संस्करण: 23 मई-2011

सार्वजनिक वितरण प्रणाली या वितरण भ्रष्टाचार का
 

? जाहिद खान

               गरीब परिवारों को सस्ते दामों पर अनाज मुहैया कराने और उन्हें खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के मकसद से शुरू की गई सार्वजनिक वितरण प्रणाली यानी पीडीएस में व्याप्त भ्रष्टाचार पर मुल्क में कहीं भी अंकुश नहीं लग पा रहा है। सरकार की तमाम कोशिशों के बाद भी इस प्रणाली में भ्रष्टाचार ज्यों का त्यों बना हुआ है। यह योजना पूरी तरह से भ्रष्टाचार की शिकार है। केन्द्र सरकार की ओर से सबसिडी के तौर पर दिए जाने वाले हजारों करोड़ रूपए,गरीबी रेखा से नीचे जीवन गुजर बसर कर रहे परिवारों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की बजाय कालाबाजारियों,बिचौलियों,छुटभैय्ये नेताओं और भ्रष्ट अफसरों की भेंट चढ़ रहे हैं। सार्वजनिक वितरण प्रणाली की छानबीन के लिए सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर बनी एक सदस्यीय कमेटी जस्टिस डीपी वाधवा कमेटी ने,हाल ही में मध्यप्रदेश पर केन्द्रित अपनी रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट को सौंपी। जस्टिस वाधावा ने सूबे के अंदर पीडीएस में छानबीन के बाद जो नतीजे निकाले,वे काफी सनसनीखेज हैं। कमेटी का मानना है कि मध्यप्रदेश में सार्वजनिक वितरण प्रणाली पूरी तरह से भ्रष्टाचार के दलदल में डूबी हुई है। ज्यादातर राशन दुकानों में बड़ी रकम रिश्वत के तौर पर उगाही जाती है। इन दुकानों के खाद्यान्न एवं केरोसिन आवंटन में रिश्वत चलती है। राशन दुकान संचालकों को हर महीने सत्तारूढ़ सियासी पार्टी के सार्वजनिक कार्यक्रमों के लिए राशि देना पड़ती है। यदि न दें तो खाद्य निरीक्षक उन्हें परेशान करते हैं। बहरहाल,जस्टिस वाधवा ने अपनी रिपोर्ट में सबसे बड़ी बात यह कही,नौकरशाही भी चाहती है कि पीडीएस में भ्रष्ट व्यवस्था कायम रहे। यानी,नौकरशाही जिस का काम भ्रष्टाचार को रोकना है,वही उसे सबसे ज्यादा शह दे रही है। नौकरशाहों की सरपरस्ती में ही इस प्रणाली में भ्रष्टाचार फल फूल रहा है।

 

               गौरतलब है कि जस्टिस डीपी वाधावा ने सितम्बर 2010 में पीडीएस की जमीनी हकीकत जानने के लिए सूबे के भोपाल,होशंगाबाद,छिंदवाड़ा और बैतूल समेत दीगर जिलों का दौरा किया। कमेटी को चार बिंदुओं पर अपनी छानबीन करना थी। पहला, इसमें दुकानदारों की नियुक्ति कैसे होती है? दूसरा, इस प्रणाली में कमीशन देने की व्यवस्था क्या है? तीसरा, भ्रष्टाचार रोकने के लिए विजिलेंस टीम कैसे काम करती है? और चौथा, परिवहन की दरें क्या हैं व टैंडर व्यवस्था कैसी है ? जांच के बाद जस्टिस वाधवा ने सार्वजनिक वितरण प्रणाली में कमीशन को भ्रष्टाचार की सबसे बड़ी वजह बतलाया। ग्रामीण इलाकों में एक सहकारी समिति के जिम्मे 8-8दुकानें हैं। खाद्य अधिकारियों को हर दुकान से कमीशन मिलता है। जाहिर है, अफसरों को जब इन दुकानों से हर महीने एक मुश्त कमीशन बंधा हुआ है, तो वे इन दुकानों की समीक्षा और निगरानी पर क्यों ध्यान देंगे? भारतीय खाद्य निगम एवं नागरिक आपूर्ति निगम के डिपों से राशन की दुकान के बीच की दूरी भी भ्रष्टाचार की एक वजह है। कमेटी के मुताबिक भारतीय खाद्य निगम एवं नागरिक आपूर्ति निगम के डिपों से राशन की दुकानों की दूरी ज्यादा होती है। ऐसे में बीच से ही खाद्यान्न से भरे ट्रक के ट्रक गायब कर दिए जाते हैं। जो लोर मिल,बिस्कुट बनाने वाली कंपनियों को बेच दिए जाते हैं।

 

               एक बात और ग्रामीण इलाकों से राशन प्राथमिक सहकारी समिति के जरिए वितरित होता है। यह समितियां वर्षों से घाटे में चल रहीं हैं। सूबे में तकरीबन 800कमेटियों को बंद करने का प्रस्ताव विचाराधीन है। लेकिन सहकारिता विभाग जिसके जिम्मे इन समितियों का संचालन है, वह न तो इन समितियों की कभी समीक्षा करता है और न निगरानी। समितियों के लगातार घाटे में चलने के बावजूद इनका घाटा कम करने पर कभी विचार नहीं किया जाता। चूंकि,इन समितियों के चयन का मापदंड सियासी पार्टियां तय करती हैं,लिहाजा इसकी भूमिका पर भी सवाल उठते हैं। वाधवा कमेटी के अलावा सीएमएस और सीएमडीएस जैसी संस्थाओं ने कुछ साल पहले मुख्तलिफ सूबों में सार्वजनिक वितरण प्रणाली की स्थिति का अध्ययन कराया था। उस अध्ययन में भी यह खुलासा हुआ था कि भ्रष्टाचार की शुरूआत राशन की दुकानों के लिए लाईसेंस देते वक्त ही शुरू हो जाती है। राशन की दुकानें सत्तानशीं पार्टी से जुड़े लोगों को नवाजने और उन्हें फायदा पहुंचाने के लिए होती है। जब हमारे वतनपरस्त लीडर खुद इस बंदर बांट में आगे-आगे हैं,तो नौकरशाही कैसे पीछे रह सकती है। नौकरशाह भी लाईसेंस बनाने के लिए बड़े पैमाने पर घूस लेते हैं। जाहिर है,कहीं भी भ्रष्टाचार उच्च पदस्थ नौकरशाही की शह के बगैर मुमकिन नहीं हो सकता। ऊपरी रकम में उनकी भी बड़ी हिस्सेदारी होती है।

 

               लाईसेंस और राशन कार्ड में धांधलियों के बाद राशन की दुकानों का भ्रष्टाचार शुरु होता है। आलम ये है कि कथित 'उचित मूल्य' की इन दुकानों में ही सबसे ज्यादा अनुचित काम हो रहा है। राशन दुकानों के इन संचालकों ने भ्रष्टाचार के सारे रिकार्ड तोड़ कर रख दिए हैं। उचित मूल्य की इन राशन दुकानों में सैंकड़ो अनियमितताएं हैं। अव्वल तो दुकानें सही समय पर खुलती ही नहीं और यदि ये खुल भी जाती हैं,तो इन दुकानों पर स्टॉक दो दिन में ही खत्म हो जाता है। जरुरतमंद,राशन की दुकानों पर चक्कर लगाते रहते हैं और उन्हें एक ही जबाव मिलता है कि 'अभी राशन नहीं आया।' गोयाकि,पूरा महीना गुजर जाता है मगर राशन नहीं मिलता। राशन मिलता भी है तो अनपढ़ गरीबों को कम अनाज देकर उनसे ज्यादा के हिसाब पर अंगूठा लगवा लिया जाता है। फिर दुकानों में मिलने वाले अनाज की गुणवत्ता का कोई मापदंड नहीं है। अच्छे अनाज की कालाबाजारी कर उसके बदले घटिया अनाज लोगों को बांट दिया जाता है। तय कीमत से ज्यादा वसूला जाना,माप-तौल का दोषपूर्ण होना,दुकानदार का बदतमीजी से पेश आना ऐसी दीगर कई तकलीफें हैं,जिन्हें गरीबों को रोज-ब-रोज भुगतना पड़ता है।

 

               वाधवा कमेटी ने पीडीएस में भ्रष्टाचार की एक वजह राशन दुकान संचालकों को खाद्य विभाग से मिलने वाले कम कमीशन को मानते हैं। इन दुकानदारों को 1क्विंटल गेहूं पर 15रूपए और 100लीटर केरोसिन पर 20रूपए कमीशन मिलता है। जाहिर है,इतने कम मार्जिन पर वे दुकानों का संचालन कैसे करते होंगे,खुद ही अंदाजा लगाया जा सकता है। यह दुकान संचालक अपने घाटे की पूर्ति और ज्यादा मुनाफे के लालच में राशन की कालाबाजारी करने लगते हैं। कुछ असरदार लोगों को खाद्यान्न और तेल मुहैया कराकर बाकी बाजार में बेच देते हैं। आम उपभोक्ता दुकानों के सामने राशन कार्ड लिए राशन का इंतजार करता ही रह जाता है। इन धांधलियों की यदि शिकायतें होती भी हैं तो अधिकारी दुकान संचालकों के खिलाफ 400-500रूपए का जुर्माना लगाकर मामला वहीं खत्म कर देते हैं। बहुत कम मामलों में एफआईआर दर्ज हो पाती है। वह भी तब,जब दुकान संचालकों से महीने का बंधा हुआ पैसा खाद्य अधिकारियों और ऊपर तक न पहुंचे। कमेटी की रिपोर्ट कहती है कि कमोबेश हर राशन की दुकान भ्रष्टाचार का केन्द्र बनकर रह गई है।

 

               बहरहाल,सार्वजनिक वितरण प्रणाली में गड़बड़ियों को उजागर करने और उसकी कमियों को बतलाने के अलावा जस्टिस डीपी वाधवा कमेटी ने इसमें सुधार के लिए अपनी ओर से कुछ अनुशंसाएं भी की हैं। उनकी यह अहम अनुशंसाएं हैं- सूबे में हर ग्राम पंचायत में राशन दुकानें खोली जाएं,सार्वजनिक वितरण प्रणाली का पूरी तरह से कम्प्यूटरीकरण हो,परिवहन में बदलाव किया जाए,तुलाई व्यवस्था पुराने कांटों की बजाय इलेक्टॉनिक कांटों से की जाए,दुकानों में गड़बड़ियों की शिकायत निवारण के लिए लोक अदालत लगाई जाएं और खाद्य नियंत्रण आदेश,जो हालात को एक दम सुधार सकता है,उसका वास्तविक क्रियान्वयन हो। जाहिर है,यह ऐसी अनुशंसाएं हैं,जिन पर थोड़ी सी कोशिशों के बाद ही आसानी से अमल में लाया जा सकता है। बस जरूरत एक मजबूत इच्छाशक्ति की है।


? जाहिद खान