संस्करण: 23 सितम्बर-2013

म.प्र. में युवाओं का लगातार शोषण

? डॉ. सुनील शर्मा

                ला संकाय में स्नातकोत्तर एवं बीएड उपाधि धारी रमाकांत म.प्र. के एक स्कूल में वर्षो से अतिथि शिक्षक का कार्य कर अपना जीवन काट रहें है। रमाकांत बर्ष 2005 और 2008 की संविदा शिक्षक पात्रता परीक्षा भी पास का सर्टिफिकेट भी रखे हुए हैं, लेकिन वो न तो 2005 में संविदा शिक्षक बन पाए और न ही 2008 में क्योंकि सरकार ने खाली पदों के अनुरूप भर्ती ही नहीं की। रमाकांत के साथ बिडंबना ये है कि वो वर्ष 2011 की पात्रता परीक्षा को पास नहीं कर पाए अत: वर्तमान में सत्र जारी भर्ती प्रक्रिया से बाहर कर दिए गए। इस पर रमाकांत का कहना है कि जब वो एक नहीं दो बार पात्रता परीक्षा उत्तीर्ण  कर चुकें हैं तो वो इस पात्रता की दौड़ में कब तक दौड़गें? रमाकांत का प्रश्न यह भी क्या समय के साथ क्या आदमी अर्हता घट जाती है, जो उसे बार बार परीक्षणों के दौर से गुजरना पड़े? और यह अर्हता परीक्षा कोई मुफ्त में तो होती नहीं है। हर बार सरकार भारी भरकम फीस लेती है। रमाकांत का यह तर्क भी दमदार है कि उनके पास तमाम उपाधियॉ हैं है दो बार पात्रता परीक्षा का पास की है और वर्षों  से स्कूल में पढ़ाने का अनुभव तो फिर उनमें स्थाई अधयापक बनने में कमी क्यों देखीं जा रही है, और उन्हें मनमाने ढंग से भर्ती प्रक्रिया से बाहर क्यों किया जा रहा है। रमाकांत का मानना है कि  अच्छा तो ये होता कि पिछली पात्रता परीक्षाओं केर् उत्तीण अभ्यर्थियों के नियोजन के बाद ही नई परीक्षा का आयोजन किया जाता या फिर पात्रता परीक्षा की रस्म सिर्फ एक बार पास करने की जरूरी होती लेकिन सरकार ने इसमें तीन साल की बैधता की शर्त लगाकर प्रदेश के लाखों बेरोजगार युवाओं के साथ छल किया है। और बार बार परीक्षा की शर्त को बेरोजगार युवाओं को लूटने का उपक्रम बना लिया है। वास्तव में प्रदेश सरकार की इस अनीति से सिर्फ रमाकांत अकेले पीड़ित नहीं है वरन लाखों युवाओ का भविष्य बर्बादी के कगार पर है। पढ़े लिखे युवा एक मजदूर से भी कम वेतन पर वर्ष के कुछ माह अतिथि शिक्षक बन कर अपना जीवन काट रहें हैं जबकि उनके पास तमाम योग्यताएॅ है।

                वैसे प्रदेश सरकार की युवाओं के शोषण की कहानी यहीं नहीं थमती आगे कहानी ये है कि वर्ष 2011 की पात्रता परीक्षा में ऐसे उत्तीर्ण युवा जो डीएड या बीएड  नहीं है वो भी शिक्षक नहीं बन पा रहे हैं क्योंकि वो आरटीई के अनुकूल पात्र नहीं हैं? अगर वो पात्र नहीं है तो उनको परीक्षा में ही क्यों बैठने दिया ? क्या सिर्फ व्यापम के जरिए खजाना भरने ? जो युवा अध्यापक बन चुके हैं  उनके हालात भी बदतर ही हैं, उललेखनीय है कि वर्ष 2003 में पहली बार बीजेपी की सरकार बनने के बाद से ही सरकार का सारा अमला कहता रहा कि इस संवर्ग के लिए समान कार्य समान वेतन की व्यवस्था करेंगे और अब दस साल के बाद चुनाव के ऐन वक्त समान कार्य और समान वेतन का जो झुनझुना पकड़ाया है उससे सारे के सारे अध्यापक अवाक् है, और विरोध प्रदर्शन करते हुए कह रहें हैं कि  इसके चमत्कारी सूत्र ने उन्हें ठगने का ही काम किया है। वर्ष 2008 में दोबारा बीजेपी सरकार बनने के बाद से ही सरकार के मुखिया और मंत्री लगातार घोषणा करते थे कि हम एक लाख शिक्षकों की भर्ती करेंगें लेकिन पॉच साल में इनके ऑकडे अपनी घोषणा से काफी पीछे रह गए ? भर्ती प्रक्रिया की धीमी रफ्तार और प्रशासनिक मनमर्जी के चलते 2011 की पात्रता परीक्षा पास हजारों युवाओं पर उनके  पात्रता परीक्षा सर्टिफिकेट की वैधता खत्म होने का खतरा मंडरा रहा है। जिससे ये हजारो सुपात्र युवा या तो नौकरी के लिए ओवरएज होकर बेरोजगारी का दंश भोगेंगे या फिर पुन: पात्रता परीक्षा की कसौटी पर बैठने मजबूर हाेंगे। युवाओं के शोषण की कहानी यहीं नहीं थमती प्रदेश के महाविद्यालयों में कार्यरत अतिथि शिक्षक जिन्हें अतिथि विद्वान कहते हैं वर्षों से सरकार के शोषण का शिकार है। महाविद्यालयों में कार्यरत ये अतिथि शिक्षक पीएचडी जैसी सर्वोच्च उपाधि  और नेट जैसी पात्रता परीक्षार् उत्तीण होने के बाद भी चपरासी से भी कम वेतन पर वो भी कालखण्ड आधारित व्यवस्था के तहत काम करने मजबूर है। ये अतिथि शिक्षक अपनी मांग के उच्चाधिकारियों के पास जाते हैं वो दंभ से भरे अधिकारियों के पास इनके लिए गेटआउट सुनने मिलता है। एक अतिथि शिक्षक बता रहे थे कि सुना है कि सरकार कालेजो में स्थाई शिक्षकों की भर्ती के लिए व्यापम के जरिए स्लेट परीक्षा कराएगी और व्यापम की ईमानदारी जगजाहिर है वो जितने कुपात्रों को सुपात्र बनाकर कालेज में प्रोफेसर बनने का पात्र बनाएगा उतने ही सुपात्र सड़क पर आ जाएॅगें? वैसे कालेजों में भर्ती के लिए पूर्व में दो बार स्लेट परीक्षा आयोजित की जा चुकी है और इसे पास करने वाले अब भी बेरोजगार घूम रहे हैं और राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा पास भी हजारों की संख्या में बेरोजगार या अतिथि विद्वान के रूप में अर्धा बेरोजगार हैं इनके हित में कोई कदम न उठाकर  व्यापम से पुन: स्लेट परीक्षा की तैयारी सरकार और नौकरशाही की मंशा पर शक पैदा करती है। प्रदेश में निजी क्षेत्र के नियोजको में चाहे वो शैक्षणिक संस्थान हो या फिर व्यावसायिक या औद्यौगिक सब जगह उॅची राजनैतिक पहुॅच वाले दबंगो का बोलबाला है ऐसे में इनमें भी युवा का भरपूर शोषण किया जा रहा है इनमें मन के नियम चलते हैं सरकारी कायदे नहीं।

               वास्तव में प्रदेश में पग पग पर युवाओं का शोषण हो रहा है चाहे वो पात्रता परीक्षाओं के नाम पर हो या फिर नौकरी में भर्ती सब जगह भ्रष्ट्राचार  और भाई भतीजावाद का आलम है। प्रदेश में शिक्षा का निजीकरण सभी स्तरों पर जारी है जिससे पढ़ाई  महंगी और आम विद्यार्थी की पहुंच से बाहर हो गई है सरकारी प्रचार में एजुकेशन लोन का झुनझना बजाया जा रहा हैं लेकिन ये भी गौर करने लायक है कि इसका फायदा कितने गरीबों को मिला है?वास्तव में पिछले दस वर्षा में युवाओं का शोषण हर स्तर पर जारी हैं

                
? डॉ. सुनील शर्मा