संस्करण: 24 फरवरी-2014

बुंदेलखंड में पर्यावरण के दुश्मन

? अमिताभ पाण्डेय

             ल, जंगल,जमीन,जानवर मनुष्य के जीवन का अविभाज्य अंग हैं। बेहतर पर्यावरण, स्वस्थ जीवन के लिए स्वच्छ जल,घने जंगल, जीव जंतुओं की उपस्थिती भी अनिवार्य मानी गई है। प्रकृति ने जो व्यवस्था बनाई उसमें मनुष्यों के साथ ही जीव जंतुओं को अपना जीवन जीने,प्राकृतिक परिवेश में रहने खाने की सुवि धा दी गई। पर्यावरण का महत्व समाज और सरकार सबको पता है। पर्यावरण संरक्षण के लिए केन्द्र और राज्य सरकार ने अनेक नियम कानून बनाये जिनका क्रियान्वयन किया जा रहा है। सरकार एक तरफ तो अनेक नियम ,कानून बनाकर पर्यावरण संरक्षण करना चाहती है वहीं दूसरी ओर सरकार के स्तर पर कुछ ऐसे फैसले भी लिये गये हैं जिनसे पर्यावरण के बिगडने का खतरा बढ गया है। निजी स्वार्थ के लिए कुछ लोग पर्यावरण के दुश्मन बन गये हैं । ऐसे लोग प्रकृति,पर्यावरण को नष्ट कर बस अपना फायदा कैसे हो ? इसी को देख रहे हैं । अफसोस यह है कि पर्यावरण को नुकसान पहॅुचाने का यह काम सरकार की जानकारी में होने के बावजूद हो रहा है। सरकार खुद ऐसे आदेश दे रही है जिनसे पर्यावरण,मनुष्य ,जीव जंतु,जंगल, जैव विविधता , पानी सबको भारी नुकसान हो रहा है । ऐसे फैसले सरकार द्वारा बनाये गये पर्यावरण संरक्षण कानून की अवहेलना कर रहे है ।

               ऐसा ही एक फैसला मध्यप्रदेश में सरकार द्वारा आस्ट्रेलिया की कंम्पनी रियो टिन्टों को बुंदेलखंड क्षेत्र में हीरा खोजने का लायसेसं देने का है। आरोप है दुनिया के अनेक देशों से अपने गलत कामकाज के चलते ब्लेक लिस्टेड हो चुकी इस बहुराष्टीय कम्पनी ने मध्यप्रदेश के बुदेंलखंड क्षेत्र मे हीरा खोजने के बहाने अवैध उत्खनन,जंगल काटकर पर्यावरण को भारी नुकसान पहुॅचाया है। यह कम्पनी अब अपने कार्य के लिए राज्य सरकार सेस 954 हैक्टेयर क्षेत्र में हीरा खोजने की अनुमति चाहती है जिसके लिए राजय सरकार ने तो अनुमति सहमति दे दी लेकिन प्रभावित क्षेत्र के हजारो लोग इसका भारी विरोध कर रहे है। विरोध प्रदर्शन करने वाले ग्रामीण जनों का आरोप है कि यह कम्पनी जल,जंगल,जीव जंतु,  पानी,रोजगार सब कुछ नष्ट कर रही है और प्रशासन आम जनता की सुनवाई पर  धयान नही दे रहा है। इस बहुराष्ट्रीय कम्पनी ने वर्ष 2004 में बुंदेलखंड क्षेत्र के छतरपुर जिले में हीरे की तलाश के लिए मात्र 45 वर्ग किलोमीटर में काम करने काप्रास्पेक्टिगं लायसेंस मांगा था। राज्य सरकार द्वारा लायसेंस दिये जाते समय यह शर्त जोडी गई थी कि इस क्षेत्र में पेड पौधों को नहीं काटा जायेगा । पानी का दुरुपयोग नहीं किया जायेगा । कम्पनी के द्वारा किये जाने वाले काम की नियमित रिपोर्ट कलेक्टर को भेजी जायेगी। कम्पनी ने इन तीनों शर्तों का पालन नहीं किया। अब तक 50 हजार से ज्यादा पेड इस क्षेत्र में काटे जा चुके है। जमीन से पानी निकालने के लिए एक हजार फीट गहरे 200 से ज्यादा होल किये गये जिससे भूजल स्तर इतना नीचे चला गया कि ठंड के मौसम मे भी इंसान ही नहीं जानवर भी पेयजल के लिए परेशान हो रहे हैं।

              पर्यावरण संरक्षण के लिए बनाये गये नियम कानूनों की अवहेलना करके रियो टिंटों ने हीरे की तलाश में छतरपुर जिले के बक्सवाहा क्षेत्र सहित आसपास के 50 हजार से ज्यादा पेड काटे । जंगल खत्म करने की इस प्रक्रिया में कितने वन्य जीव मारे गये ? जैव विवि धाता की कितनी प्रजातियॉ नष्ट हो गई ? इसका कोई आकलन अभी तक नहीं हो पाया है। पेड काटने का जब स्थानीय ग्रामीण जनों ने विरोध किया तो प्रशासन ने उनके विरोध में ही प्रकरण दर्ज करवा दियें। जब छतरपुर जिले के तत्कालीन कलेक्टर उमाकांत उमराव ने रियो टिंटों की पर्यावरण विरोधी गतिविधियों की शिकायत प्रशासन में उच्च स्तर पर की तो उनका रातों रात तबादला कर दिया गया।

                अब स्थिती यह है कि छतरपुर जिले ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण बुंदेलखंड क्षेत्र में लोगों में रियो टिंटों कम्पनी की जनविरोधी नीतियों के विरूधद आक्रोश गहरा रहा है। छतरपुर जिले में जल,जंगल बचाने के लिए कार्य करने वाली संस्था पहल के अधयक्ष हरिकृष्ण दिवेद्वी का आरोप है कि रिेयो टिंटो के विरोध में ग्रामीणजनों ने जनसुनवाई से लेकर भोपाल,दिल्ली तक सप्रमाण शिकायतें की है। इसके बाद भी पर्यावरण विरोधी गतिविधियों पर विराम नहीं लग पाया है। इस सम्बन्ध में विगत 13 फरवरी को छतरपुर जिले के हजारों ग्रामीणजनों ने कलेक्टर के समक्ष अपना विरोध दर्ज करवाया लेकिन सरकार गॉववालों की भावना की उपेक्षा कर रही है। इस मामले को लेकर एक जनहित याचिका जबलपुर के उच्च न्यायालय में भी नीलेश दुबे ने लगाई है। याचिका में कम्पनी द्वारा क्षेत्र में किये गये अवैध उत्खनन के बारे में विस्तार से बताया गया है।

               छतरपुर जिले में रियोटिंटों की पर्यावरण विरोधी गतिविधियों को लेकर आन्दोलन कर रहे पहल संस्था के अधयक्ष हरिकृष्ण द्विवेदी कहते है कि सरकार को न जनता की चिन्ता है ,न ही पर्यावरण की । 50 हजार से ज्यादा पेड काटने, भूजल स्तर को नीचे गिरा देने वाली इस कम्पनी पर प्रतिबंधा की कार्यवाही नहीं किया जाना यह बताता है कि प्रशासन के कुछ लोग भी पर्यावरण को नष्ट करने के लिए समर्थन दे रहे है। यह कम्पनी अब बुंदेलखंड क्षेत्र के 954 हेक्टेयर जंगल में हीरे की तलाश करना चाहती है। इतने बडे क्षेत्र में हीरे की तलाश के बहाने लगभग 10 लाख पेड काटे जायेगें। इस क्षेत्र में वन विभाग के वन संरक्षक राघवेन्द्र श्रीवास्तव स्वीकार करते हैं कि रियो टिंटो ने जिस क्षेत्र में लीज मांगी है वहॉ घने जंगल है जिसमें अनेक जंगली जानवरों के साथ तेदुए, भालू, सोनकुत्ते,आदि भी हैं। यह इलाका पन्ना नेशनल पार्क के बफर जोन के समीप है जहां से शेर अपना आना जाना करते है। यदि सरकार ने रियो टिंटो को अनुमति दे दी तो जंगल के साथ ही दुर्लभ होते जा रहे वन्यजीवों का भी सफाया हो जायेगा। पहल के अध्यक्ष द्विवेदी कहते हैं कि रियो टिंटों की गतिविधियों से समूचे क्षेत्र की जैव विवि धाता,जलवायु ,पर्यावरण को खतरा बढता जा रहा है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान इस क्षेत्र के ग्रामीणजनों के विरोध की उपेक्षा कर दो बार रियो टिंटो की सिफारिश केन्द्र सरकार से कर पत्र के माधयम से कर चुके हैं। राज्य सरकार पर्यावरण संरक्षण के लिए जो वादे करती है उन सबका खुला उल्लघंन रियौ टिंटों कम्पनी खुलेआम कर रही है। पर्यावरण बिगाडने वाली इस कम्पनी को भाजपा सरकार का खुला संरक्षण अनेक सवाल खडे करता है। दूसरी ओर रियो टिंटों के अधिकारी समाचार पत्रों में आये दिन फोटो सहित प्रकाशित हो रही कम्पनी की पर्यावरण विरोधी गतिविधियों का खंडन कर रहे है लेकिन उनके पास अपनी बात में समर्थन में पर्याप्त तथ्य,तर्क नहीं है। गांववालों का विरोध वे प्रशासन की मदद से रोकना चाहते है । प्रकृति पर्यावरण के विरो धा की इस गतिविधि को कैसे रोका जाये इसकी चिन्ता पर्यावरण प्रेमियों को भी है। सरकार गॉव वालों,पर्यावरण प्रेमियों को छोडकर कॅम्पनी का पक्ष ले रही है । इससे आमजन का निराश होना स्वाभाविक ही है।

? अमिताभ पाण्डेय