संस्करण: 24 फरवरी-2014

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संघी विचारधारा और पीएम की कुर्सी के बीच झूलते मोदी

     न् 1999 से 2004 तक स्वघोषित रूप से प्रतिबध्द स्वयंसेवकों के नेतृत्ववाली वाली एनडीए सरकार का दुस्साहस एक समय इतना बढ़ गया था कि उसने भारतीय संविधान की समीक्षा के लिए एक आयोग का ही गठन कर दिया था ताकि, उसमें से स्वतंत्रता, समानता और न्याय (जो वस्तुत: फ्रांसीसी क्रांति की देन हैं), जैसे विदेशी मूल्यों को निकाला जा सके। उस समय संघ परिवार की ही एक शाखा विश्व हिंदू परिषद के नेता आर्चाय  धार्मेद्र और गिरिराज किशोर ने तो एक कदम आगे बढ़कर संविधान में किये जाने वाले परिवर्तनों को भी सुझा दिया था परन्तु ........     

? अनिल यादव


तमाशों और षड़यंत्रों की राजनीति

        पने शैशव काल में बच्चे कपड़ों में ही मलमूत्र विसर्जन कर देते हैं जिसे उनकी गलती नहीं माना जाता, किंतु यही काम जब वे थोड़ा बड़ा होने पर करते हैं तो यह असहनीय होता है। खेद है कि हमारा लोकतंत्र एक लम्बा समय गुजार लेने के बाद भी वैसी ही भूलें कर रहा है जैसी वह अपनी शैशव काल में करता था। प्रारम्भिक चुनावों में स्वतंत्रता आन्दोलन की सेना के रूप में कार्यरत कांग्रेस देश में लोकतांत्रिक रूप से चुनी जाने की स्वाभाविक अधिकारी थी, और कांग्रेस के अलावा कम्युनिष्ट या समाजवादी धड़ों में भी कांग्रेस के स्वतंत्रता आन्दोलन से निकले लोग थे।

?

वीरेन्द्र जैन


इतिहास देखो, फैसला करो !

     जो इतिहास से नहीं सीखते और एक ही तरह की गलती बार-बार करते हैं, वे नादान नहीं होते बल्कि लापरवाह होते हैं। ऐसे लोगों को आदतन गलती करने वाला भी माना जाता है,जिन्हें न अपनी चिंता होती है न परिवार की,तो फिर देश के विषय में कहा कहना। इसलिए जो भी काम करना चाहिए भली प्रकार सोच विचार कर, उसके गुणदोषों को परखकर करना चाहिए।

 ? विवेकानंद


भाजपा के दावे और सच्चाईयाँ

      सन्न लोकसभा चुनावों के मद्दे-नजर पूरे देश के मुकाबले उत्तर प्रदेश में कहीं ज्यादा तेजी से राजनीतिक दलों की तैयारियाँ हो रही हैं। पिछले कई दशक से यहाँ मुख्य रुप से काँग्रेस, सपा, बसपा और भाजपा जैसे चार राजनीतिक दल ही सत्ता समर में रहते आये हैं लेकिन इस बार एक पाँचवा राजनीतिक दल आप यानी आम आदमी पार्टी भी चुनाव मैदान में उतरने की तैयारी करती दिख रही है।

? सुनील अमर


जाट लैंड में भाजपा का

अनिश्चित भविष्य  

              देश के  धर्मनिरपेक्ष ताने बाने के लिए इसे कतई सुखद नही कहा जा सकता कि उत्तर प्रदेश के मुजफरनगर में गरीब और भूमिहीन मुसलमानों को प्रायोजित सांप्रदायिक हिंसा की आग में झोंक देने के बाद, प्रदेश की राजनीति के माहिर खिलाड़ी हिंसा के बाद उपजे सामाजिक और राजनैतिक परिदृष्य का अपने चुनावी हित में आकलन करने में तेजी से जुटे हैं। इन सब का आकलन इस बात को लेकर है कि दंगे के बाद अब वहां के सियासी परिदृष्य में उनके लिए क्या सहूलियतें और क्या मुश्किलें पैदा हुई हैं। दूसरे शब्दों में उनके लिए वहां कितनी भौतिक जमीन बची हुई है।

 

 ?   हरेराम मिश्र


आयोगों में सत्ताधारी दलों से जुड़े लोगों की नियुक्ति नहीं होना चाहिए

           पिछली 13, 14 और 15 फरवरी को दिल्ली में आयोजित एक कार्यक्रम में राज्यों में काम कर रहे विभिन्न आयोगों की स्थिति पर विचार किया गया। कार्यक्रम का आयोजन पैक्स एवं प्रिया ने किया था। ये दोनों संगठन देश के गरीब लोगों की स्थिति के संबंध में गतिविधियां करते हैं। इन संस्थानों का उद्देश्य समाज के पिछड़े वर्ग जिनमें अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, मुस्लिम और महिलाओ के संबंध में आवश्यक जानकारी इकट्ठी करना और उनकी गतिविधियों में सुधार के लिए समय-समय पर सिफारिश करना है।

? एल.एस.हरदेनिया


सत्या नाडेला से किसका सर उंचा होता है ?

      क बहुदेशीय कम्पनी के प्रमुख मैनेजर के तौर पर इलाके का व्यक्ति चुना जाए तो यह पड़ोसियों के लिए जरूर हर्ष का विषय हो सकता है, मगर इसके चलते समूचा राष्ट्र उसे अपना नया नायक समझने लग जाए, उसकी शोहरत में अपनी शोहरत का अक्स तलाशने लग जाए, इससे विडम्बनापूर्ण चीज़ भला क्या हो सकती है।

?  सुभाष गाताड़े


किताबें कुछ कहना चाहती हैं !

     मेरिकी लेखिका वेंडी डोनिगर की किताब 'द हिन्दू : एन अल्टरनेट हिस्ट्री' को वापस लेने एवं बची प्रतियां समाप्त करने को लेकर प्रबुध्द समुदाय में जबरदस्त आक्रोश दिख रहा है। पिछले दिनों दो वरिष्ठ लेखकों ने - सिध्दार्थ वरदराजन एवं ज्योतिर्मय शर्मा -पेंग्विन के नाम पत्र लिख कर अपनी किताबें इसी तरह समाप्त कर कापीराइट उन्हें वापस लौटाने की मांग की है। कुछ अन्य लेखकों ने पाठकों के पढ़ने के अधिकार का हनन करने के लिए प्रकाशन को कानूनी नोटिस भेजने के भी समाचार मिले हैं। 

? अंजलि सिन्हा


निदो तानिया की हत्या से उपजे सवाल

        पूर्वोतर की सात बहनों में से एक अरुणाचल प्रदेश के कांग्रेस विधायक निदो पवित्र के बेटे निदो तानिया का देश की राजधानी दिल्ली में सरेआम जधन्य हत्या मानवता को शर्मसार करने वाला है और भारतीय राष्ट्र -राज्य की सामाजिक सहभागिता और एकता पर गहरे सवाल खड़े करता है । यहां सवाल सिर्फ तानिया का नहीं वरन उस मनोवृति का है जो अपनी भाषा ,हिज्जे, आकृति- बनावट, नयन -नक्श ,रंग -रुप ,वेश-वुशा , धर्म, पूजा -पध्दति, जाति -वर्ण को ही सर्वश्रेठ मानता हैं और इसके साथ ही सवाल पूर्वोतर के प्रति हमारे सम्पूर्ण नजरिये का भी है। 

? देवेन्द्र कुमार


बुंदेलखंड में पर्यावरण के दुश्मन

      ल, जंगल,जमीन,जानवर मनुष्य के जीवन का अविभाज्य अंग हैं। बेहतर पर्यावरण, स्वस्थ जीवन के लिए स्वच्छ जल,घने जंगल, जीव जंतुओं की उपस्थिती भी अनिवार्य मानी गई है। प्रकृति ने जो व्यवस्था बनाई उसमें मनुष्यों के साथ ही जीव जंतुओं को अपना जीवन जीने,प्राकृतिक परिवेश में रहने खाने की सुवि धा दी गई। पर्यावरण का महत्व समाज और सरकार सबको पता है। पर्यावरण संरक्षण के लिए केन्द्र और राज्य सरकार ने अनेक नियम कानून बनाये जिनका क्रियान्वयन किया जा रहा है। सरकार एक तरफ तो अनेक नियम ,कानून बनाकर पर्यावरण संरक्षण करना चाहती है वहीं दूसरी ओर सरकार के स्तर पर कुछ ऐसे फैसले भी लिये गये हैं जिनसे पर्यावरण के बिगडने का खतरा बढ गया है।        

? अमिताभ पाण्डेय


मध्यप्रदेश में परमाणु परियोजनाओं का विरोध

        ध्यप्रदेश में मण्डला और शिवपुरी जिलों में परमाणु विद्युत परियोजनाएं प्रस्तावित हैं। शिवपुरी में अभी भूमि अधिग्रहण की कार्रवाई शुरु नही हुई है,लेकिन मण्डला जिलें में लगने वाली चुटका परमाणु परियोजना की कार्रवाई जबरदस्त जन-विरोध के बावजूद प्रदेश सरकार आगे बढ़ाने में लगी है। हालांकि चंद लोग नए भूमि अधिग्रहण अधिनियम के तहत चार गुना मुआवजा मिलने के लालच में परियोजना का समर्थन भी कर रहे हैं।

? प्रमोद भार्गव


जहर का प्रचार करते हमारे सेलिब्रिटी

      क्सर होता है कि कोई साधारण व्यक्ति यदि किसी बड़ी कंपनी की बुराई करे,तो लोग ध्यान नहीं देते, पर वही बात यदि कोई सेलिब्रिटी करे,तो उस पर सबका ध्यान जाता है। बाबा रामदेव कब से कह रहे हैं कि कोला ड्रिंक्स में जहर होता है, इसलिए उसका इस्तेमाल पेट के लिए नहीं करना चाहिए। कई किसान अपने खेत में कीटनाशक के स्थान पर कोला ड्रिंक्स का इस्तेमाल कर रहे हैं, तो कई गृहणियां उसका उपयोग टायलेट साफ करने में करती हैं।       

? डॉ. महेश परिमल


क्या सरकार का काम

विवाह करवाना है ?

        ध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में मुख्यमंत्री कन्यादान योजना के अन्तर्गत प्रति वर्ष लाखों विवाह सम्पन्न कराये जा रहे हैं। प्रति विवाह आठ हज़ार रुपए की व्ययराशि बढ़ाकर पच्चीस हजार रुपए कर दी गई है। पहले से विवाहित और बाल बच्चेदार गृहस्थों द्वारा भी दोबारा सरकारी खर्च पर ब्याह रचाने की घटनाएं अब नहीं चौंकातीं। प्रश्न यह है कि आखिर सरकारों को राजकोष खाली कर विवाह करवाने की ज़रूरत क्या है ?

? डॉ. गीता गुप्त


  24 फरवरी-2014

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