संस्करण: 24 फरवरी-2014

निदो तानिया की हत्या से उपजे सवाल

 

? देवेन्द्र कुमार

        पूर्वोतर की सात बहनों में से एक अरुणाचल प्रदेश के कांग्रेस विधायक निदो पवित्र के बेटे निदो तानिया का देश की राजधानी दिल्ली में सरेआम जधन्य हत्या मानवता को शर्मसार करने वाला है और भारतीय राष्ट्र -राज्य की सामाजिक सहभागिता और एकता पर गहरे सवाल खड़े करता है । यहां सवाल सिर्फ तानिया का नहीं वरन उस मनोवृति का है जो अपनी भाषा ,हिज्जे, आकृति- बनावट, नयन -नक्श ,रंग -रुप ,वेश-वुशा , धर्म, पूजा -पध्दति, जाति -वर्ण को ही सर्वश्रेठ मानता हैं और इसके साथ ही सवाल पूर्वोतर के प्रति हमारे सम्पूर्ण नजरिये का भी है।  क्या आजादी के छह दशक गुजरने के बाद भी हम एक भारतीय समाज के निर्माण में सफल हुए है । क्या सिर्फ आर्थिक समृध्दि ही एक खुशहाल राष्ट्र का आ धार स्तम्भ होगा । क्या  आर्थिक समृध्दि के बुते ही हम अपने राष्ट्र - राज्य को बनाये रखने में सफल होगें ।

               अभी - अभी मुम्बई में यह अफवाह फैलाई जा रही है कि एक जहरीली हवा निकल रही है जो सिर्फ बिहारीयों को ही अपने आगोश में ले रहा है, बेचारे बिहारी मजदूर जो अपने बाल बच्चे को छोड़ दिहाड़ी मजदूरी करने मुम्बई  की फैक्टरियों में गये है, खौफजदा हो भाग रहे हैं। इसे सिर्फ एक अफवाह कह कर खारिज नहीं किया जा सकता , इसके पीछे की मनोवृति को  भी समझना होगा ।

              हालात यह है कि जब भी कोई किसी अजनबी शहर में जाता है तो वह चाह कर भी अपने मन - माफिक जगह पर नहीं रह पाता, उसे अपने  धर्म -संप्रदाय के मुहल्ले की खोज करनी पड़ती है और खास कर यह मुस्लिमों के लिए परेशानी का सबब है ।

                ग्राम - स्वराज्य सुनने में चाहे जितना भी अच्छा लगे पर सच्चार्इ्र यह है कि गांव खोजना एक दुश्कर कार्य है। गांव टोलों  में विभक्त है , हर जाति के अपने - अपने टोलें हैं  अपनी अपनी दुनिया है और  उनके बीच घातक प्रतिस्पर्धा हैं ।

               राजनीतिक रुप से भारत एक है पर सामाजिक रुप से यह टुकड़ों में बंटा हैं । कभी आसाम में राष्ट्रीय राज्य मार्ग पर कार्यरत बिहारी मजदूरों पर हमले होते है, तो कभी गुजरात की गरीबी कारण बिहारी मजदूरों को बतलाया जाता है तो दिल्ली में झाड़ु पोछा और घरेलू कामों के लिए झारखंड की नाबालिग आदिवासी लड़कियों की मांग होती है और फिर उनके साथ जानवर से भी बुरा सलुक होता है।

              स्पष्ट है कि आज निदो एक व्यक्ति  नहीं वह हमारी सामाजिक विखंडन ,टूटन और विखराव  का प्रतीक बन गया है । फिर पूर्वोतर के प्रति हमारा नजरिया  ही दोषपूर्ण रहा है । वहां रोजगार के अवसर नहीं हैं ,प्रयाप्त शिक्षण संस्थान नहीं है, संचार के उपकरण दुरुस्त नहीं है । पूर्वोतर का हलचल ,घटना क्रम , सामाजिक आन्दोलन और  सामाजिक अभिवंचना कथित राष्ट्रीय मीडिया में स्थान नहीं पाता । 

             कथित मुख्य धारा का भारतीय सिनेमा, टीवी चैनल के सीरियल भारतीयता की जो तस्वीर गढ़ रहे है वह एकरुप -सपाट  है।  जिस भाषा , चाल -ढाल , खान पान को वे स्थापित कर रहे हैं, उसमें बहुलतावादी  दृष्टिकोण कहीं झलकता ही नहीं । वह जो सौन्दर्य का प्रतिमान गढ़ रहे है । उस  प्रतिमान के बाहर जो कुछ भी है ,वह बदसुरत है । नायक - नायिकाओं की लम्बाई छह फीट से उपर हो ,एकदम तीखे नयन नक्श हो, बोलने - चलने की एक विशेष अदा हो और रंग तो हर कीमत पर  दु धिया होना ही चाहिए । अब सवाल यह है कि क्या वाकई यह पुरे  हिन्दुस्तान की सच्चाई है और नहीं तो हमारे रुपहले पर्दे से हिन्दुस्तान का बहुलतावादी समाज की तस्वीर गायब क्यों है । दलित, आदिवासी ,अति पिछड़ा,पूर्वोतर के वासिन्दे , केरल और दक्षिण का हिन्दुस्तान भारतीय सिनेमा से गायब क्यों है। उनकी तस्वीर , उनकी आकृतियां ,उनकी कहानियां  हमारे रुपहले पर्दे पर दिखलाई क्यों नही पडती । उसी समाज से हम  नायक -नायिका क्यों नहीं खोजते । हमारा यह विशाल समाज सिर्फ उपभोक्ता - दर्शक क्यों है । हमारा सौन्दर्यबोघ इतना सीमित और कुठांग्रस्त क्यों है ।

              एक सवाल तो हमारे पाठय पुस्तकों का भी है। पाठय पुस्तकों इस रुप में तैयार की गई है कि पूर्वोतर की उसमें कोई  झलक नहीं मिलती । सारा जोर रोजगारपरक शिक्षा पर है,  राष्ट्रीय एकता और सामाजिक एकजुटता हमारी प्राथमिकता में नहीं है। अभी ज्यादा दिन नहीं गुजरे जब राजनीतिक का नया चेहरा गढ़ने का दावा करने वाले कुमार विश्वास का केरल की नर्सो का रंग -रुप को लेकर की गई टिप्पणी सामने आई थी । जब गैर परम्रागत राजनीति का दावा करने वालों की मनोदशा और सोच यह है तब एक व्यापक राष्ट्रीय नजरिये की खोज कहां की जाय ।

             यद्यपि सांस्कृतिक भारत का दायरा काफी व्यापक है पर उसे एक राजनीतिक इकाई में परिर्वतित करने में हम लगातार असफल होते जा रहे हैं। हमारे समाज का टूटन , विखंडन  बढ़ता ही जा रहा हैं। और इसका कारण है , हम अपनी बहुलतावादी प्रवृति को त्याग  एक निश्चित प्रतिमान में पूरे हिन्दुस्तान को फिट करने पर आमादा है । एक खान -पान ,एक वेश - वुशा , एक प्रकार की बोली ,  एक प्रकार के रश्मों -रिवाज और  दैहिक सौन्दर्य प्रतिमान को गढ़ -अपना कर हम न सिर्फ अपनी विवि धाता को संकुचित कर रहे है वरन अपनी सामाजिक -सांस्कृतिक जड़ों को कमजोर कर रहे हैं ।

                         स्पष्ट है कि निदो सिर्फ पूर्वोतर में नहीं है, वह हर गली , हर चौराहे, हर मोड़ और हिन्दुस्तान के हर भू भाग में किसी न किसी शक्ल  में खड़ा है। कभी वह  आसाम में पीटा जाता है, कभी मुम्बई से भगाया जाता है, कभी गुजरात में ताने सुनता है, कभी दिल्ली की गलियों में चिंकी कह पुकारा जाता है , कभी पॉश इलाके में आशियाने की खोज में मजहब के आ धार पर घकियाया जाता है तो कभी अपने रंग -रुप और जाति -वर्ण के कारण विभेद का शिकार  होता है।

? देवेन्द्र कुमार