संस्करण: 24 मई-2010

अजमेर बम धमाके
क्या इन्दौर हिन्दुत्व आतंक की
'राजधानी' बना है ?


 

 

 

सुभाष गाताड़े

जाद हिन्दोस्तां का पन्द्रहवां बड़ा शहर इन्दौर, जो वहां होलकर घराने की न्यायप्रिय शासक अहिल्याबाई होलकर के नाम से अधिक जाना जाता रहा है, तथा आज की तारीख में मध्यप्रदेश की व्यावसायिक राजधानी है वह इक्कीसवीं सदी की दूसरी दहाई के मुकाम पर एक अलग पहचान धारण करता जा रहा है। और यह एक ऐसी पहचान है जो हर न्यायप्रिय इन्दौरवासी के लिए बेहद अपमान का सबब बन रही है। कुछ लोगों ने तो यह भी कहना शुरू कर दिया है कि जिस तरह जिहादी आतंकवाद के नाम पर कुछ गुमराह युवकों की करतूतों के चलते साझी संस्कृति एवम साझी विरासत के प्रतीक आज़मगढ़ को बदनाम किया जा रहा है वही सिलसिला इन्दौर के साथ भी हो रहा है।

इसे इत्तेफाक कहें या किसी संगठन विशेष की योजना का हिस्सा कि हाल के समयों में देश में हुई चन्द आतंकी घटनाओं के तार इसी शहर से जुड़े दिखते हैं और यहां हम जिसे जिहादी आतंकवाद कहा जाए सिर्फ उसकी बात नहीं कर रहे हैं। लोगों को याद होगा कि बमुश्किल तीन साल पहले इन्दौर के पास स्थित पीतमपुरा नामक औद्योगिक इलाके से पाबन्दीशुदा 'सिमी' अर्थात स्टुडेंटस इस्लामिक मूवमेण्ट आफ इण्डिया के चन्द कार्यकर्ता ही नहीं उनके लीडर भी पकड़े गऐ थे और मध्यप्रदेश की पुलिस ने सिमी के नेटवर्क को नष्ट करने का दावा किया था।

दरअसल जिहादी आतंकवाद का जवाब देने के नाम पर हिन्दुओं के उग्र हिस्से में जो हिंसक प्रतिक्रिया जनम ले रही है, उसके कई सूत्र इसी शहर से जुड़े दिखते हैं। इनमें सबसे ताजा मसला दरअसल 11 अक्तूबर 2007 में अजमेर शरीफ के दरगाह पर हुए बम विस्फोट से जुड़ा है अब खुद पुलिस यह कह रही है कि अभिनव भारत के आतंकवादियों ने अजमेर बम धमाके के अंजाम दिया है, जिंससे जुड़े कई कारिन्दे इसी शहर में रह कर अपनी गतिविधियों का संचालन करते रहे हैं।

इस सिलसिले में जिन लोगों को गिरफ्तार किया गया है उससे यह बात अधिक पुष्ट हुई है। तीस अप्रैल को अजमेर के बिहारीगंज मुहल्ले से हुई देवेन्द्र गुप्ता की गिरफ्तारी इस मामले में अहम थी, जिसका मोबाइल फोन कई महिनों से पुलिस ने निगरानी पर रखा था। अजमेर बम धमाके में जो सिम कार्ड बरामद हुए थे, उन्हें इन दिनों झारखण्ड में रहनेवाले देवेन्द्र गुप्ता ने ही खरीदा था। देवेन्द्र की निशानदेही पर मध्यप्रदेश के रहनेवाले चंद्रशेखर और विष्णु पाटीदार को दूसरे दिन गिरफ्तार किया गया, बाद में पाटीदार को शुरूआती पूछताछ के बाद रिहा किया गया। पुलिस रेकार्ड में यह बात भी दर्ज थी देवेन्द्र गुप्ता इन्दौर निवासी सुनील जोशी नामक हिन्दूवादी संगठन के एक प्रचारक से भी जुड़ा था, जिसकी दिसम्बर 2007 में रहस्यमय ढंग से हत्या हुई थी।

पिछले दिनों राजस्थान के गृहमंत्री शान्ति धारीवाल ने मीडिया को यह भी बताया कि पुलिस को गुजरात के डांग जिले में सक्रिय स्वामी असीमानन्द की भी तलाश है जो अजमेर बम धमाके का मुख्य सूत्रधार कहा जा सकता है। याद रहे कि पिछले साल ही राजस्थान आतंकवाद विरोधी दस्ते ने अपनी तफ्तीश में इस बात का संकेत दिया था कि गरीब नवाज की दरगाह पर जहां हिन्दु और मुसलमान दोनों प्रार्थना करने आते हैं, वहां के इस बम विस्फोट के पीछे अतिवादी हिन्दू समूहों का हाथ है। अंग्रेजी अख़बार 'मेल टुडे' ने ('मालेगांव एक्यूजड हैड रोल इन अजमेर, कृष्ण कुमार, 19 अप्रैल 2009) लिखा : ''महाराष्ट्र एटीएस का मानना है कि मालेगांव बम धमाके में जिन तीन संदिग्धों ने बम रखा था, उनकी गिरफ्तारी से ही हैद्राबाद के मक्का मस्जिद एवम अजमेर शरीफ बम धमाके के सुराग मिल सकते हैं।''

ताजे समाचारों के मुताबिक राजस्थान का आतंकवाद विरोधी दस्ते के लोग इन दोनों अभियुक्तों मध्यप्रदेश के इन्दौर तथा अन्य कई ठिकानों पर ले जाने की योजना बना रहे हैं ताकि इस बम विस्फोट में शामिल अन्य सूत्रों को तलाशा जा सके। इतना ही नहीं प्रस्तुत दस्ते ने महाराष्ट्र के आतंकवाद विरोधी दस्ते से सुनील जोशी से जुड़ी फाइलें भी मंगाई हैं जिसने कथित तौर पर अजमेर बम धमाकों की योजना देवेन्द्र गुप्ता के साथ बनायी थी। दस्ते के अधिकारियों का यह भी मानना है कि गुप्ता एवम सुनील जोशी के फोन के विवरण बताते हैं कि दोनों एक दूसरे के गहरे सम्पर्क में थे।

अगर हम मालेगांव, अजमेर एवं मक्का मस्जिद बम धमाके में चली सीबीआई जांच पर गौर करें तो (हिन्दुस्तान टाईम्स, 10 मई 2010, इन्दोर टेरर आउटफिट बिहाइंड थ्री ब्लास्टस!) तो वह इस बात को स्पष्ट करती है कि बम धमाके में अंजाम देने के काम में हिन्दुत्व के इन आतंकियों का हाथ सिर्फ इसी शहर तक सीमित नहीं है। जांच के मुताबिक चाहे मई 2007 के हैद्राबाद के मक्का मस्जिद बम धमाके को देखें, अक्तूबर 2007 के अजमेर बम धमाके को देखें या सितम्बर 2008 के मालेगांव बम धमाके को देखें तो इन्दौर के इस आतंकी मोडयूल की अहम भूमिका नजर आती है। इस मोडयूल के सदस्यों में सुनील जोशी, रामजी कलासांगरा, देवेन्द्र गुप्ता, समीर डांगे और स्वामी असीमानन्द जैसों के नामों का वह विशेष उल्लेख करती है। मालूम हो कि हेमन्त करकरे की अगुआई में जब मालेगांव बम धमाकों की जांच चल रही थी उस वक्त इनमें से कई नाम सूर्खियों में थे और उसी वक्त यह बात उजागर हुई थी कि रामजी कलासांगरा, असीमानन्द जैसे लोग फरार हैं। वैसे यह भी महत्वपूर्ण है कि समझौता एक्सप्रेस बम विस्फोट में जो जांच हरियाणा पुलिस ने शुरू की थी, उसके भी कुछ सूत्र इन्दौर तक पहुंचे दिखे थे। समझौता एक्सप्रेस के बम विस्फोट में जिन सूटकेसों को बरामद किया गया था, तथा जिन अख़बारों का इस्तेमाल हुआ था, उनकी टोह लेते हरियाणा पुलिस इन्दौर पहुंची थी। वह उस दुकान पर भी पहुंची थी, जहां से ये सूटकेस बेचे गए थे। मगर पूरे काण्ड को लेकर मध्यप्रदेश पुलिस का जिस किस्म का असहयोगात्मक रूख था, उससे वह जांच आगे नहीं बढ़ पायी। हरियाणा पुलिस ने मध्यप्रदेश पुलिस के इस असहयोग की सार्वजनिक आलोचना भी की थी।

मामले की अधिक तहकीकात करने पर हम इस तथ्य से भी रूबरू होते हैं कि दिसम्बर 2003 में जबकि मध्यप्रदेश में दिग्विजय सिंह की अगुआईवाली कांग्रेस सरकार थी तब इस आतंकी मोडयूल ने पहली दफा अपना हाथ आजमाया था। सीबीआई जांच बताती है कि भोपाल में हर साल आयोजित होनेवाले मुसलमानों के सम्मेलन 'इज्तेमा' के दौरान जबकि दूरदराज से भी हजारों की तादाद में मुस्लिम भोपाल पहुंचते हैं, घांसीपुरा में रिमोट कन्ट्रोल से संचालित बम रखा गया था, जिसे पुलिस की सावधानी से निष्क्रिय किया जा सका। पिछले दिनों जब श्री दिग्विजय सिंह गृहमंत्री पी. चिदम्बरम् से मिलने पहुंचे तो उन्होंने नक्सलवाद की समस्या के साथ उनसे 'हिन्दू अतिवाद' की इस परिघटना पर भी बातचीत की थी। पत्रकारों से बात करते हुए श्री दिग्विजय सिंह ने इस बात पर आश्चर्य प्रगट किया था कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक रहे सुनील जोशी की रहस्यमय हत्या की जांच में सूबे की पुलिस ने विशेष रूचि नहीं दिखायी और अपनी फाइल बन्द कर दी।

अजमेर, मक्का मस्जिद, मालेगांव बम धमाकों के पीछे उजागर होते इस डरावने सच से हम क्या अहम नतीजा निकाल सकते हैं ? यही कि हिन्दोस्तां की पुलिस मशीनरी को अगर बिना किसी पूर्वाग्रह के पेशेवर ढंग से काम करने की इजाजत दी जाए तो वह आसानी से सच्चाई की तह तक पहुंच सकती है। यह तभी सम्भव है जब सियासतदां अपने विशिष्ट आग्रहों को उन पर न थोपें या उनकी जांच में गैरजरूरी दखलंदाजी न करें। पिछले दिनों भाजपा के वरिष्ठ नेता वैंकेया नायडू ने यह बयान दिया कि 'आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता।' बात अपने आप में बिल्कुल दुरूस्त है। मगर वह क्या इस सन्दर्भ में भी कुछ रौशनी डाल सकेंगे कि जब तक सूबा राजस्थान में उनकी अपनी पार्टी की हुकूमत थी, तब तक कमसे कम अजमेर बम धमाके के असली सूत्रधारों तक पहुंचने में उनकी सरकार क्यों असफल रही ?

ढाई साल से अधिक वक्त गुजर गया जब अजमेर शरीफ के बम धमाके में 42 वर्षीय सैयद सलीम का इन्तक़ाल हुआ था। महान सूफी सन्त ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की इस दरगाह पर 11 अक्तूबर 2007 को बम विस्फोट में जो दो लोग मारे गए थे, उनमें एक वह भी शामिल थे। मालूम हो कि इस धमाके में तमाम लोग बुरी तरह घायल भी हुए, जब वह प्रार्थना करने की मुद्रा में थे। गौरतलब है कि हैद्राबाद के निवासी सैयद सलीम के आत्मीयजनों को उनकी इस असामयिक मौत से उपजे शोक के साथ साथ एक और सदमे से गुजरना पड़ा था। और इसकी वजह थी पुलिस एवम जांच एजेंसियों का रूख जिन्हें यह लग रहा था कि सैयद सलीम खुद इस हमले के पीछे थे। हम कल्पना ही कर सकते हैं कि मामले की जांच के लिए राजस्थान से हैद्राबाद पहुंची पुलिस की टीम ने परिवार को किस कदर मानसिक तौर पर प्रताडित किया होगा और किस तरह शेष समाज के लोगों ने इस 'आतंकी' परिवार के साथ अपने रिश्तों को बिना कहे पुर्नपरिभाषित किया होगा।

लोगों को याद होगा कि अजमेर बम धमाके के बाद अक्सर जैसा कि उस वक्त की रवायत थी - जबकि अतिवादी हिन्दुत्व का मसला सूर्खियों में नहीं पहुंचा था - चन्द अतिवादी इस्लामिक संगठनों को इस बम काण्ड के लिए जिम्मेदार ठहराया गया था। कई लोगों को गैरकानूनी ढंग से हिरासत में लिया गया, तमाम लोगों से पूछताछ की गयी, सूचना पाने के लिए तमाम लोग यातना का शिकार बना दिए गए। मीडिया भी इस मामले में पीछे नहीं रहा, उसने आतंकवादियों की योजनाओं और इस अमानवीय एवम बर्बर कृत्य के तर्जे अमल पर सनसनीखेज स्टोरी प्रकाशित की और बिना किसी सबूत के यह भी बताया कि इस घटना के सूत्र 'सरहद पार' जुड़े हुए हैं। विडम्बना यही कही जाएगी कि तत्कालीन गृहमंत्री शिवराज पाटिल ने भी यही राग अलापा था।

वे सभी जो हिन्दोस्तां के विभिन्न बम धमाकों के मामलों की खोजख़बर रखते रहे हैं वे बता सकते हैं कि अजमेर बम धमाके को लेकर रफ्ता रफ्ता उजागर होते डरावने सच के पहले ही मक्का मस्जिद बम धमाके (मई 2007) - जिसमें नौ निरपराधों की मौत हुई थी और बाद में हुई पुलिस फायरिंग में भी चन्द लोग मारे गए थे - की पुलिसिया कहानी पहले ही धराशायी हो गयी है। यह बात अब इतिहास हो चुकी है कि किस तरह इस काण्ड के लिए पहले लष्कर ए तोइबा और सिमी को जिम्मेदार ठहराया गया था। हैद्राबाद के विभिन्न इलाकों से निरपराध मुस्लिम युवकों को उठाया गया था और महिनों तक गैरकानूनी हिरासत में रखा गया था। सभी को जबरदस्त यातनाएं दी गयीं ताकि वह इस अपराध में अपनी सहभागिता कबूल करें। अन्तत: नागरिक अधिकार संगठनों को इन गैरकानूनी हिरासत के खिलाफ उच्च न्यायालय में हेबियस कार्पस याचिकाएं दायर करनी पड़ीं और उन्हें रिहा करवाना पड़ा।

उम्मीद की जानी चाहिए कि अब जबकि इक्कीसवीं सदी की पहली दहाई में हुए कई महत्वपूर्ण बम विस्फोटों में हिन्दुत्व आतंकियों की सहभागिता स्पष्ट हो रही है तो अब कम से कम पुलिस महकमे के लोग अपनी जांच में अधिक निष्पक्षता बरतेंगे और निहित स्वार्थी तत्वों द्वारा फैलायी गयी इस थियरी से - सूफी स्थलों पर हमले का काम पारम्पारिक किस्म के मुस्लिम ही करते हैं जो कथित तौर सूफी मत के कई बातों से सहमत नहीं है - तौबा करेंगे।

 सुभाष गाताड़े