संस्करण: 23 मई-2011

धरती के ताप को नियंत्रित करेगी खेती

? डॉ. सुनील शर्मा

                          आज संपन्नता बढ़ने के साथ उपभोग में भी वृध्दि हो रही है जिससे प्राकृतिक संसाधनों की मांग में वृध्दि हो रही है। लेकिन संसाधनों की अपनी सीमा होती है,अच्छे और सहज सुलभ संसाधनों का प्रयोग पहले होता है और उनके समाप्त होते ही घटिया संसाधन प्रयोग में लाए जाते हैं जिनका पर्यावरण पर बुरा असर पड़ता है। लेकिन लोगों में आर्थिक समृध्दि आने तथा प्राकृतिक संसाधनों की कमी से इनका उपभोग बढ़ रहा है जिससे पर्यावरण को क्षति पहुचाने वाली कार्बन डायआक्साइड का प्रतिव्यक्ति उर्त्सजन लगातार बढ़ रहा है। और धरती के पर्यावरण में कार्बनडायआक्साड का बढ़ता जमाव यहॉ के मौसम और जलवायु पर प्रतिकूल असर डाल रहा है। उल्लेखनीय है कि कार्बनडायआक्साइड का जमाव वर्ष 1850 में 290 पीपीएम के स्तर पर था जो कि बढ़कर वर्ष 2008 में 446 पीपीएम के स्तर पर जा पहूचा है। वायुमण्डल में कार्बन के बढ़ते सांद्रण से धरती का औसत तापक्रम भी लगातार बढ़ता जा रहा है। वर्ष 1906 से 2005 के दौरान धरती के औसत तापक्रम में 0.74 डिग्री सेन्टीग्रेड की वृध्दि हुई है। और पिछले पचास वर्षों के दौरान प्रति दशक तापक्रम में वृद्वि की दौगुनी रफ्तार से हो रही है,जहॉ 19 वीं शताब्दी के पहले पचास वर्ष में यह दर 0.07 डिग्री सेन्टीग्रेड प्रति दशक रही,वहीं अगले पचास सालों में यह दर बढ़कर 0.13 सेन्टीग्रेड प्रति दशक हो गई। धरती के औसत तापक्रम में वृद्वि से मौसम चक्र पर प्रतिकूल असर हूआ है,वर्षा की मात्रा में कमी आई है तथा बर्फीले क्षेत्रों में स्थित ग्लेशियरों के पिघलने से समुद्री जल स्तर में वृद्वि हो रही है। समुद्री जलस्तर में वृद्वि से निचले तटवर्ती क्षेत्र जलमग्न हो रहें है। अगर कार्बन उत्सर्जन को नहीं रोका जाता तो गर्माती धरती का समुद्र के गर्भ में विलीन होना तय है। यह सिध्द है कि बढ़ते उपभोग और विकास ने कार्बन उत्सर्जन को बढ़ाया है जिससे धरती का अस्तित्व पर संकट आ गया है,अगर धरती को बचाना है तो हमें विकास और उपभोग रोकना पड़ेगा लेकिन यह असंभव है। विकास होगा तो प्राकृतिक संसाधन घटेगें लगातार जंगल कटेगें,कार्बन उत्सर्जन बढ़ेगा और धरती गर्माएगी। हमारे समक्ष चुनौती है कि हम विकास के साथ धरती को भी बचाए। ऐसे संसाधानों और प्रविधियों का प्रयोग करें जिनसे धरती का बढ़ता ताप नियंत्रित बना रहे। हमारे समक्ष कार्बन रोकने का सबसे सहज तरीका है वृक्षारोपण। चूकि वनीकरण कार्बन से जूझने का एक अच्छा विकल्प है लेकिन खाली जमीन नहीं है वृक्ष कहॉ लगाएगें? और करोड़ों वृक्ष तेजी से बढ़ते कार्बन उत्सर्जन का अल्प अंश ही शोषित कर पाएगें। बेहतर तो ये है कि है वृक्ष काटें ही न लेकिन यह असंभव है। क्योंकि बेतहाशा जनसंख्या वृध्दि से खाद्यान्न की आवश्यकता लगातार बढ़ रही है। इसलिए खेती के लिए जमीन की आवश्यकता लगातार बढ़ेगी जिससे जंगल कटेंगें अर्थात खेती भी धरती को गर्माने के लिए जिम्मेदार है? 

 

               लेकिन धरती को गर्माने से रोकने के तमाम विकल्पों के बीच यही खेती सर्वोत्तम विकल्प नजर आ रही है अब खेती कार्बन से लड़ाई का हथियार बनेगी। इस संदर्भ में ब्रिस्टल विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक ऐंडी रिजवेल और उनके साथी वैज्ञानिकों ने बतलाया है कि खेती के दौरान फसलें वातावरण में ताप कम करने में सहायक होती हैं,ऐसा पौधों की पत्तियों द्वारा सूर्य के प्रकाश को वापिस कर देने की क्षमता तथा कार्बन सोखने के कारण होता है। उल्लेखनीय है कि सूर्य से धरती पर आने वाले प्रकाश के लगभग 13 प्रतिशत हिस्से को वन परावर्तित कर देतें है तथा कार्बन का 22 फीसदी हिस्सा सोखते हैं। जबकि फसली पौधों की पत्तियॉ सूर्य के प्रकाश को परावर्तित करने की अपनी क्षमता के कारण 20 फीसदी सूर्य के प्रकाश को परावर्तित कर देंती हैं। इस तरह फसलें कार्बन का 31 फीसदी हिस्सा सोखकर उसे अपने भोजन में परिवर्तित कर लेतीं हैं। इन वैज्ञानिकों का कहना है कि किसी विशेष क्षेत्र में उगाई जाने वाली फसल के स्थान पर कोई और फसल उगाने के बजाए उसी फसल की किसी ऐसी किस्म से बदल देने की आवश्यकता है जिससे पत्तियों की सूर्य के प्रकाश को परावर्तित करने की क्षमता बढ़ जाए। इन वैज्ञानिकों ने एक अपने प्रयोग के लिए उत्तरी अमेरिका और यूरेशिया के क्षेत्र को शामिल कर कम्प्यूटरीकृत माडल के जरिए ऐसी फसल का प्रयोग किया जिसकी पत्तियों में इस क्षेत्र में सूर्य के प्रकाश को परिवर्तित करने की क्षमता विद्यमान थी। इस अनुसंधान दल ने कृत्रिम रूप से कार्बनडायआक्साइड गैस का 700पीपीएम का स्तर तैयार किया तथा इन पत्तियों के जरिए प्रकाश परावर्तन की क्षमता में क्रमश: 10,20 और 40 फीसदी की वृद्वि परिलक्षित हुई और औसतन रूप से संपूर्ण क्षेत्र में पत्तियों के प्रकाश परावर्तन की क्षमता में 20फीसदी की वृद्वि हुई।अत:खेती के जरिए कार्बन नियंत्रण के लिए जरूरी है कि किसी क्षेत्र विशेष के अनुकूल की फसलें ली जाए। जो कि उस क्षेत्र के सूर्य के अतिरिक्त प्रकाश को परावर्तित करने में सहायक रहें।

 

               हम जानते हैं कि सूर्य का प्रकाश ग्रीन हाउस प्रभाव के चलते धारती पर ही रह जाता है। जिससे वह धरती का ताप वृद्वि का कारण बनता है,अत:प्रकाश का परार्वन जरूरी है। ऐसे में यह प्रयोग एक उम्मीद जगाता है कि फसलों में पारिस्थितिकी के सिद्वांत को मान्यता देते हुए खेती के जरिए वैश्विक ताप में वृध्दि को रोका जा सकता है। तथा इससे यह सिद्व होता है कि खेती ताप तथा कार्बन सोखने का एक अच्छा संसाधन है। लेकिन वर्तमान में खेती में कृत्रिम रसायन युक्त उर्वरकों का प्रयोग खेती को ही कार्बन उत्सर्जन का स्त्रोत में परिवर्तन कर रहा है क्योंकि रासायनिक खेती में भारी मात्रा में यूरिया और फासफोरस युक्त उर्वरको का प्रयोग होता है जिनका अवक्षय कार्बन के रूप में ही होता है जिससे खेती के जरिए वायुमण्डल में कार्बन सांद्रण की भागीदारी बढ़ती जा रही है इससे खेती के जरिए ग्रीन हाउस गैसों से धारती का ताप बढ़ रहा है। इससे बचने के लिए जैविक खेती को बढ़ावा देने की जरूरत है जिससे हम खेती के जरिए धारती के तापमान में वृद्वि को रोकने की बात वजनदारी से कर सकें।

? डॉ. सुनील शर्मा