संस्करण: 23 मई-2011

भाजपा ने अवसरवादिता के सारे रिकार्ड तोड़े
 

? एल.एस.हरदेनिया

               इस समय कर्नाटक में जो कुछ हो रहा है वह संवैधानिक संकट न होकर नैतिक संकट है। यह संकट उस पार्टी ने पैदा किया है जो आज से कुछ वर्षों पूर्व तक नैतिकता-आधारित राजनीति की दुहाई देते थकती नहीं थी।

               कर्नाटक में एक अत्यधिक उलझन पूर्ण स्थिति निर्मित हो गई है। पिछले वर्ष भाजपा के लगभग दस और कुछ निर्दलीय विधायकों ने कर्नाटक के राज्यपाल को पत्र लिखकर यह सूचित किया था कि वे कर्नाटक की सरकार से अपना समर्थन वापिस ले रहे हैं। इनके समर्थन वापिस लेने से कर्नाटक सरकार अल्पमत में आ गई थी। कुछ ही दिनों बाद, विधानसभा में विश्वास के प्रस्ताव पर मतदान होना था। यदि ये सभी विधायक विश्वास के प्रस्ताव पर मतदान में भाग लेते तो वहां के मुख्यमंत्री को त्यागपत्र देना पड़ता। इस स्थिति से बचने के लिए कर्नाटक विधानसभा के स्पीकर ने उन सभी को विधानसभा की सदस्यता के अयोग्य घोषित कर दिया। स्पीकर के इस निर्णय को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई। हाईकोर्ट ने स्पीकर के निर्णय को सही ठहराया। हाईकोर्ट के निर्णय के विरूध्द सर्वोच्च न्यायालय में अपील हुई। सर्वोच्च न्यायालय ने हाईकोर्ट के निर्णय को रद्द करते हुए विधायकों को निष्कासन को गलत बताया और उनकी सदस्यता बहाल कर दी।

               सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय से भाजपा सरकार पुन: अल्पमत में आ गई क्योंकि ये सभी विधायक सरकार से अपना समर्थन वापिस ले चुके थे परंतु सरकार का यह संकट तब टल गया जब इन सभी विधायकों ने भाजपा को समर्थन देने की घोषणा की। ऐसा करके इन्होंने पुन:दल बदल कर लिया। बताया जाता है कि भाजपा ने इन सभी विधायकों को मंत्री पद देने का आश्वासन दिया गया। इस आश्वासन को केन्द्रीय नेतृत्व का समर्थन प्राप्त था। यह सिध्द करने के लिए इनमें से कुछ विधायकों को दिल्ली ले जाया गया जहाँ केन्द्रीय नेतृत्व ने भी इस आश्वासन को दुहराया। उसके बाद इन विधायकों ने दिल्ली से ही कर्नाटक के राज्यपाल श्री एच.आर. भारद्वाज को फैक्स संदेश भेजा,जिसमें यह कहा गया कि वे सभी विधायक येदियुरप्पा सरकार को अपना समर्थन देने को प्रस्तुत हैं। यहाँ एक महत्वपूर्ण नैतिक प्रश्न उपस्थित होता है। ये वही विधायक हैं,जिन्होंने पिछले वर्ष अक्टूबर में सरकार को अपना समर्थन वापिस लिया था। आज केवल 7-8महीने के अंतराल में वे भाजपा सरकार को पुन:समर्थन देने को तैयार हैं। पुन:समर्थन का आश्वासन देना अपने आप में अनैतिक कृत्य हैं। उससे भी ज्यादा अनैतिकता का प्रदर्शन मुख्यमंत्री और भाजपा के केन्द्रीय नेतृत्व द्वारा किया गया। उन्होंने इन विधायकों के दूसरी बार दलबदल को मान्यता दी और केवल सत्ता में बने रहने के लिए घोर अवसरवादिता का प्रदर्शन किया।

                सच पूछा जाय तो भाजपा को दलबदल से कभी परहेज नही रहा। भाजपा दलबदल की जनक है। भाजपा का पूर्व अवतार जनसंघ,देश के पहिले बड़े दलबदल का पितामह है। जनसंघ ने समाजवादियों और श्रीमती विजयाराजे सिंधिया के साथ मिलकर मध्यप्रदेश की चुनी गई द्वारिका प्रसाद मिश्र सरकार का तख्ता पलटा था। मिश्रजी का विचार था कि दलबदल करने वालों को किसी भी हालत में सत्ता का स्वाद नहीं चखने दिया जाना चाहिए। इसके साथ ही,विधानसभा भंग कर उन्हें दंडित भी किया जाना चाहिए। परंतु मिश्रजी की बात किसी ने नहीं मानी और शायद इसलिए आज दलबल एक भयानक संक्रामक रोग बन गया है। कर्नाटक में तो खुलेआम पदों की रिश्वत देकर विधायकों को वापिस लाने का प्रयास चल रहा है। हो सकता है यह प्रयास सफल हो जाय और कर्नाटक की सरकार सत्ता में बनी रहे। परंतु ऐसा करने का अर्थ होगा उच्च नैतिक मूल्यों की भ्रूण हत्या।

               वैसे भी कर्नाटक की सरकार देश की भ्रष्टतम सरकारों की सूची में शामिल हैं। वहां के दो मंत्री,जिन्हें रेड्डी ब्रदर्स के नाम से जाना जाता है,शायद देश के भ्रष्टतम मंत्री हैं। रेड्डी बन्धुओं ने सरकारी खदानों से दादागिरी से लाखों टन लौह अयस्क निकाला और गैरकानूनी ढंग से उसका निर्यात कर अरबों रूपये कमाए। इसके अतिरिक्त,स्वयं मुख्यमंत्री पर गंभीर आरोप लगे। इनमें से एक आरोप यह है कि उन्होंने करोड़ों रूपये की बेशकीमती जमीन अपने बेटे-बेटियों में बांट दी। इस मामले में वहाँ के लोकायुक्त ने भी आपत्ति उठाई थी और आरोपियों के विरूध्द सख्त दंडात्मक कार्यवाही की सिफारिश की थी। लोकायुक्त ने इस मुद्दे पर कोई कार्यवाही न होने से अपने पद से इस्तीफा भी दे दिया था। चूँकि मामले का संबंध मुख्यमंत्री से था इसलिए उसे दबा दिया गया। चारों ओर से मुख्यमंत्री के इस्तीफे की मांग उठ रही थी। भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी ने इस्तीफे की मांग को ठुकराते हुए कहा था कि मुख्यमंत्री ने जो भी किया वह अनैतिक भले ही हो अवैधानिक नहीं था! स्पष्टत: भाजपा को अब नैतिकता की कम,वैधानिकता की चिंता ज्यादा सताने लगी है। इसी तरह,अब भाजपा को पुन:उन विधायकों का समर्थन लेने में कुछ भी अनैतिक नजर नहीं आ रहा हैं जो पहले अपना समर्थन वापिस ले चुके थे।

               सर्वोच्च न्यायालय ने स्पीकर के निर्णय को रद्द करते हुए उनके द्वारा अपनायी गई प्रक्रिया की काफी कड़े शब्दों में निंदा की थी। उस निंदा के मद्देनजर स्पीकर को अपने पद से इस्तीफा दे देना चाहिए।

                कर्नाटक के साथ-साथ पंजाब में भी भाजपा को एक नैतिक संकट का सामना करना पड़ रहा है। वहां भाजपा के एक नेता को रंगे हाथों रिश्वत लेते पकड़ा गया। इस आपराधिक कृत्य के लिए भाजपा ने उन्हें किसी प्रकार का दंड देना उचित नहीं समझा। उन्हें केवल उनके शासकीय उत्तरदायित्व से मुक्त कर दिया गया। सी.बी.आई. ने रिश्वत के एक मामले में संसदीय सचिव राजकुमार पटेल को गिरतार किया और इसके अतिरिक्त दो मंत्रियों,मनोरंजन कालिया एवं स्वर्ण राम से पूछताछ की। इस गंभीर कलंक से मुक्ति पाने के लिए भाजपा के केन्द्रीय नेतृत्व ने तीनो को पदमुक्त कर दिया। परंतु क्या इतना दंड यथेष्ट है?

                भाजपा सत्ता की खातिर, आदर्शों और उसूलों की बलि चढ़ाने को हमेशा तैयार रहती है। इस बार भी यहीं हुआ।

               वैसे भी पंजाब में सब कुछ ठीक ठाक नहीं है। भाजपा हमेशा राजनीति में वंशवाद का विरोध करती है परंतु पंजाब में वंशवाद का नंगा स्वरूप देखने को मिलता है। पंजाब में अकाली दल और भारतीय जनता पार्टी की मिलीजुली सरकार है। पंजाब की सरकार में मुख्यमंत्री अकाली दल के प्रकाश सिंह बादल है और उप मुख्यमंत्री के पद पर प्रकाश सिंह के पुत्र विराजमान हैं। मुख्यमंत्री की पुत्रवधु सांसद है।

               भाजपा,कांग्रेस के वंशवाद के विरूध्द आवाज बुलंद करती रहती है परंतु उसे अपने सहयोगी के वंशवाद से कोई आपत्ति नहीं है।

               इसी तरह, भ्रष्टाचार के मामले में भी भाजपा के दोहरे मानदंड हैं। भाजपा के नेता (कर्नाटक के रेड्डी बंधु और वहाँ के मुख्यमंत्री)भ्रष्ट होने के बाद भी अपने पद पर बने रह सकते हैं पंरतु यदि कांग्रेस का नेता भ्रष्ट आचरण का आरोपी बनता है तो भाजपा उसे सीधो जेल भेजने की मांग करती हैं।
 

? एल.एस.हरदेनिया