संस्करण: 23 मई-2011

टिकैत का निधन : खामोश हो गई धरतीपुत्र की दबंग आवाज

? विवेकानन्द

               उन्होंने जीवन भर किसानों के अधिकारों के लिए लड़ाई लड़ी लेकिन कभी उससे लाभ लेने का प्रयास नहीं किया। किसानों के हक के लिए सरकारों से टकराना उनका शगल बन चुका था। हालांकि वे कई बार सियासी चालाकियों के शिकार भी हुए लेकिन जब भी वे सत्ता से टकराए उनके बुलंद इरादों के समाने सरकार को घुटने टेकने पड़े। कोई सरकार ऐसी नहीं थी जो किसानों के साथ अन्याय करके चैन से बैठ सकी हो,नेताओं में खौफ था उनके नाम का उनके संघर्ष का। लेकिन पिछले रविवार को धरती पुत्रों की यह दंबग आवाज हमेशा के लिए शांत हो गई। कैंसर के काल ने किसानों के इस मसीहा को हमारे बीच से उठा लिया।

 

                स्व.टिकैत के जीवनवृत को देखें तो उनका सारा जीवन किसानों के लिए संघर्ष का पर्याय नजर आता है। सिसौली में छह अक्टूबर 1935को एक किसान परिवार में जन्मे टिकैत के कंधों पर महज आठ वर्ष की उम्र में बालियान खाप का दायित्व आ गया। उनके पिता बालियान खाप के चौधरी थे और उनका निधन होने से यह बागडोर टिकैत को संभालनी पड़ी। जिसका उन्होंने उस उम्र में भी समाज के बुजर्गों के परामर्श पर बेहतर संचालन किया। समय गुजरने के साथ बढ़ी समझ और अनुभव उन्हें समाजिक सुधार की ओर ले गया और उन्होंने 1950,1956,1963,2006,2010 में बड़ी सर्वखाप पंचायतों में पूर्ण रूप से भागीदारी रखते हुए दहेज प्रथा,मृत्यु भोज,नशाखोरी भ्रूण हत्या जैसी सामाजिक बुराईयों के खिलाफ आवाज उठाई। इसी दौरान उन्होंने समस्याओं से ग्रसित किसानों के लिए कुछ करने का बीड़ा उठाया। उन्होंने सिसौली में 17 अक्टूबर 1986को एक महापंचायत का आयोजन किया,जिसमें सभी जाति,धर्म और खापों के चौधरियों,किसानों ने भाग लिया। इसी कार्यक्रम में भारतीय किसान यूनियन के गठन की घोषणा की गई और टिकैत को सर्वसम्मति से इसका राष्ट्रीय अध्यक्ष चुना गया। यह वह समय था जब चौधरी चरण सिंह की मृत्यु के बाद किसान राजनीति में एक शून्य पैदा हो गया था।

 

               स्व.टिकैत ने पहली बार सबसे बडा आंदोलन बिजली समस्या के खिलाफ किया। यहीं से वे किसानों के मसीहा के रूप में उभरे। वर्ष 1987में यह आंदोलन करमुखेड़ी बिजलीघर से शुरू होकर पूरे राय में फैल गया। जिसमें लगभग तीन लाख किसानों ने हिस्सा लिया। पुलिस ने गोली चलाई जिसमें दो किसानों की मौत हो गई,जिससे आंदोलन और भड़क गया। अंतत:किसानों के आंदोलन को देखते हुए सरकार को बिजली की दरें घटाने पर मजबूर होना पड़ा। फिर 27जनवरी 1988को मेरठ के आयुक्त का घेराव किया गया। यह घेराव करीब एक महीने तक चला। इसके बाद 11 अक्टूबर 1987 को सिसौली में हुई रैली में 30 लाख किसान शामिल हुए,रैली में तत्कालीन मुख्यमंत्री वीर बहादुर सिंह भी आए। इस आंदोलन ने सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोगों को किसानों की बेजोड़ ताकत का अहसास करा दिया। मेरठ में ही उनको बाबा या महात्मा टिकैत की संज्ञा दी गई। उस वक्त का ऐसा कोई बड़ा नेता नहीं था जो मेरठ न पहुंचा हो। टिकैत की आवाज अब किसानों की आवाज बन चुकी थी,सत्ता में बैठे लोग उनके नाम से ही कांपने लगे थे। इसी उन्होंने रजबपुर सत्याग्रह,दिल्ली के वोट क्लव पर धरना दिया। टिकैते नेतृत्व में सबसे बड़ा आंदोलन भोपा गंगनहर में चला जिसे लोग नईमा कांड के नाम से जानते हैं। तीन अगस्त 1989 को शुरू हुआ यह धरना करीब डेढ़ महीने तक चला और अंतत:सरकार को झुकना पड़ा और किसानों की मांगें माननी माननी पड़ीं। यह वो आंदोलन था जिसमें किसानों ने फोर्स के पैर उखाड़ दिये थे। पुलिसवाले किसानों के बीच जाने से भी घबराने लगे थे।

 

                    भोपा आंदोलन को देखने वाले वे लोग जिन्होंने हाल ही में भट्टा परसौल में हुए किसानों पर अत्याचार को देखा है,का कहना है कि यदि टिकैत स्वस्थ होते तो मायावती सरकार को इसका तगड़ा खामियाजा भुगतना पड़ता। हालांकि कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी और दिग्विजय सिंह परसौल में मोर्चा संभालकर किसानों पर हो रहे अत्याचार को रोकने में सफल रहे लेकिन राजनीतिक मजबूरियों के चलते वे वैसा नहीं कर सकते जैसा टिकैत कर गुजरते। टिकैत को करीब से जानने वाले एक सजन ने इस दौरान उनसे गांव में जाकर मुलाकता की थी। किसानों पर हो रहे अत्याचारों और शोषण के खिलाफ वे खासे गुस्सा थे। कह रहे थे एक बार परमात्मा मुझे बिस्तर से उठा दे तो मैं इन्हें सबक सिखा दूंगा कि किसान के स्वाभिमान से खिलबाड़ का क्या मतलब होता है। मुझे एक बार भट्टा ले चलो तो मैं जालिमों का भट्टा बना दूंगा। बहरहाल होनी को कुछ और ही मंजूर था और किसानों का यह मसीहा सत्ता के कैंसर को मात देने की अभिलाषा पाले शरीर के कैंसर से मात खा गया।

 

                टिकैत अपने जीवन में करीब 20 बार जेल भी गए। किसानों के अधिकारों के लिए उन्होंने उत्तर प्रदेश के अनेक मुख्यमंत्रियों को चुनौती दी और विजय भी हासिल की। चाहे वे मुलायम सिंह हों,अजीत सिंह हों,वीर बहादुर सिंह हों या फिर मायावती। टिकैत के जानने वाले कहते हैं कि यदि टिकैत बीमार न होते भट्टा परसौल में मायवती ने जो किया उसका परिणाम उन्हें भुगतना पड़ता। मुख्यमंत्री मायावती को कथित रूप से उनके द्वारा कहे गए जातिसूचक शब्दों का मामला काफी सुर्खियों में रहा। मायावती ने इसे अपने सम्मान से जोड लिया और टिकैत की गिरफ्तारी के लिए एड़ीचोटी का जोर लगा दिया। उनके गांव की नाकाबंदी कर दी गई,लेकिन टिकैत हाथ नहीं लगे। किसानों ने माया के सिपाहियों का डटकर मुकाबला किया। हालांकि बाद में टिकैत ने कानून का सम्मान करते हुए आत्मसमर्पण कर दिया।

 

               टिकैत ने हमेशा यही प्रयास किया कि उनका संगठन पर राजनीति की छाया न पड़े। लेकिन किसानों के नाम पर स्वार्थ की राजनीति करने वालों के कारण एकाध बार उन्हें झटका भी लगा। एक समय पर पूरे देश का किसान अपने-अपने नेताओं को साथ लेकर टिकैत के साथ आ खड़ा हुआ था। लेकिन जब राजनीतिज्ञों को लगा कि यह तो वोटों पर किसानों का हमला है,तो चतुर देवीलाल ने ऐसी चालें चलीं कि किसानों की ताकत राजनीति का शिकार हो गई। इस घटना में टिकैत के कुछ समर्थकों पर राजनीति का भूत सवार हो गया। परिणाम स्वरूप वे चुनाव में अजीत सिंह के खिलाफ खड़े हो गये और हार का मुंह देखना पडा। राजनीति जीत गई। भाकियू की ताकत क्षीण हो गई। बाबा के अपने ही लोग राजनीतिक दलों में चले गए। लेकिन टिकैत ने हार नहीं मानी। शाखाएं पेड़ों से जुड़ी होती हैं,शाखाएं टूटने से पेड़ नहीं मुर्झाते। टिकैत ने भारतीय किसान यूनियन के वट वृक्ष को पुन: सींचा और एक बार फिर नई ताकत के साथ किसानों के हक में मोर्चा संभाला। अपने अंतिम समय में उन्हें केवल दो कष्ट थे एक तो भट्टा परसौल में हुए किसानों पर अत्याचार का और दूसरा खाप पंचायतों के नाम पर हो रहे कत्लेआम का। हांलाकि वह सगोत्रीय विवाह के खिलाफ थे और ऐसे लोगों का सामाजिक बाहिष्कार के पक्ष में थे। लेकिन उनका कहना था कि खाप पंचायतें किसी की हत्या जैसा फैसला दे ही नहीं सकतीं। यह गांव के कुछ लफंगों की मंडली का काम है। लेकिन दुनिया के सामने वे इस सच को स्थापित कर पाते इससे पहले ही अंतिम सत्य में लीन हो गए। हालांकि 8मार्च को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने उन्हें सरकारी खर्चे पर दिल्ली में बेहतर इलाज की पेशकश की तो उन्होंने कहा कि मेरे इलाज से बेहतर है कि उनके जीते जी केंद्र सरकार किसानों की भलाई में कुछ ऐसा ठोस कर दे जिससे वह आखिरी वक्त में कुछ राहत महसूस कर सकें और उन्हें दिल से धन्यवाद दे सकें।



? विवेकानन्द