संस्करण: 24 दिसम्बर -2012

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सदन में हुड़दंग और कुछ राजनीतिक दल

       नेता लोग चुनाव के समय जनता के बीच आकर बार बार निवेदन करते हैं कि उन्हें चुनकर विधायिका में भेजो ताकि वे जनता के प्रतिनिधि के तौर पर उसकी आवाज को देश और सरकार के सामने रख सकें। जनता तो उनकी अपील पर अमल करते हुए उन्हें सम्बन्धित सदन में भेज देती है पर इन जनप्रतिनिधियों का एक हिस्सा जनता की आवाज को सदन में रखना तो दूर रहा,खुद भी सदन से दूर कुछ और कर रहे होते हैं,जिसके सनसनीखेज समाचार कभी कभी सुर्खियों में मिल जाते हैं और जो बहुधा उनके अनैतिक ही नहीं अवैधानिक कारनामों के बारे में होते हैं।

?  वीरेन्द्र जैन


स्त्रियों की बढ़ती असुरक्षा :

क्या क्षणिक उद्वेलन समाधान है ?

        देश की राजधानी में चलती बस में सामूहिक बलात्कार की घटना ने सभी को उद्वेलित कर दिया है। आम लोगों,राजनीतिक सामाजिक संगठनों के अलावा संसद के जनप्रतिनिधियों ने भी स्त्रियों की सुरक्षा पर आसन्न खतरे के प्रति चिन्ता प्रगट की है। घटना में शामिल चार अपराधी पकड़े गए हैं और बचे हुए दो की तलाशी के लिए जगह जगह टीमें भेजी गयी हैं और उम्मीद की जानी चाहिए कि वे भी जल्द ही गिरफ्त में आ जाएंगे।

? अंजलि सिन्हा


कृपया रेप पर राजनीति न करें

   यूं तो पहले भी दिल्ली और एनसीआर क्षेत्र में इस तरह की अनेक घटनाएं हुई हैं, लेकिन 19 दिसंबर को अचानक सम्मानीय सांसद जाग उठे। दिल्ली में चलती बस में एक छात्रा के साथ हुई एक वीभत्स घटना ने संसद को कथित रूप से झकझोर दिया। इसमें दो बातें प्रमुख रूप से उठीं,पहली बलात्कारियों को फांसी की सजा होनी चाहिए,और दूसरी दिल्ली पुलिस,दिल्ली सरकार और केंद्रीय गृह मंत्री इस तरह की घटनाएं रोकने में नाकाम हैं। यद्यपि यह सभी बातें सत्य हैं, फिर भी इनमें राजनीति की बू आती है, शब्दों को जितना समझने का प्रयास कीजिए संसद में बोलने वालों की मंशा का सार घटना के इतर राजनीतिक होता जाता है।

? विवेकानंद


हिन्दुओं को भयभीत कर चुनाव जीते नरेन्द्र मोदी

         भ्रष्टाचार और आकाश छूती महंगाई से उत्पन्न चुनौतियों के बावजूद गुजरात और हिमाचल प्रदेश विधानसभा चुनावों के जो नतीजे आए हैं उन्हें कांग्रेस का नेतृत्व संतोषजनक ही मानेगा।मतदान के कुछ दिन पूर्व मेरे गुजरात प्रवास के दौरान नरेन्द्र मोदी समर्थक यह दावा कर रहे थे कि कांग्रेस के लिए 20-25सीटें जीतना भी कठिन होगा। इस दावे के मद्देनजर कांग्रेस ने जितनी सीटें हासिल की हैं वह भी अपने आप में महती सफलता समझी जाएगी।

? एल.एस.हरदेनिया


वंचित अधिकारों के दस्यु

       गुजरात एवं हिमाचल प्रदेश की चुनावी आपाधापी के बीच जयपुर से आयी इस ख़बर की तरफ बहुत कम लोगों का ध्यान गया है,जिसके अन्तर्गतसामाजिक न्याय एवं आधिकारिता विभाग की जांच के बाद छात्रवृत्ति घोटाले में लिप्त 72 कर्मचारियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने का आदेश दिया गया है। (भास्कर, 17 दिसम्बर 2012) इन पर आरोप है कि वर्ष 2005-2009 के दौरान राजधानी जयपुर एवं अन्य जिलों के कई कालेजों में बिना जांच पड़तालएवं कालेज संचालकों से मिलीभगत कर अनुसूचित जाति एवं जनजाति के छात्रों के लिए आवण्टित की जानेवाली छात्रवृत्ति में करोड़ो का घोटाला कर दिया।

 ?   सुभाष गाताड़े


मुश्किल में मजदूर किसान और महिलाएं

संकट में मानव अधिकार

                  भारत का संविधान प्रत्येक देशवासी के लिए उसके भौतिक अधिकारों  को सुनिश्चित किये जाने के लिए प्रतिबध्द है। हमारे संविधान ने देश के हर नागरिक को बिना किसी भेदभाव के सम्मानपूर्वक जीने का अधिकार,काम और नियोजन में मानवीय परिस्थितियों के सुनिनिश्चित होने का अधिकार,शुधद पर्यावरण का अधिकर, आत्मरक्षा सुरक्षा का अधिकार, निवास एंव आश्रय का अधिकार, अन्न एंव वस्त्र का अधिकार, सूचना का अधिकार दिया है।

? अमिताभ पाण्डेय


पॉलिटिक्स का महामंत्र है-'यूज़ एण्ड थ्रो'

      'यूज़ एण्ड थ्रो' यानि उपयोग करो और फेंक दो' का जुमला राजनीति में एक महामंत्र का रूप ले चुका है। रही होगी कभी राजनीति सिध्दांतों की, आदर्शों की, शुचिता की और नैतिकता की। अब तो राजनीति रह गई है आकाओं के मतलब की और उन लोगों के निहित स्वार्थों की पूर्ति की जो संयोग से या किस्मत से सत्ता या संगठन के शिखर तक पहुंच गये हैं। एक बार सत्ता या संगठन की बागड़ोर हाथ में आई कि व्यक्ति पद के मद में मंदाध हो जाता है। वह नहीं चाहता कि उसकी शख्सियत के आगे आकर कोई उसकी छोटी लकीर के आगे अपनी बड़ी लकीर खींच दे।

? राजेन्द्र जोशी


ऐसे तो नहीं खत्म होगा बाल श्रम

      म्बी लड़ाई के बाद बाल मजदूरी के विरूध्द संघर्षरत संगठनों और कार्यकर्ताओं को एक बड़ी जीत हासिल हुई। पिछले दिनों केन्द्रीय मंत्रीमण्डल ने 26साल पुराने बाल श्रम कानून में कई महत्वपूर्ण संशोधनों को हरी झण्डी दे दी। जिसके तहत अब 14 वर्ष तक के बच्चों के लिए किसी भी प्रकार की मजदूरी पर पूर्ण प्रतिबंध और 14-18वर्ष के किशोरों को खतरनाक उद्योगों में मजदूरी कराने पर रोक लग जायेगी। बाल श्रम अब एक संज्ञेय अपराध माना जायेगा,जिसकी सजा तीन वर्ष तक का कारावास और 50हजार रूपये तक का जुर्माना होगा। यह एक प्रगतिशील और सकारात्मक कदम है।

? राखी रघुवंशी


क्यों चरमरा रही है

विकसित अर्थव्यवस्थाएॅ ?

        क वर्ष के सुस्त आर्थिक विकास और इस सुस्ती के अगले वर्ष भी जारी रहने से यह चर्चा बढ़ती जा रही है कि आने वाले दशकों में आर्थिक विकास को लेकर क्या उम्मीद की जाये। क्या वैश्विक आर्थिक संकट अग्रिम पंक्ति के देशों के विकास के लिये एक कठोर किन्तु अस्थायी आघात था अथवा इसने एक गहरी दीर्घकालीन रूग्णता को उजागर किया?

? केनीथ रोगोफ


भर्ती में लूट की छूट

       त्तर प्रदेश में राज्य सरकार ने प्राथमिक स्कूलों में 72,825 शिक्षकों की भर्ती की प्रक्रिया शुरू की है। राज्य में हो रही इस भर्ती की आड़ में डिग्रीधारी बेरोजगार युवाओं से कई तरह से बेलगाम लूट की जा रही है। मेरे अपने कई साथियों इस तरह के अनुभव बयां किए की नौकरी की गारंटी करने के लिए वो सभी 75जिलों में आवेदन भेज रहे हैं जिसमें हर एक जिले के लिए 500रुपए का बैंक चालान लगाना पड़ रहा है। अन्य स्तरों पर भी इस भर्ती की प्रक्रिया लूट की खुली छूट देने वाली है।    

? विजय प्रताप


जीएम फसलों से दूर

रहना ही अच्छा

        गभग दो साल बाद जीएम फसलों का जिन्न फिर बोतल से बाहर है।इस बार यह मुद्दा  उच्चतम न्यायालय द्वारा नियुक्त छह सदस्यीय विशेषज्ञ समिति द्वारा हाल ही सौंपी गई रिपोर्ट के बाद चर्चा में आया ह। इस समिति की रिपोर्ट के  अनुसार देश में जीएम फसलों के जमीनी परीक्षण पर अगले दस साल के लिए रोक लगाने की सिफारिश की है।

? डॉ. सुनील शर्मा


यह जश्न मनाने का समय नहीं....

       क्कीसवीं सदी के दूसरे दशक का एक और नया वर्ष हमारे सामने हैं। 2013 का कैलेण्डर हमारे घर की दीवारों पर टंग जाने को आतुर है। हमारे युवा नये साल का जश्न मनाने की तैयारी में हैं। मगर सोचिए, क्या सचमुच यह समय जश्न मनाने का है?जबकि देश अनेक कठिनाइयों के दौर से गुज़र रहा है। भ्रष्टाचार,अन्याय,असमानता, निर्धनता, अनैतिकता और सामाजिक विसंगतियों समेत अनगिनत समस्याएं सुरसा की तरह मुंह बाये खड़ी हैं। अब तक देश में जो कुछ भी घटता आया है उससे हमारे हृदय आहत हुए हैं, आशाएं धूमिल हुई हैं और विश्वास खण्डित हुआ है। फिर भी हम एक ऐसे देश की कल्पना करना चाहते हैं जो भूख, भय, अशिक्षा और अभाव से मुक्त और हरेक नागरिक के सपनों का भारत हो। जिसमें उसकी आशाएं फलीभूत हों।    

? डॉ. गीता गुप्त


  24 दिसम्बर-2012

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