संस्करण: 23 मई-2011

किसकी जरूरत है चीयरलीडर्स का जलवा ?
 

? अंजलि सिन्हा

               विश्व कप फुटबॉल मैचों से अधिक चर्चित हुई चीयरलीडर्स की परिघटना,जो आईपीएल क्रिकेट के जरिये यहां पहुंची है,हमेशा ही विवादों में रही है। कुछ समय पहले एक सांवली रंग की लड़की ने बताया कि किस तरह उसके साथ भेदभाव किया गया और उसे टीम से हटा दिया गया। अब ताजा विवाद चीयरलीडर्स की टीम में शामिल एक दक्षिण अफ्रीकी युवती के ब्लॉग के बहाने शुरू हुआ है।

 

               इस युवती ने अपने ब्लॉग में आपबीती का बयान किया है। उसने लिखा है कि वह वही लिख रही है जो उसने महसूस किया है। आईपीएल चीयरलीड़र गॅब्रिएला पासकुओलारो को खेल के दौरान ही तत्काल दक्षिण अफ्रीका वापस भेज दिया गया। उसने खिलाड़ियों के अभद्र बर्ताव के बारे में बताया है कि 'चीयरलीडर्स को लोग 'पीस ऑफ मीट' (मांस के लोथड़े) की तरह देखते है और चलते-फिरते पोर्न की तरह इस्तेमाल करते है।'

 

               मालूम हो कि आई पी एल अर्थात इण्डियन प्रीमियर लीग के बहाने पिछले चार साल से अलग ढंग से क्रिकेट का सिलसिला शुरू हुआ,जिसमें देश विदेश के खिलाड़ी खेलते हैं और अलग अलग खिलाड़ियों की बोली लगती है,उसी के साथ हम लोग क्रिकेट के मैदान पर चीयरलीडर्स से रूबरू हुए हैं। गेम शुरू होने के पहले अलग ढंग से परिधान में सजी इन युवतियों की प्रस्तुतियां एक तरह से क्रिकेट के खेल की तरफ लोगों का ध्यान आकर्षित करने के लिए होती हैं।

 

               निश्चित यह कोई पहली घटना नहीं होगी और न ही मामला सिर्फ गॅब्रिएला का है। देखा जा सकता है कि खिलाड़ी,दर्शक तथा खेल क्षेत्र के अधिकारी और कर्मचारी भी चीयरलीडर्स के साथ छूट लेने में कतराते नहीं होंगे क्योंकि उनकी नियुक्ति ही 'उत्साहवर्धान' के लिए होती है। इस चीयरलीड़र के खुलासे ने 'पर्दे के पीछे' 'ऑफ द पिच पार्टी'की संस्कृति से पर्दा उठा है। वीआइपी के रूप में एकत्र लोग कैसा 'आनन्द' उठाते हैं इसकी झलक इस आत्मकथा टाइप ब्यान में देखी जा सकती है। वह कहती है कि ये नशा करते हैं और उससे उन्हें आसानी से हासिल करने की इच्छा रखते है। दूसरी तरफ आयोजकों का कहना है कि उन्हें उनके काम और भूमिका के बारे में स्पष्ट बताया गया होता है। ताली एक हाथ से नही बजती है और चीयरलीडर्स खुद भी मर्यादा तोड़ती है।

 

               सम्भव है कि इस दूसरी पहल में भी सच्चाई हो फिर भी मुद्दा अपनी जगह पर कायम है जो वहां उपस्थित पुरुषों के नजरिये और कुण्ठित मानसिकता को कठघरे में खड़ा करता है। मूल प्रश्न यह है कि खेलों को लोकप्रिय बनाने के लिए चीयरलीड़र्स की जरूरत क्यों आन पड़ी,जिसकी खेल में रुचि है वह खेल देखेगा इससे काम क्यों नहीं चला ?

 

               इस पूरी घटनाक्रम पर सेलिब्रिटी लोग चुप है चाहे वे शिल्पा शेट्टी हों ,प्रीति जिन्टा हों या नेस वाड़िया हों । इस खेल महकमे से कुछ लोग मीड़िया को बताते हैं कि वे लड़कियां भी वयस्क होती हैं और कॉन्ट्रॅक्ट पर हस्ताक्षर करते समय उनको यहां के वातावरण के बारे में पता होता है। भारत के कुछ खास शहरों में खासतौर पर उत्तर भारत में लड़कियों के साथ ऐसा अपमानजनक व्यवहार आम है। पिछले साल आईपीएल पार्टी में कुछ दर्शक भी घुस गये थे तथा काफी बवाल मचा था। यह भी कहा जाता है कि जो विदेशी चीयरलीडर्स होती हैं उनसे लोग ज्यादा छूट लेते हैं क्योंकि उनका पहनावा अलग होता है ओर भारतीय पुरुषों को आकर्षित करता है। पिछले साल एक मॉड़ल ने कहा कि रैम्प का तख्त जानबूझकर उंचा रखा गया था ताकि दर्शक इन्हें ठीक से देख पायें। इसे आयोजकों ने बकवास आरोप बताया था। एक चीयरलीड़र ने व्यंग में इण्ड़ियन एक्सप्रेस के पत्रकार को बताया कि 'आप क्या सोचते हैं कि दिल्ली के फिरोजशाह कोटला मैदान में मैच में लोग सिर्फ सीटी बजाते हैं' कहने का तात्पर्य यह था कि लोग तरह तरह की अश्लील भंगिमाएं करते हैं।

 

               याद रहे कि दो साल पहले भारत-ऑस्ट्रेलिया के एकदिवसीय मैच में चीयरलीड़र्स की तरह ड्रिंक्सगर्ल्स का जादू भी दर्शकों पर छा गया। ये लड़कियां इण्टरवल के दौरान ड्रिंक्स की ट्रॉली लेकर मैदान में पहुंचती हैं,फिर खिलाड़ी के साथ दर्शक भी निहारते है इन्हें। उड़ीसा में कलिंगसेना के लोगों ने चेताया था कटक में होने वाले मॅचों में चीयरगर्ल्स और ड्रिंकगर्ल्स तंग कपड़ो में नही बल्कि साड़ी में आए। पोशाक चाहे साड़ी हो या स्कर्ट हो उससे औरत के पोजिशन या सम्मान पर कोई फर्क नहीं पड़ता है। कपड़ों के पीछे के शरीर के बारे में ही लोग सोचते-विचारते रहते है। किसी भी कपड़े में लिपटी इन लड़कियों की उम्र 18से 20वर्ष रखी जाती है यानि दर्शकों को कमनीयता भी चाहिये।

 

               अभी ज्यादा दिन नहीं बीता जब बैडमिन्टन वर्ल्ड फेडरेशन की तरफ से महिला खिलाड़ियों के लिए एक नया डेर्स कोड का निर्देश जारी किया गया है। इसके तहत अब उन्हें स्कर्ट में ही खेलना होगा। ऐसा करने के पीछे फेडरेशन की तरफ से यही कारण बताया गया था कि वे बैडमिन्टन को अधिक आकर्षक खेल बनाना चाह रहे हैं। अगर अख़बार में इस सम्बन्ध में जारी रिपोर्टों को देखें तो वह टेनिस के तर्ज पर इसे अधिक 'सेक्सी' और 'ग्लेमरस' बनाना चाह रहे हैं।

 

               इस पर गौर करने की बात थी कि आकर्षक खेल के लिए अच्छा खेलना मायने रखता है या खिलाड़ियों की पोशाक मायने रखती है। फेडरेशन का मानना था कि इसके द्वारा बैडमिन्टन के प्रशंसकों,दर्शकों की संख्या बढ़ेगी तथा स्पॉन्सरशिप भी बढ़ेगा यानि शोहरत और आय के लिए खेल ही नहीं खिलाड़ियों के ''आकर्षण'' को भी बेचा जाना है।

 

                चीयरलीडर्स की चर्चा पर लौटें तो यह इन लड़कियों का नही बल्कि उपभोक्तावादी संस्कृति का जलवा है जिसमें सबकुछ उपभोग के लिये है और पितृसत्ता भी उन्हें उपभोग की वस्तु ही मानती है । वह यदि औरतों को बराबरी और गरिमा का दर्जा देने लगी तो अपनी ही कब्र खोदेगी। अक्सर कई लोग इस भ्रम के शिकार होते हैं कि जो लोग औरत के भारतीय परिधान या भारतीय परम्परा संस्कृति की बात कर रहें वे शायद औरत को सम्मानित जगह दे रहे हैं। दरअसल दोनों ही प्रकार के सोचवालों के लिए औरत का कोई स्वतन्त्र अस्तित्व नहीं है । न ही वो बराबरी की हकदार है। एक के लिए वह घर परिवार में कैद कर निजी इस्तेमाल के लिए है तो दूसरा मुफ्त बाजार में परोसने की हिमायत करता है। औरत की असली मुक्ति तो वही होगी जिसमें वह न देवी समान हो न दासी समान और न ही बिकाऊ माल के बराबर। वह स्वतन्त्र हैसियत वाली बराबर की इन्सान हो जिसमें स्त्रीसमुदाय का होने का कारण वह किसी प्रकार के सामाजिक गैरबराबरी की शिकार न हो ऐसा समाज निर्मित किया जाना बाकी है और जो इसी समाज में मौजूद सही विचारसोच वाले स्त्रीपुरुष दोनों मिलकर बनायेंगे।

 

 
? अंजलि सिन्हा