनने की आशा कर सकता है, जबकि इसे गरीबी, कुपोषण और बीमारियों से जूझते करोड़ों जनता का बोझ भी ढोना है ? यही समय है हमारे देश के चिंतकों के लिए कि वे इन मुद्दों पर ज्यादा गंभीरता से विचार करें।


रमेश फड़के