संस्करण: 23 मई-2011

विधानसभा चुनाव परिणामों में राष्ट्रीय दल और राष्ट्रीय एकता का प्रश्न


 

? वीरेन्द्र जैन

               पाँच राज्यों में हुए चुनाव के परिणामों से देश में किसी सुचिंतित राजनीतिक धारा का संकेत नहीं मिलता है जो देश के लोकतंत्र और राष्ट्रीय एकता की दृष्टि से चिंता का विषय होना चाहिए। चालू मीडिया की सतही दृष्टि भले ही इसे कांग्रेस की विजय और बामपंथ की हार के रूप में चित्रित कर रही हो किंतु यथार्थ में ऐसा नहीं है। इन चुनावों में जो मुद्दे उभरे थे वे भ्रष्टाचार,मँहगाई,बदलाव खेरवोरतन,,नक्सलवाद का उभार,विदेशी शरणार्थी आदि थे,जिनमें से कुछ राष्ट्रीय स्तर के थे तो कुछ क्षेत्रीय स्तर की मामूली बातों,और किसी पार्टी के लम्बे शासन से उपजी ऊब से जन्मे थे। खेद की बात है कि साठ साल हो जाने के बाद लोकतंत्र में राजनीतिक परिपक्वता आनी चाहिए थी किंतु उसकी जगह सतही स्थानीयता और सतही उत्तोजना के सहारे देश का भविष्य लिखा जा रहा है।

                इन चुनाव परिणामों में राष्ट्रीय दलों को हुए नुकसान में सबसे निराशा जनक प्रदर्शन बसपा और भाजपा का ही हुआ है। भाजपा जो संसद में मुख्य विपक्षी दल है और पिछले दिनों केन्द्र में जिसके नेतृत्व में सरकार बन चुकी है,की उपस्थिति असम को छोड़ कर कहीं दर्ज नहीं हुयी। भाजपा ने कुल 824 उम्मीदवार मैदान में उतारे थे पर केवल असम में उसे पाँच सीटें बहुत कम अंतर की जीत से मिल सकीं। बाकी राज्यों में यह हिन्दूवादी दल शून्य पर ही रहा। इससे भी बुरा हाल बसपा का रहा जो कोई सीट नहीं जीत सकी। बंगाल और केरल में उनके मतों के प्रतिशत में ह्रास हुआ है।

               कांग्रेस को चुनाव परिणामों से खुश बताया जा रहा है पर उसके खुश होने का कोई कारण नहीं है। तमिलनाडु में उसे कुल पाँच सीटें ही मिल सकी हैं,और उसका गठबन्धन बुरी तरह हार गया है। टीवी के चुनाव विश्लेषण में उसके नेता इसे उसके गठबन्धन के साथी डीएमके के भ्रष्टाचार को दोषी बता रहे हैं किंतु जो एआईडीएमके जीती है उसकी छवि भी इस मामले में कोई खास अच्छी नहीं है। यही हाल पद्दुचेरी पाण्डुचेरी,राज्य में भी हुआ जहाँ उसे सत्ता से दूर होना पड़ा। केरल में जो उसका गठबन्धन जीता है वह बहुत ही कम मार्जिन से जीत पाया है। इस गठबन्धन में भी 49प्रतिशत सीटें दूसरे दलों की हैं इनमें से कई उसके साथ केवल चुनावी साथी की तरह ही गठबन्धन में सम्मिलित हुए थे और उन्हें हर अवसर पर अपनी मित्रता का नवीनीकरण कराना होगा जो उसके सहयोगी दलों की शर्तों पर ही होगा। इस गठबन्धन में भी 20 सीटें तो मुस्लिम लीग की हैं व दस सीटें ईसाइयों की पार्टी केरल कांग्रेस को मिली हैं। इसके साथ उनका बैलेंस बिगाड़ सकने की क्षमता रखने वाले और भी कई दल हैं। इसके विपरीत वामपंथी मोर्चे की मजबूती यह है कि सीपीआई,सीपीएम और आरएसपी को मिला कर ही उनकी 60 सीटें होती हैं। इनको प्राप्त कुल मतों का भी यही अनुपात है। पश्चिम बंगाल में कांग्रेस ने अपनी सीटें पिछले चुनाव से दुगनी कर ली हैं किंतु वे ममता बनर्जी के जूनियर पार्टनर बन कर और बने रहकर ही रहना होगा क्योंकि ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस को अकेले ही 184 अर्थात 61 प्रतिशत से अधिक सीटें मिली हैं। कभी अटल बिहरी बाजपेयी के मंत्रिमण्डल में केबिनेट मंत्री रहने वाली ममता से कांग्रेस को केन्द्र में भी दबाव का सामना करना पड़ेगा। स्मरणीय है कि ममता बनर्जी कभी कभी बेहद बचकानी जिद पर उतर आती हैं और इस्तीफा फेंक मारने में देर नहीं लगातीं। इस तरह कांग्रेस को चाहे केरल हो या बंगाल दोनों ही राज्यों में राजनीतिक दृष्टि से कमजोर ही होना पड़ा है। उसे अगर लाभ हुआ है तो वह दिग्विजय सिंह के प्रभार वाले असम में हुआ है जहाँ पर उसकी सीटें 53 से 78 हो गयी हैं। इससे उसकी स्वतंत्रता में बढोत्तरी हुयी है। उत्तर पूर्व के इस राज्य में आल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट जो इस्लामी तत्ववादियों का दल है,अभी भी बना हुआ है जो भविष्य में कभी भी दुखदायी हो सकता है। दूसरे राज्यों के उपचुनावों में भी कांग्रेस को झटका लगा है वह आन्ध्र प्रदेश में कांग्रेस के विद्रोही जगन मोहन से लोकसभा और उसकी माँ से विधानसभा सीट हार कर आन्ध्र प्रदेश में कमजोर हुयी है तो छत्तीसगढ में लोकसभा की सीट और कर्नाटक उत्तार प्रदेश व नागालैंड में विधानसभा की सीटें वह नहीं छीन सकी है।

               सीपीआई सीपीएम जैसे राष्ट्रीय दलों से बने बाम मोर्चे को दो राज्यों की सरकारों से हाथ धोना पड़ा है और चुनावी राजनीति करने वाले दलों और मीडिया के बीच इसे उन्हें मिले बड़े धक्के के रूप में लिया जा रहा है जबकि ये दल और इनका नेतृत्व अपने तथाकथित शुभचिंतकों से कम चिंतित है। ये दल सत्ता में रहते हुए सत्ता सुख के शौकीन नहीं हुये इसलिए सत्ता का जाना उनका व्यक्तिगत नुकसान न होकर राजनीतिक नुकसान है जब कि उनके दुश्मन और कई दोस्त चुनावी दलों की तरह से ही सोच कर खुश और दुखी होते हैं। वैसे भी कांग्रेस के 170,भाजपा के 5,बसपा के शून्य,की तुलना में इन चुनावों में उनके 150 से अधिक विधायक जीते हैं। इस चुनावी जीत हार के बाद भी अगर कोई दल राजनीतिक रूप से सर्वाधिक निरंतर सक्रिय रहेगा तो वे बामपंथी दल ही होंगे।

               कुल मिला कर इन चुनावों में तृणमूल कांग्रेस के 185 एआईडीएमके के 155 और डीएमके के 25 विधायक मिल कर राष्ट्रीय दलों को मुँह चिढ़ा रहे हैं। यदि चुनावों में इसी तरह क्षेत्रीय दल राष्ट्रीय दलों पर हावी होते गये तो राष्ट्रीय एकता को चुनौती मिलेगी क्योंकि क्षेत्रीय दलों और नेताओं की अपनी सीमित सोच और स्वार्थ होते हैं। ममता बैनर्जी ने केन्द्र की राजनीति करते हुए भी कभी भी बंगाल से बाहर नहीं सोचा और जयललिता तो तामिलनाडु में रहकर भी अपने महल से दूर से दर्शन देती रही हैं। नरेन्द्र मोदी की मित्र जयललिता की सरकार में उनके चुनावी सहयोगी सीपीआई और सीपीएम सम्मलित नहीं होंगे क्योंकि जब तक वे अपने फैसले लागू कराने की स्तिथि में नहीं होते तब तक सरकार में सम्मलित होना पसन्द नहीं करते। राष्ट्रीय एकता की दृष्टि से राष्ट्रीय दलों को इस स्थिति पर मंथन करना चाहिए।


? वीरेन्द्र जैन