संस्करण: 24 मई-2010   

कहां है मानवाधिकारों के हिमायती ?

महेश बाग़ी

          स्तर के सुकमा कस्बे में नक्सलियों ने बारुदी सुरंग से एक यात्री बस को उड़ा दिया। इसमें पुलिसकर्मियों समेत 36 लोग मारे गए। विस्फोट इतना भयानक था कि लोगों के शरीर के चीथड़े उड़ कर पेड़ों पर लटक गए। सड़क पर चारों ओर शवों के अंग-प्रत्यंग बिखरे थे। इन शवों की शिनाख्त करना भी असंभव है। ख़ास बात यह है कि इस नक्सली हमले में आम लोगों को भी निशाना बनाया गया है। जो बुध्दिजीवी और मानवाधिकारवादी आए दिन नक्सलियों की हिमायत करते रहते हैं, वे इस हमले के बाद ख़ामोश हैं। एक माह में बस्तर में नक्सलियों की यह तीसरी बड़ी वारदात है। इस तरह के हमले कर नक्सली अपनी मौजूदगी और ताक़त का अहसास कराना चाहते हैं, ताकि पुलिस और विशेष सशस्त्र बल की कार्रवाई प्रभावित हो।

        नक्सली हिंसा की इस वारदात के बाद छत्तीसगढ़ के गृहमंत्री ने सेना बुलाने की मांग की है। केन्द्रीय गृहमंत्री पी. चिदंबरम नक्सलियों के खिलाफ़ सैन्य कार्रवाई करने का बयान दे चुके हैं, जिसका तथाकथित बुध्दिजीवियों ने विरोधा किया था। उनकी नज़र में नक्सलवादी जनआंदोलन चला रहे हैं। छत्तीसगढ़ में एक माह में नक्सलियों द्वारा किए गए तीन हमले यह ज़ाहिर कर चुके हैं कि वे कितने जनवादी हैं। कुछ लोग यह भी कह रहे हैं कि नक्सलवादी अब आम जनता को भी मारने लगे हैं, जबकि हक़ीक़त यह है कि नक्सली पहले से ही आम जनता को मारते आ रहे हैं। उनकी तथाकथित पंचायतों में कई आदिवासियों को पुलिस का मुख़बिर बता कर मौत के घाट उतारा जा चुका है। नक्सलियों के पैरोकार यह भी कहते हैं कि वे सुदूर अंचलों में पीड़ित वर्ग को न्याय दिलाते हैं। यदि यह सच है तो वे सड़क और पुल क्यों उड़ाते हैं ? इनसे आम जनता को तो असुविधा ही होती है और नक्सली पुलिस की पहुंच से दूर हो जाते हैं।

         हाल ही में छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमनसिंह ने चौंकाने वाला ख़ुलासा किया है। उन्होंने कहा है कि नक्सलियों के संबंध लश्कर-ए-तैयबा से हैं। यदि इसमें लेशमात्र भी सच्चाई है तो यह बेहद गंभीर मामला है। रमन सिंह के इस बयान के मद्देनज़र नक्सलियों को आतंकवादी कहना भी ग़लत नहीं होगा और उनके विरुध्द भी आतंकवादियों जैसा व्यवहार करना होगा। तथाकथित मानवाधिकारवादियों को भी यह सोचना होगा कि जो लोग लोकतांत्रिक व्यवस्था के विरुध्द अघोषित युध्द छेड़े हुए हैं, उनकी हिमायत देश को भारी पड़ सकती है। नक्सलवादी या माओवादी समतावादी समाज के गठन की वक़ालात करते हैं, किंतु उनके गोपनीय दस्तावेज़ बताते हैं कि वे खुलेआम लोकतांत्रिक व्यवस्था की मुखालफ़त कर रहे हैं।

         जिस माओ त्से तुंग के नाम पर माओवाद पनपा है, उस माओ ने चीन की सत्ता हासिल करने के लिए हिंसा का सहारा लिया था और आम जनता से असहमति का अधिकार छीन लिया था। सांस्कृतिक क्रांति के नाम पर उसी माओ ने लोगों को सार्वजनिक रूप से यातनाएं देकर मारा था। उसने महिलाओं और बच्चों को भी भारी प्रताड़ित किया था। भारत में भी माओवादी यही कर रहे हैं। समतावादी व्यवस्था का ढोंग करने वाले इन माओवादियों ने आज तक एक भी धानाढय व्यक्ति को नहीं मारा है, क्योंकि वे उन्हें चंदा देते हैं। माओवादियों के निशाने पर ग़रीब आदिवासी ही होते हैं, जिनके बच्चों को अपने बल पर नक्सली बनाते हैं। माओवादी क्रियाकलापों से असहमति जताने वाले आदिवासियों को सरेआम गला रेत कर मारा जाता है।

        यदि माओवादी आदिवासियों को न्याय दिलाना चाहते हैं तो स्कूलों को बमों से क्यों उड़ाते हैं ? जगह-जगह बारूदी सुरंग बिछा कर आम जनता की जान क्यों ले रहे हैं ? हाट बाजारों को बंद करवा कर वे आदिवासियों का कितना भला कर रहे हैं। दरअसल हक़ीकत यह है कि आदिवासियों की बेहतरी के नाम पर सत्ता हथियाना चाहते हैं। हिंसा के ज़रिये सत्ता हासिल करने का सपना संजोए बैठे नक्सली सत्ता में आने के बाद क्या गांधीवादी हो जाएंगे ? नहीं, कतई नहीं, बल्कि वे और हिंसक हो जाएंगे और लोकतंत्र को कुचल कर रख देंगे, जहां आम आदमी का सांस लेना भी मुश्किल हो जाएगा। जो लोग पिछड़ेपन को नक्सलवाद पनपने का कारण मानते हैं, उन्हें यह दिखाई क्यों नहीं देता कि आदिवासी क्षेत्रों में आदिवासियों की सुविधा के लिए जो भी विकास कार्य किए गए, वे इन्हीं नक्सलियों ने ध्वस्त किए हैं। बस्तर में सलवा जुडूम के नाम पर जब आदिवासी एकजुट हुए तो नक्सलियों को अपनी ज़मीन हिलती नज़र आई। इससे बौखला कर ही वे सामूहिक हत्याएं करने पर उतर आए। इससे एक बार फिर साफ़ हो गया कि नक्सलियों की मंशा क्या है।

         नक्सलवाद को लेकर राज्य सरकारों का रुख़ साफ़ है और वे कड़ाई से कार्रवाई करना चाहते हैं। केन्द्रीय गृहमंत्री पी. चिदंबरम भी ऐसा ही चाहते हैं, किंतु तथाकथित बुध्दिजीवी और मानवाधिकारवादी इसका विरोध कर रहे हैं। नक्सली जिस तरह एक के बाद एक वारदात करते जा रहे हैं, उसे देखते हुए अब यह ज़रूरी हो गया है कि केन्द्र अब निर्णायक लड़ाई छेड़े ? बस्तर में जिस तरह आम नागरिकों को बेमौत मारा जा रहा है, उससे आम जनता दहशत में है। जो लोग नक्सलियों को आतंकवादी कहने पर ऐतराज़ जता रहे हैं, उन्हें सुकमा के पेड़ों पर टंगे शवों के चीथड़ों को देखने जाना चाहिए। उन्हें पता चल जाएगा कि नक्सली किसी भी आतंकवादी संगठन से कमतर नहीं हैं। ऐसे राष्ट्रविरोधी तत्वों के खिलाफ़ हर तरह की कड़ी कार्रवाई जायज़ होगी। उम्मीद है कि केन्द्र सरकार अब कोई ठोस क़दम उठाने से नहीं हिचकेगी।

महेश बाग़ी