संस्करण: 24 मई-2010

मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह
आत्मावलोकन करें !
 

गोविंद गोयल

त्तीसगढ़ बनने के लगभग 10 वर्ष बाद भी बस्तर एवं छत्तीसगढ़ के आदिवासियों के विकास एवं आदिवासी क्षेत्र में शांति के स्थायी हल पर श्री दिग्विजय सिंह द्वारा अपने विचार रखने पर छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री ने विचलित होकर जिस तरह से विज्ञप्ति प्रकाशित करायी है उसी से यह संकेत मिलता है कि छत्तीसगढ़ व वहां आदिवासियों के कल्याण से संबंधित मुद्दों में स्वयं मुख्यमंत्री उन्हें कितनी गंभीरता से ले रहे हैं और उससे श्री दिग्विजय सिंह व उनके वक्तव्य की छत्तीसगढ़ के संदर्भ में प्रासंगिकता स्पष्ट हो जाती है।

श्री रमन सिंह ने यदि दिग्विजय सिंह के आलेख को पढ़ कर विचारमंथन किया होता तो शायद ऐसा प्रेस नोट जारी करने के स्थान पर अपनी नीतियों पर पुनर्विचार करने की सोचते। जहां तक श्री दिग्विजय सिंह के अतिमहत्वाकांक्षी होने का प्रश्न है, पिछले 10 वर्षों से कोई पद न लेने की शपथ पर दृढ़ रहना आज की राजनीति में कितने लोग कर सकते है ? भाजपा के आडवाणी जी जैसे नेताओं ने तो अपनी महत्वाकांक्षाओं के लिए वाजपेयी जी सरीखे अपने नेताओं को ही नेपथ्य में डाल दिया था व उनके नेतृत्व में लड़े गये इस लोकसभा चुनाव में हुई बुरी पराजय के बावजूद आरएसएस के दबाव में ही उन्होंने विपक्ष के नेता का पद छोड़ा। चिंतलनार घटना के पश्चात केन्द्रीय गृहमंत्री ने नैतिक आधार पर मंत्री पद से इस्तीफा देने की पेशकश की किन्तु डॉ. रमन सिंह ने कानून व्यवस्था राज्य का विषय होने के बावजूद मुख्यमंत्री पद छोड़ने की पेशकश करने का नैतिक साहस भी नहीं किया।

छत्तीसगढ़ व बस्तर सदैव दिग्विजय सिंह के प्रिय रहे हैं। बस्तर में उन्होंने सामान्यत: अनुविभागीय अधिकारी, अपर कलेक्टर, कलेक्टर एवं पुलिस के पदों पर युवा, ईमानदार एवं ऊर्जावान अधिकारियों की पदस्थापना आदिवासियों के हित में की थी। आज स्थिति क्या हैं ? माननीय मुख्यमंत्री जी स्वयं जानते हैं। राज्य विभाजन के समय भी छत्तीसगढ़ के हितों का दिग्विजय सिंह द्वारा बराबर ध्यान रखा गया था। विद्युत उत्पादन इकाइयों व विद्युत खपत का दृष्टिगत रखते हुये छत्तीसगढ़ सरप्लस विद्युत का क्षेत्र प्रदेश विभाजन के समय था व छत्तीसगढ़ की विद्युत उत्पादन इकाईयों में से मध्यप्रदेश के लिए विद्युत हिस्से की मांग की जा सकती थी किन्तु ऐसी मांग छत्तीसगढ़ के हितों को देखते हुए उनके द्वारा उदार दृष्टिकोण रखते हुये नहीं की गयी जिससे विभाजन के पश्चात शेष मध्यप्रदेश, गंभीर विद्युत संकट से जूझता रहा और बाद में भारतीय जनता पार्टी ने विद्युत संकट को ही 2003 के विधानसभा चुनाव में मध्यप्रदेश में मुख्य हथियार बनाया। आज छत्तीसगढ़ का आम किसान उसी विद्युत सरप्लस क्षेत्र में विद्युत संकट से परेशान है।

श्री रमन सिंह के लगभग सात वर्षों के कार्यकाल में हुये विकास का मूल्यांकन तो इसी तथ्य से लग जाता है कि उनके वर्तमान में चल रहे सुराज कार्यक्रम का आम जनता कितना विरोध कर रही हैं। यदि विकास कार्य आम जनता की संतुष्टि के होते तो क्या शासकीय कर्मचारियों को ऐसा विरोध झेलना होता ? बस्तर का कबाड़ा करने में दिग्विजय सिंह की भूमिका है या रमन सिंह की, यह इसी से पता चल जाता है कि दिग्विजय सिंह के कार्यकाल में बस्तर में आदिवासी शासकीय योजनाओं के अंतर्गत अपने गांव में रोजगार प्राप्त कर शांति से निवास कर रहे थे व उनके बच्चे शासकीय शालाओं में पढ़ रहे थे, जबकि डॉ. रमन सिंह के कार्यकाल में बस्तर के लगभग 700 गांव उनकी अदूरदर्शी नीतियों के कारण बेचिराग हो गये हैं। गरीब आदिवासी व उनके बच्चे घर व शालाओं को छोड़कर विस्थापित के रूप में शिविरों में रहने पर मजबूर हैं। विकास को सर्वोच्च प्राथमिकता देने के कारण ही दिग्विजय सिंह के समय नक्सली समस्या बस्तर के सीमित क्षेत्र तक ही थी, जबकि 700 से ज्यादा गांव उजड़ने के कारण अब स्वयं डॉ.रमन सिंह ने यह स्वीकार किया है कि जब तक उन (नक्सल प्रभावित) क्षेत्रों में राज्य अपना प्रभुत्व स्थापित कर उन्हें अपने नियंत्रण में नहीं ले लेता तब तक विकास नहीं किया जा सकता। माननीय रमन सिंह जी क्या स्पष्ट करेंगे कि उनके कार्यकाल में ऐसी क्या कमियां रही जिनसे छत्तीसगढ़ का बड़ा हिस्सा उनके अनुसार राज्य के नियंत्रण् से ही बाहर हो गया।

डॉ. रमनसिंह लगातार भ्रामक अभियानों व कार्यक्रमों के जरिये छत्तीसगढ़ में उनके कार्यकाल में बढ़ गई मूल जन समस्याओं से जनता का ध्यान हटाने के प्रयास करते रहे है किन्तु कम से कम इस घटना के बाद अब उन्हें गंभीरता से दूसरों पर आरोप लगाने के पहले अपना व अपने शासन काल का आत्मावलोकन कर छत्तीसगढ़ के नागरिकों को शांति, सुरक्षा एवं समृध्दि प्रदान करने हेतु ईमानदारी से प्रयास करना चाहिये।

गोविंद गोयल
(लेखक म.प्र. कांग्रेस कमेटी के पूर्व महामंत्री है)